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सबको समानता, सबको सौगात

सार

    गरीब मुसलमानों को ईद पर सौगाते मोदी का स्वागत और विरोध साथ साथ चल रहा है. वोट बैंक की राजनीति खदबदाई हुई है. होना भी चाहिए, एक तरफ देश में औरंगजेब की कब्र का विवाद है. संभल में मस्जिद का विवाद है. वक्फ़ संशोधन बिल पर मुस्लिम समाज आंदोलनरत है. कर्नाटक में ठेकों  में मुस्लिम आरक्षण पर संसद में बवाल है..!!

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विस्तार

    कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां हिंदू-मुस्लिम में तनाव की खबरें ना हो. इस सब के पीछे हिंदुत्व राजनीति की जिस सोच को जिम्मेदार माना जाता है, उसी सोच की पार्टी ने ईद के अवसर पर तकरीबन बत्तीस लाख गरीब मुसलमान को सौगाते मोदी किट घर-घर पहुंचाने का कदम उठाया है. इस कदम पर चौंकना स्वाभाविक है. हिंदुत्व के समर्थक भी चौकन्ने हैं तो मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक के ठेकेदार भी बेचैन है.

    नवरात्रि चालू हो रही है. इसी बीच ईद भी होगी, रामनवमी भी आ रही है. पिछली रामनवमी पर कई जगह सांप्रदायिक विवाद हुए थे. अभी भी नवरात्रि में सार्वजनिक स्थान पर मांस की दुकान बंद करने की मांग उठ रही है. माहौल तो ऐसा बनने लगा है जैसे तनाव कभी भी बड़ा रूप ले सकता है. 

    योगी आदित्यनाथ जब यह कहते हैं कि हिंदू सुरक्षित है, तो मुसलमान भी सुरक्षित है. इस बयान के भी सियासी मायने निकाले जाते हैं. वह तो यहां तक कह रहे हैं कि, क्या सौ मुस्लिम परिवारों के बीच पचास हिंदू परिवार सुरक्षित रह सकते हैं. जबकि सौ हिन्दू परिवार के बीच एक मुस्लिम परिवार भी सुरक्षित है.

    पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान का यूपी के सीएम उदाहरण देते हुए कह रहे हैं कि, बुद्धिमानी इसी में है कि अगर कहीं धुआं है, तो आग से सावधान हो जाएँ . बीजेपी सरकारी नीतियों में तो भेदभाव करती नहीं दिखाई पड़ती. सभी धर्म और वर्गों को समान रूप से सरकार की योजनाओं का लाभ मिलता दिखाई पड़ता है. 

    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने समाज में एक सर्वे के आधार पर यह कहा कि भोपाल में मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों से तकरीबन तीन हज़ार से अधिक  हिंदू परिवार पलायन कर चुके हैं. पलायन के इस तथ्य को योगी आदित्यनाथ के बयान से जोड़कर देखा जाएगा तो फिर हिंदुओं को सर्तक होने का वक्त तो आ गया है.  

    पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में भी वोट बैंक की राजनीति चलती थी, लेकिन जब हिंदू-मुस्लिम विभाजन हुआ तो मुस्लिम परस्त हिंदुओं को भी नहीं बक्शा गया. बीजेपी हिंदुओं को जगा रही है, लेकिन उनके लिए भी सतर्क होने का समय है,जो तुष्टिकरण और वोट बैंक की सियासत कर रहे हैं. 

    धार्मिक कट्टरता तो सभी को छोड़नी पड़ेगी. सरकार ही नहीं समाज में भी सबका साथ और सबका विकास ही एकमात्र मंत्र है. अगर तुष्टिकरण में पहले कभी कुछ ऐसा हो गया है जो किसी समुदाय को प्रमुखता देता है तो वक्त के साथ अब समानता पर ही चलना होगा. डाइवर्सिटी के नाम पर फिर से डिवीजन की परिस्थितियां तो नहीं बनने दी जा सकतीं. जब सरकारी योजनाओं में कोई भेदभाव नहीं है तब सरकारी नियमों और कानून में भेदभाव क्यों होना चाहिए? सभी के लिए एक समान कानून क्यों नहीं होना चाहिए. समान नागरिक संहिता का विरोध कोई भी समुदाय केवल इसलिए नहीं कर सकता कि उसे सामाजिक कानून पर ही चलना है.

    समाज में सुधार नेचुरल है. धर्म को मानने वाला वक्त के साथ मिट जाता है, लेकिन मान्यता वही चलती रहती है. जब हिंदू, मुस्लिम के आधार पर देश का विभाजन हुआ था तब मुसलमानों के पैरोकार हिंदुओं को भी नहीं बक्शा गया था. भारत में आज मुसलमान से ज्यादा परिस्थितियों को बिगड़ने में मुस्लिम तुष्टिकरण वोट बैंक की राजनीति करने वाले हिंदू राजनेता अधिक दोषी दिखाई पड़ते हैं. 

  ईद पर सौगाते मोदी वैसे ही है जैसे प्रधानमंत्री आवास, किसान सम्मान निधि, आयुष्मान जैसी सभी योजनाओं में हिंदू-मुस्लिम दोनों को बिना भेदभाव के समानता के साथ सरकार का लाभ मिलता है. अगर कोई हिंदू समर्थक ऐसा मानता है कि हिंदुत्व की राजनीति करने वाली बीजेपी मुसलमानों को सौगात देने की बात करके हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है, तो उसे भी अपनी सोच बदलना चाहिए.

    हिंदुओं को जगाने और एकजुट करने का काम जो भी राजनीतिक दल या संगठन कर रहा है, उसकी भूमिका और योगदान को बांग्लादेश में हिंदुओं के हालात के मद्दे नजर अगर देखा जाएगा, तभी समझ आएगा. सामाजिक सुधार के लिए आगे आना चाहिए. हिंदुत्व की कट्टरता और अपने अस्तित्व के लिए एकता को शत्रुता के भाव से लेने की बजाय सुधार के ढंग से विचार कर उन सारे मुद्दों पर मुस्लिम समाज को समानता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए जो उन्हें कानून या सामाजिक व्यवस्था पर अलग खड़ा करते हैं.

    धार्मिक स्वतंत्रता में कोई दखल नहीं दिया जा सकता लेकिन इस स्वतंत्रता के नाम पर हिंदुओं की स्वतंत्रता को भी बाधित नहीं किया जा सकता. मुस्लिम समाज इस तथ्य पर क्या कहेगा कि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों से अधिकतर हिंदू परिवार पलायन क्यों कर रहें हैं? पलायन का दृष्टिकोण कहीं किसी नकारात्मक दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया तो नहीं है. अगर यह प्रतिक्रिया है तो फिर ऐसी प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार कारणों को दूर करना मुस्लिम समाज का परम दायित्व है.

    सौगाते मोदी के प्रयास को दोनों समुदाय को सही दृष्टिकोण में लेना चाहिए. कठोरता और कोमलता ममता का ही रूप होती है. मां अपने बच्चों को सही दिशा अनुशासन देने के लिए कई बार कठोर होती है. इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी ममता कम हो गई है. कठोरता भी सुधार के लिए है और कोमलता भी सुधार की ही चिंता है. 

    जब सब समानता के लिए प्रतिबद्ध हो जाएंगे तो फिर देखने का नजरिया भी समानता का ही होगा. दो समुदायों में समानता पर बढ़ने की भावना को विकसित ही करना पड़ेगा लेकिन समुदाय के भीतर भी स्त्री-पुरुष और अमीर-गरीब में समानता भी प्रोत्साहित करनी होगी. मुस्लिम महिलाओं को तलाक के कानून के पहले पति से अलग होने के लिए तलाक देने का अधिकार ही नहीं था. तलाक देने का अधिकार सिर्फ पुरुष के पास ही निहित था. स्त्री, पुरुष बराबरी के बिना कोई समाज विकसित नहीं हो सकता. पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं को आज नहीं तो कल छोड़ना ही पड़ेगा.