भारत के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सभी प्रकार की स्वतंत्रता से ऊपर माना गया है. स्वतंत्रता, स्वच्छंदता नहीं हो सकती इसीलिए संविधान में उचित प्रतिबंध भी लगाए गए हैं. संविधान लागू होने के बाद पहले संशोधन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में उचित प्रतिबंध के प्रावधान किए गए थे..!!
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विवाद हमेशा होते रहे हैं. सामान्य लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ना कोई बाधा है और ना ही इस पर कोई विवाद. सियासत की परतंत्रता से जुड़े लोग कॉमेडी या कविता का जब राजनीतिक उपयोग करते हैं तभी विवाद खड़े होते हैं. कला, संस्कृति, फिल्म, कॉमेडी और राजनीति के लोग जब दोहरी भूमिका निभाते हैं और इसमें ईमानदारी नहीं बरतते हैं, तभी ऐसे विवाद शुरू होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कांग्रेस के सांसद इमरान प्रतापगढ़ी पर गुजरात में दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो राय दी गई है उस पर किसी को भी एतराज नहीं हो सकता. आम नागरिक तो इस अधिकार को ईश्वरीय अधिकार मानता है. उस पर कोई बाधा भी नहीं आती. जब किसी अधिकार का उपयोग लाइमलाइट में आने के लिए या अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए किया जाता है तब स्वतंत्रता के साथ बेईमानी शुरू हो जाती है. जो भी अपनी स्वतंत्रता के साथ ईमानदार नहीं होता, स्वतंत्रता के साथ बेईमानी की आदत पद, प्रतिष्ठा, धन पाने के लिए बढ़ने लगती है, तो फिर संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के दुरुपयोग के लिए वह स्वयं दोषी हो जाएगा.
अब तक जितने भी मामले अदालतों में ऐसे अपराधों के लिए पहुंचे हैं उनका इतिहास खंगाला जाएगा तो या तो कॉमेडी या कविता से जुड़े होंगे, सियासत से जुड़े होंगे, धर्म से जुड़े होंगे. ऐसा एक भी मामला नहीं मिलेगा जहां एक आम नागरिक को संविधान के इस अधिकार से वंचित किया गया हो.
भारत तो सभी प्रकार की स्वतंत्रता को संरक्षण देने वाला देश है. उसकी इसी सोच और शैली ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र न केवल स्थापित किया है, बल्कि इसको स्थायित्व दिया है. भारत में सत्ता का हस्तांतरण जिस लोकतांत्रिक ढंग से होता है, वह भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार पर ही आधारित है. छुटपुट घटनाओं या अदालती मामलों से भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जड़ों को कमजोर नहीं किया जा सकता.
इसके बाद भी बोलने की आजादी के पैरोकारों को उचित प्रतिबंधों और अपने कर्तव्यों पर भी सजग होना ही पड़ेगा.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अतिवाद की अराजकता को तो अनुमति नहीं दी जा सकती. केवल बोलने की आज़ादी नहीं बल्कि धार्मिक, राजनीतिक, जीने और संपत्ति की स्वतंत्रता का भी अधिकार लोगों को मिला हुआ है. आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी देश विरोधी गतिविधियों में शामिल भी अभिव्यक्ति की आजादी और मानव अधिकार का सहारा लेते हैं.
केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकारों पर ज्यादा सवाल खड़े किये जाने लगे हैं. राजनीतिक दलों की विचारधारा की लड़ाई को संवैधानिक अधिकारों के साथ जोड़कर उन्हें बदनाम करने का प्रयास संवैधानिक संरक्षण को मजबूती नहीं बल्कि कमजोर करते हैं.
लोकतंत्र मुख्य रूप से बातचीत एवं बहस पर आधारित है. स्वतंत्र विचार, चर्चा और बहस बहुत जरूरी है. देश का आधुनिकीकरण विचार विमर्श का ही सुफल है.
सोशल मीडिया आज जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजबूत आधार बना हुआ है. वहीं आतंकी समूह भी इसका प्रयोग अपनी गतिविधियों के लिए करते हैं. यह ऐसी समस्याएं हैं जो ना सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चुनौती हैं, बल्कि सरकारों के लिए इनसे निपटना बहुत कठिन हो गया है. वर्तमान समय में फेसबुक, व्हाट्सएप सहित सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापकता प्रदान कर रहे हैं, वहीं इनका दुरुपयोग भी खुले आम हो रहा है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत में रची बसी है. पत्रकारिता तो इस पर ही खड़ी हुई है. आपातकाल जैसी बाधाएं अनेक बार आती रही हैं, लेकिन देश ने ऐसी सभी बाधाओं को न केवल हमेशा पार किया है, बल्कि मौलिक अधिकारों की स्वतंत्रता को नया आधार दिया है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल और चुनौतियां सियासी बेईमानी के कारण ही खड़ी हो रही हैं. वोट बैंक की राजनीति चाहे अल्पसंख्यकवाद या बहुसंख्यकवाद की हो संविधान को धक्का पहुंचा रही हैं.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ वैसे ही हो रहा है जैसे झूठ ही झूठ के साथ, झूठ बोल रहा है और वही दूसरे को झूठा साबित कर रहा है. इस अधिकार के साथ बेईमानी सियासत से ही चालू हुई है. कॉमेडी, कविता, फिल्म या दूसरे माध्यमों से जब भी ऐसी समस्या आती है तब उसकी जड़ें भी सियासत से ही जुड़ी होती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी दूसरे की स्वतंत्रता बाधित नहीं कर सकती.
सियासी झूठे वादे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही खुला दुरुपयोग है. इसी तरीके से कभी साहित्यकार, कलाकार, पॉलिटिशियन अगर अपनी कला का उपयोग लाइमलाइट में आने के लिए या राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए करने लगता है तो यह न केवल उनकी कला का अपमान है बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी दुरुपयोग
है.
विचारधारा के संघर्ष में जब राजनेता देश में किसी भी कानून या विधान के खिलाफ झूठी बातें करते हैं तो क्या इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती है. इस स्वतंत्रता में केवल बोलने का ही नहीं, सुनने और जानने का पक्ष भी शामिल है. किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि उसे वही सुनाया जाए, वही बताया जाए जो सच्चाई पर आधारित हो. सरकारों में बदलाव के साथ राजनीतिक विचारधारा भी बदलती है. सहमति, असहमति के बीच ही लोकतंत्र चलता है, लेकिन वोट बैंक के लिए भ्रमपूर्ण जानकारी देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है.
अब तो ऐसा लगने लगा है कि सियासत देश की समस्याओं के समाधान की बजाए संकट का रूप लेने लगी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला घुमा-फिरा कर सियासत ही कर रही है. इस मौलिक अधिकार में यह प्रगतिशील प्रावधान भी जोड़ा जाना चाहिए कि प्रत्येक नागरिक को सच जानने का अधिकार है. अगर कोई उसे भ्रमपूर्ण या गलत तथ्य प्रचारित कर अपना सियासी लक्ष्य पूरा कर रहा है तो उसे दंडित किया जा सकता है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो भारत में समाई हुई है, अगर इसके साथ सच की ताकत जुड़ जाएगी तो फिर भारत के वैभव का मुकाबला करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं होगा.