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घोटालों का AC, विपक्ष का PAC

सार

दिल्ली विधानसभा में शराब घोटाले पर कैग की रिपोर्ट पर हो हल्ला मचा हुआ है. CAG रिपोर्ट्स के राजनीति में उपयोग का लंबा इतिहास है. राजनीति की बात और हाथी के दांत में काफी समानता है. दिखाने के लिए कुछ और होते हैं एवं  खाने के लिए कुछ और..!!

janmat

विस्तार

    CAG रिपोर्ट्स को हाथी का दांत ही कहा जा सकता है, जो  केवल दिखाने के उपयोग में ही आती है. कैग की रिपोर्ट्स विधानसभा में प्रस्तुत होने के बाद विचार के लिए पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (PAC) को सौंपी जाती है. PAC का चेयरमेन विपक्षी दल का सदस्य होता है. इस कमेटी में विभिन्न दलों के सदन के सदस्यों की भागीदारी होती है, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक चेयरमेन विपक्षी दल का ही सदस्य होगा. 

    अगर दिल्ली विधानसभा में पेश कैग रिपोर्ट की चर्चा की जाए तो यह PAC के सामने जाएगी. सामान्यतः इन रिपोर्ट्स पर सदन के अंदर चर्चा नहीं होती. कैग रिपोर्ट में घोटाला उजागर होने के बाद भी उस पर कोई क्रिमिनल प्रोसीजर चालू नहीं किया जा सकता. क्रिमिनल प्रोसीजर के लिए अलग न्यायालय में लड़ाई लड़नी होती है. दिल्ली शराब घोटाले के मामले में यह लड़ाई चल रही है. जिसके तहत अरविंद केजरीवाल और उनके मंत्री जेल तक जा चुके हैं. अदालत से बेल मिली हुई है.

    सदन में प्रस्तुत कैग रिपोर्ट केवल राजनीतिक उपयोग भर हो सकती है. दोषी को दंडित करने के लिए जो प्रक्रिया निर्धारित है, उसमें कैग रिपोर्ट्स एक दंतविहीन व्यवस्था है. पब्लिक अकाउंट्स कमेटी घोटाले की जिम्मेदार किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक व्यक्ति को सम्मन नहीं कर सकती है. रिपोर्ट में जो भी आपत्तियां पाई गई हैं, उन पर शासन की वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत PAC पक्ष प्राप्त करेगी. अधिकांश मामलों में सरकार के पक्ष से समिति सहमत हो जाती है. किसी छोटे-मोटे अधिकारी-कर्मचारी को दंडित करने की सिफारिश भी कर दी जाती है, तो वह भी विभागों में जाकर ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है. वसूली के नाम पर हल्की-फुल्की कार्रवाई भले ही कर ली जाती हो लेकिन देश की ऑडिट व्यवस्था से उजागर हुई अनियमितिता और घोटाले पर कोई भी कानूनी कार्रवाई, स्वस्फूर्त नहीं होती, जब तक कि इसके लिए अदालत में अलग से लड़ाई नहीं लड़ी जाती है.

    सारी व्यवस्था की जड़ में धन प्रबंधन होता है. सरकारों में धन कमाने और खर्च करने से ही विकास के लक्ष्य पूरे किए जाते हैं. ऑडिट व्यवस्था यही सुनिश्चित करने की संवैधानिक व्यवस्था है कि, सरकारें और व्यवस्था का तंत्र नीति, प्रक्रिया  और नियमों का पालन करते हुए जनधन का उपयोग करें. कैग रिपोर्ट्स में जो भी अनियमितिता और उससे सरकार के राजस्व को नुकसान का विवरण दिया जाता है, वह भी अधिकांशतः अनुमान पर निर्धारित होता है. वास्तविकता से उसका कोई लेना देना नहीं है. 

    शराब नीति के मामले में ही जो भी राजस्व के नुकसान का आंकलन कैग रिपोर्ट में किया गया है, वह इस आधार पर है  कि अगर नीति नहीं बदली गई होती तो अनुमानित राशि का राजस्व सरकार को प्राप्त होता. कैग रिपोर्ट्स अनेक बार राजनीतिक तूफान का कारण बनती है.

    यूपीए सरकार के खिलाफ तो कैग रिपोर्ट्स के आधार पर जल, थल और नभ में घोटाले का राजनीतिक तूफान खड़ा किया गया था. बाद में इन रिपोर्ट्स के आधार पर दोषी के खिलाफ कोई भी एक्शन नहीं होता, जब भी कभी एक्शन हुआ होगा तो वह न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही संभव हो सकेगा.

    CAG विधानसभा में प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में कहते हैं कि, इसका मूलभूत उद्देश्य लेखा परीक्षा के महत्वपूर्ण परिणामों को राज्य विधानसभा के संज्ञान में लाना है. लेखा परीक्षा निष्कर्षों से कार्यकारी को सुधारात्मक कार्रवाई करने, उचित नीतियों को तैयार करने के साथ-साथ निर्देश जारी करने में सक्षम बनाना अपेक्षित है. जो संगठनों के बेहतर वित्तीय प्रबंधन को बढ़ावा देगा और बेहतर प्रशासन में योगदान भी. कैग  प्रतिवेदनों के उद्देश्य स्पष्ट हैं. उनके राजस्व नुकसान के अनुमानों को घोटाले के रूप में स्थापित करने के प्रयास राजनीति की बात है. इस बात को हाथी के दांत कहना अप्रासंगिक नहीं होगा.

    देश की ऑडिट व्यवस्था सिस्टम में व्याप्त बुराइयों से अलग नहीं कहीं जा सकती है. ऑडिट दल विभागों में पहुंचने के पहले अपनी आवभगत की व्यवस्था सुनिश्चित कर लेते हैं. विभागों में ऑडिट दल के बीच समन्वय  और साँठ-गाँठ असामान्य बात नहीं है. अक्सर ऐसा होता है कि, ऑडिट टीम को उपकृत करने के लिए प्रत्येक सरकारी विभाग में कमाऊ शाखाओं से चंदा एकत्र किया जाता है. एकत्रित चंदे  से उपकृत होने के बाद ऑडिट दल  औपचारिक रूप से ऐसी आपत्तियां लगाते हैं जो बाद में समाप्त हो जाती हैं. 

    जब भी सरकार की किसी नीति को लेकर राजनीतिक विवाद चालू हो जाता है तो उस पर आने वाली कैग रिपोर्ट्स ज्यादा चर्चा में रहती है. सामान्य रूप से तो यह रिपोर्ट विधानसभा में पेश होती है, तो न ही कोई  देखने वाला और ना ही उनको कोई पढ़ने वाला होता है. सैकड़ो प्रष्ठों  के रिपोर्ट में सैकड़ो आपत्तियां लिखी होती है लेकिन जिस दिन रिपोर्ट पेश होती है, उसी दिन मीडिया भी एक-दो खबर देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है.

पब्लिक अकाउंट्स कमेटी सीएजी रिपोर्ट्स पर कार्रवाई की संवैधानिक अथॉरिटी है. राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप के अलावा वित्तीय प्रबंधन में सुधार की दृष्टि से CAG रिपोर्ट्स पर कभी भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता. जो स्थिति विधायी सदनों की है कमोवेश वैसे ही स्थिति PAC की भी होती है. दिल्ली विधानसभा में विपक्षी सदस्य निलंबित हैं. सदन की चर्चा  रिकॉर्ड पर तो आ जाती है लेकिन यह सदन की ही संपत्ति होती है. इस पर कोई अपराधिक या न्यायिक कार्रवाई नहीं चलाई जा सकती.  

     गर्मी में ठंडक के लिए जो उपयोग AC का है, वही उपयोग CAG रिपोर्ट्स की ठंडक के लिए पब्लिक अकाउंट्स कमेटी का दिखाई पड़ता है. देश की ऑडिट व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है. इस व्यवस्था को संसदीय प्रणाली में एक सीमा तक ही रखने की जरूरत है. इसको कानून के  दायरे में लाया जाना चाहिए, तभी CAG रिपोर्ट्स की वैधानिकता का औचित्य साबित होगा. इससे गवर्नेंस के सिस्टम में भय पैदा होगा. वित्तीय प्रबंधन सुधरेगा. वित्तीय अनियमितता रोकी जा सकेगी. CAG रिपोर्ट्स पर आपराधिक कार्रवाई संसदीय व्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा.