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मुर्दा इतिहास पर लड़ते, धन के वर्तमान पर जुड़ते

सार

सांसदों के वेतन भत्तों में वृद्धि का प्रस्ताव संसद में शांति से पारित हो गया. इस पर ना कोई हंगामा हुआ, ना कोई चर्चा हुई और ना ही कोई विरोध हुआ. वेतन भत्तों में बढ़ोतरी के विधेयक चुपचाप पेश होते हैं, बिना चर्चा के पारित हो जाते हैं. विभिन्न दलों के सांसद जो हर बात पर हंगामा करते दिखाई पड़ते हैं, वह सब वेतन के मामले में एक साथ चुपचाप हो जाते हैं..!!

janmat

विस्तार

उस समय न बेरोजगारी की बात होती है, ना महंगाई की बात होती है, बीजेपी-कांग्रेस वेतन पर साथ-साथ खड़ी हो जाती है. मुर्दा इतिहास पर लड़ते राजनेता धन के वर्तमान पर जुड़ जाते हैं. जब अपने पे-बैंक की बात होती है तो फिर कोई वोट बैंक भी याद नहीं आता.

सांसदों का वेतन बढ़ा है तो हर राज्य में विधायकों का वेतन भत्ता बढ़ेगा ही. संसद में सांसदों के वेतन भत्तों में 24 प्रतिशत की वृद्धि की है, यह वृद्धि 2023 से प्रभावशील मानी गई है. महंगाई बढ़ेगी तो सभी लोकसेवकों को वेतन वृद्धि की अपेक्षा होगी. सरकारी कर्मचारियों के लिए भी आठवां पे-कमीशन घोषित कर दिया गया है. इसकी रिपोर्ट और उस पर सरकार के निर्णय एवं अमल में तो समय लगेगा लेकिन सांसदों को तो वेतन वृद्धि का लाभ मिल ही गया है.

 

देश की कुल जनसंख्या का अधिकतम दो प्रतिशत हिस्सा ही संसदीय व्यवस्था और सरकारी सिस्टम में शामिल है. देश के दो प्रतिशत हिस्से के लिए केंद्र और राज्य की कुल आय का लगभग 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खर्च किया जाता है. इस खर्च में सांसद-विधायकों के साथ ही कार्यपालिका और न्यायपालिका के वेतनभत्तों के अलावा पेंशनर्स को दी जाने वाली पेंशन भी शामिल होती है. किसी भी राज्य के बजट का विश्लेषण किया जाएगा तो यह खर्च राज्य की कुल आय के आधे के आसपास ही होगा. सबसे पहला सवाल तो यही है कि आबादी का हिस्सा 2 प्रतिशत और उस पर खर्च 50 प्रतिशत.

स्थापना खर्चों को ही कम करने के लिए वर्ष 2005 से कंट्रीब्यूटरी न्यू पेंशन स्कीम लागू की गई है, इसे भी राजनीति का मोहरा बनाया गया है. कांग्रेस शासित राज्यों में पुरानी पेंशन लागू करने के वायदे के साथ सरकारें बनाई गयीं. यह अलग बात है की नई पेंशन स्कीम में शामिल लोकसेवक 35 वर्षों के बाद सेवानिवृत होंगे, तब तक कौन सी पार्टी होगी, कौन सी पार्टी सत्ता से बाहर होगी. लेकिन जो भी पार्टी सरकार में होगी उसको सरकारों का खर्च चलाना लगभग नामुमकिन होगा. सरकारों पर आज के हालात में ही कर्जों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है.

 

यह तथ्य भी जानना जरूरी है कि वर्ष 1954 से प्रति व्यक्ति आय आठ गुना ही बढ़ी है लेकिन सांसदों का वेतन चार सौ गुना बढ़ गया है. एक तरफ वेतन वृद्धि और दूसरी तरफ जवाबदेही में कमी, संसदीय व्यवस्था की कमजोरी स्थापित कर रहा है. देश में अस्सी करोड़ लोगों को जीवन यापन के लिए सरकार के 5 किलो मुफ्त अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है. निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का एक तरफ वेतन बढ़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ उनका स्वरूप भी बदल रहा है.

पहले जहां आम गरीब लोग निर्वाचन में शामिल होने की क्षमता रखते थे, निर्वाचित होकर सांसद बन जाते थे वहीं अब खर्चीली चुनाव प्रक्रिया में धन संपन्न लोग ही चुनाव लड़ने के लिए सक्षम हो पा रहे हैं. चुनाव सुधार के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ए.डी.आर. के मुताबिक मौजूदा लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्यों में से 504 यानी 93 प्रतिशत करोड़पति हैं. निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की संबंधता बड़ी है, इसके बावजूद राजनीतिक भ्रष्टाचार कम नहीं हो रहा है. घूंस लेकर सदन में वोट देने का प्रकरण भी देश ने देखा है. पैसे लेकर सवाल पूछने तथा विकासनिधि के कार्यों में कमीशनखोरी के स्टिंग ऑपरेशन देखकर देश शर्मशार हुआ है. सांसद विधायक विकास निधि में सीधे जब से हिस्सेदार हुए हैं तब से कमीशनखोरी की शिकायत भी बढ़ी हैं.

अभी मध्य प्रदेश की विधानसभा में विधायकों को विकास के लिए 15 करोड़ रुपए की राशि दिए जाने पर काफी हंगामा हुआ. कांग्रेस की तरफ से आरोप लगाया गया कि यह राशि सत्ता पक्ष के सदस्यों को दी जा रही है लेकिन विपक्ष को इससे दूर रखा गया है. सरकारी धन में निर्वाचित प्रतिनिधियों को मंजूरी के अधिकार दिए जाने के बाद जो समस्या सिस्टम में व्याप्त है उसी का विस्तार इसमें भी दिखाई पड़ता है.

वेतन भत्ते और सुविधाएं निर्वाचित सांसदों और विधायकों  के लिए आवश्यक हो सकता है, उनका अधिकार भी हो सकता है, लेकिन इसके निर्धारण और वृद्धि के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया की आवश्यकता है. जब शासकीय लोक सेवकों के लिए पे-कमीशन बनाया जाता है तो फिर सांसदों-विधायकों के लिए भी ऐसे किसी कमिशन का गठन क्यों नहीं किया जाता ? हर राज्य में विधायकों के लिए अलग-अलग वेतन भत्ते हैं, इसमें एकरूपता क्यों नहीं लाई जा सकती ? वैसे तो खुली आंखों से भी यह दिखाई पड़ता है कि सांसद और विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र और कार्यालय के संचालन में जितनी राशि खर्च करता है वह उसके वेतन भत्तों से पूरी नहीं हो सकती. इसको देखने के लिए किसी शोध की जरूरत नहीं है, बंद आंखों से भी  देखा जा सकता है.

उनका रहन-सहन, जीवन स्तर और गाड़ियों के बड़े-बड़े काफिले इतने वेतन में तो पूरे नहीं हो सकते हैं. इसका मतलब है की निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास कोई जादू की  छड़ी है जिससे वह अपने खर्च पूरे करते हैं. चुनाव लड़ने के लिए चुनाव आयोग भले ही खर्च की सीमा निर्धारित करता हो लेकिन इस सीमा में जमीन पर चुनाव लड़ने वाला बिरला नेता ही हो सकता है.

 

चुनाव सुधार के लिए कोई दल प्रयास नहीं करता, कोई सर्वानुमति नहीं बनती. राजनीतिक दलों को चंदे के कानून पर भी सबकी अलग-अलग राय है. दाग एक ही है लेकिन  देखने का नजरिया अलग-अलग है, अपने हैं तो दाग भी अच्छे लगते हैं और दूसरे की सफेदी को भी दाग समझते हैं. जनसेवा जब धन प्रबंधन तंत्र बन जाती है तब व्यवस्थाओं का चीर-हरण होने लगता है. जवाबदेही केवल दिखावा और प्रचार तक सिमट जाती है.