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न्यायपालिका पर संदेह कानून के राज पर संशय

सार

दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के सरकारी आवास पर आग लगने के दौरान भारी मात्रा में कैश मिलने और जलने की घटना ने न्यायपालिका पर विश्वास को हिला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना की जांच के लिए न्यायाधीशों की आंतरिक समिति बनाई है. संबंधित न्यायाधीश से न्यायिक कार्य छीन कर उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है..!!

janmat

विस्तार

    न्यायपालिका में करप्शन का धुआं तो समय-समय पर उठता रहता था, लेकिन पहली बार आग लगी है. जज के आवास पर कैश मिलने की जांच से ही न्याय के सांच पर आंच आ गई है.

    न्यायपालिका को संवैधानिक इम्यूनिटी है. नियुक्ति, ट्रांसफर, प्रमोशन सभी मामलों में न्यायपालिका को ही स्वतंत्रता है. इसमें किसी प्रकार का कार्यपालिका या विधायिका का हस्तक्षेप नहीं होता. केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाकर न्यायिक जवाबदेही को और अधिक सख्ती से लागू करने का प्रयास किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2015 में इसे असंवैधानिक करार दे दिया था. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में ही सारे अधिकार निहित हैं.

    मौजूदा मामले से जुड़े दस्तावेजों को अभूतपूर्व तरीके से अपनी वेबसाइट पर साझा करके सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक खुलासे के लिए व्यापक दृष्टिकोण का संकेत दिया है. अब आंतरिक समिति मामले की जांच कर रही है, तो उसे यह याद रखना चाहिए कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए. न्यायाधीशों के खिलाफ न्यायिक आंतरिक जांच का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है. मौजूदा मामले से न्यायपालिका के विश्वास पर संकट खड़ा हो गया है. इसलिए शायद इस बार न्यायाधीश से ज्यादा न्याय की इम्युनिटी को प्राथमिकता मिल सके.

    न्यायपालिका के भुक्त भोगियों के अनुभव तो हमेशा ऐसे धुओं की ओर इशारा करते थे. इस बार तो अग्नि देव ने सब कुछ सार्वजनिक कर दिया है. कानों से ज्यादा आंखों पर भरोसा किया जाता है. न्यायाधीश महोदय के सरकारी आवास के बाहर सफाई में अधजले नोट मिल रहे हैं. 

    संबंधित न्यायाधीश महोदय की प्रतिक्रिया यही है, कि यह कैश उनका नहीं है. उन्हें फंसाया जा रहा है. जजों को भी फंसाया जा सकता है, ऐसा तो परसेप्शन में कभी सोचा नहीं गया था. जांच रिपोर्ट आने पर वास्तविकता सामने आएगी, लेकिन इस घटना ने न्यायपालिका के विश्वास पर जितनी चोट कर दी है, उसकी कल्पना ही की जा सकती है.

    न्यायाधीश को संवैधानिक इम्यूनिटी होती है. उनके सामने पुलिस और जांच एजेंसियां हाथ बांधे खड़ी रहती हैं. उनके बंगलो पर जांच के लिए किसी के जाने के बारे में तो कोई सोच भी नहीं जा सकता. अगर आग नहीं लगती तो भले कैश के बोरे बढ़ते ही जाते, लेकिन न्यायिक इम्यूनिटी में सब सुरक्षित रह सकता था.

    कार्यपालिका तो “कैशपालिका” बन ही गई है. कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब किसी न किसी राज्य की कार्यपालिका से जुड़े, किसी न किसी को रिश्वत या घूसखोरी में पकड़ा नहीं जाता होगा. बड़े अफसर भी पकड़े जाते हैं. आईएएस और आईपीएस भी कैश कांड में कई बार शामिल पाए गए हैं. यहां तक कि मंत्रियों के पास भी करोड़ों रुपए नकद जब्त हुए. घूस और रिश्वत तो कार्यपालिका का ड्राइविंग फोर्स बन गया है. कमीशन की व्यवस्था न हो तो शायद कार्यपालिका का लीवर चलना ही बंद कर देगा. विधायी कार्यपालिका हर पांच साल में जनादेश हासिल करती है. ब्यूरोक्रेसी विधायी कार्यपालिका की सेवा में ही अपना सर्वस्व शायद इसीलिए लगाती है, क्योंकि इसी सेवा में उनकी खुद की सेवा भी शामिल होती है.

    कार्यपालिका के अन्याय, अत्याचार, प्रताड़ना, अनियमितता, घोटाले पर नियंत्रण करते हुए कानून के राज की गारंटी न्यायपालिका देती है. सुप्रीम कोर्ट के ध्येय वाक्य का अर्थ है, “जहां धर्म है वहीं विजय है” अगर यह ध्येय वाक्य बदल जाएगा और ऐसी घटनाएं बढ़ती जाएंगी तो फिर यही कहा जाएगा, “जहां कैश है वहीं विजय है.”

    वैसे भी गरीबों के लिए न्याय बहुत दूर की बात है. न्याय बहुत खर्चीला हो गया है. वर्तमान में भी न्याय अमीरों तक ही सीमित हो गया है. गरीबों का तो वहां तक पहुंचना भी असंभव हो गया है. तमाम सारी असुविधाओं, कठिनाइयों, खर्च और अफवाहों के बाद भी लोगों के मन में यह भरोसा कायम है, कि अंततः न्यायपालिका से उन्हें हर हालत में न्याय मिलेगा. न्यायाधीश के निर्णय पर सवाल नहीं उठाया जाता. भले ही पराजय मिली हो. लेकिन उसका भरोसा भारत का स्वभाव है.

    न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विचार कर इसे और पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की जरूरत है. इस पूरी प्रक्रिया को पॉलिटिकल हस्तक्षेप से तो मुक्त रखना जरूरी है, लेकिन इम्यूनिटी के नाम पर जवाबदेही पर सवाल से बचने के मॉडल को बदलना होगा. न्यायाधीश भी इसी समाज का हिस्सा हैं, जो बुराईयां समाज के दूसरे क्षेत्रों में समाई हुई हैं, उनसे न्यायपालिका को कैसे दूर रखा जा सकता है. जब इसी समाज का व्यक्ति इसको चला रहा है. किसी के लिए देवदूत होने की कल्पना तो बेमानी है, लेकिन न्याय में भरोसा और न्यायाधीश में परमेश्वर देखने की संस्कृति खत्म नहीं होना चाहिए. किसी भी व्यवस्था को बनने में तो सदियों लग जाते हैं, लेकिन बर्बादी में वक्त नहीं लगता.

    भारत की न्यायपालिका विश्व में सर्वोत्कृष्ट न्यायपालिका के रूप में स्वीकार की जाती है. न्याय पर ही समाज का क्रम केंद्रित है. कानून के राज का आधार न्याय ही है. न्याय का क्रम न्यायिक ईमानदारी पर टिका है. बेईमानी की हर बड़बड़ाहट न्याय के भवन में कंपन पैदा करती है. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ संसद में महाभियोग चलाने की संवैधानिक व्यवस्था है. न्यायाधीशों के प्रति सम्मान और विश्वास में कमी नहीं आए, इसलिए अभी तक भारत में एक भी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग नहीं लगाया गया है. न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच प्रक्रिया न्यायपालिका के अंतर्गत ही संचालित की जाती है.

    मौजूदा मामले में जांच समिति संबंधित न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसलों का भी रिव्यू करे. ताकि उनके फैसलों की संवैधानिकता और वैधानिकता स्थापित हो सके. कोई भी न्यायाधीश फैसलों के बदले कैश लेता है, तो निश्चित रूप से उसके निर्णयों में वैधानिकता से ज्यादा स्वार्थ पूर्ति की झलक दिखाई पड़ेगी.