वैसे जो चिकित्सक सेवारत और उपलब्ध हैं, उनमें से करीब 50 प्रतिशत शहरों में ही काम कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में कैंसर का विस्तार और संभावनाएं एक बेहद गंभीर समस्या है, तो ‘कैंसर केयर केंद्र’ की बजटीय व्यवस्था पर शुरू से ही सवाल उठने लगते हैं..!!
“याद कीजिए,वर्ष 2025-26 के राष्ट्रीय बजट में घोषणा की गई थी कि प्रत्येक जिला अस्पताल के साथ ‘कैंसर केयर केंद्र’ स्थापित किए जाएंगे।“ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जो ब्लूप्रिंट तैयार किया है, उसके मुताबिक प्रत्येक कैंसर केंद्र में एक विशेषज्ञ डॉक्टर, 2 नर्स, एक फार्मासिस्ट और एक बहुपयोगी कर्मचारी जरूर होने चाहिए। भारत में कितने कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, यह संख्या विभिन्न सर्वेक्षणों में अलग-अलग रही है। यह आश्चर्यजनक है कि देश में कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टरों की निश्चित गणना नहीं है। यह अनुमान जरूर है कि देश में कमोबेश 2000 कैंसर विशेषज्ञों की कमी है।
वैसे जो चिकित्सक सेवारत और उपलब्ध हैं, उनमें से करीब 50 प्रतिशत शहरों में ही काम कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में कैंसर का विस्तार और संभावनाएं एक बेहद गंभीर समस्या है। तो ‘कैंसर केयर केंद्र’ की बजटीय व्यवस्था पर शुरू से ही सवाल उठने लगते हैं। ऐसे मुद्दे को सवालिया बनाने के पक्षधर कोई नहीं हैं, लेकिन यथार्थ बेहद डरावना है कि औसतन एक लाख में से मात्र 100 लोगों में ही कैंसर की पहचान हो पाती है। कैंसर के प्रति जन-जागृति नगण्य है।
भारत में जन-स्वास्थ्य की यह अहम चुनौती है कि कैंसर का रोग तब पता चल पाता है, जब रोग आखिरी चरण में पहुंच जाता है, लिहाजा कैंसर लाइलाज हो जाता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने अभी कुछ डाटा जारी किया है, जिसके मुताबिक, 2023 में भारत में कैंसर के 14 लाख से अधिक मरीज थे। विशेषज्ञ इससे भी ज्यादा संख्या मानते हैं। दरअसल यह संख्या दर्ज मरीजों से 1.5 से 3 गुना अधिक हो सकती है। बेशक यह संख्या डरावनी है। हालांकि देश में गर्भाशय, मुंह और स्तन कैंसर की जांच के कार्यक्रम चलते रहे हैं। कैंसर के एक-तिहाई से ज्यादा मामले शरीर के इन्हीं अंगों में होते हैं, लेकिन रोग के पता लगाने की दर विश्व में सबसे कम है। कैंसर केयर के जो केंद्र राजधानी दिल्ली में भी कार्यरत हैं, उनमें या तो डॉक्टर गायब हैं अथवा जांच के उपकरण खराब हैं या इलाज की बारी लंबे-लंबे वक्त के बाद आती है।
स्वाभाविक है कि रोग फैलता ही जाता है। जब तक इन केंद्रों पर कोई सख्त प्रशासनिक लगाम नहीं होगी, तब तक बजट के ‘कैंसर केयर केंद्र’ भी सफल प्रयोग साबित नहीं हो सकते। पूर्वोत्तर और केरल में कुछ जिला अस्पतालों में ‘कैंसर केयर केंद्र’ काम कर रहे हैं, लेकिन वे कितने कारगर हैं, इसकी कोई पुष्ट जानकारी नहीं है। बहरहाल विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता एक गंभीर चुनौती साबित होगी। सरकार प्रस्तावित कार्यक्रम की शुरुआत में मोबाइल क्लीनिकों को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचा सकती है, लेकिन ऐसे क्लीनिक एक विशेषज्ञ चिकित्सक का विकल्प नहीं हो सकते और कैंसर विशेषज्ञों का अभाव है। कैंसर के संभावित मरीजों में बहुधा ऐसे हैं, जो जांच कराने ही नहीं आते। इस तबके में महिलाएं अधिकतर हैं। अस्पतालों के साथ कैंसर केयर केंद्र जोडऩे का प्रयास तब कारगर हो सकता है, जब जांच-दलों को लोगों की दहलीज तक भेजा जाए। लोग अस्पताल तक जाने में भी संकोच करते हैं, जबकि अस्पतालों में सभी स्वास्थ्य जांच मुफ्त होती हैं।
लोगों को ‘टेलीमेडिसन’ सरीखे डिजिटल औजार इस्तेमाल करने को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। नई ग्रामीण कैंसर इकाइयों को ‘नेशनल कैंसर ग्रिड’ के जरिए जोड़ा जाना चाहिए, ताकि शहर और गांव के बीच कैंसर विशेषज्ञ आपस में संवाद कर सकें और मरीज का उचित इलाज हो सके।