पूरा देश और मीडिया जुबानी जंग का मैदान बना हुआ है. संवाद की संसद में, संवाद के अलावा सब कुछ होता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वरदान ऐसे शब्दों की परतंत्रता तक सिमट गया है, जो चर्चा में ला सके..!!
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें लोकसभा में बोलने नहीं दिया जाता. राहुल गांधी के हाव-भाव स्पीकर को इतना आहत कर जाते है कि, वह मर्यादा और गरिमा की नसीहत दे देते हैं.
नसीहत वह भी गांधी परिवार के वारिस को? इस पर तो विवाद होना ही था. कांग्रेस सांसद स्पीकर से मिलकर अपना एतराज़ जताते हैं. सबसे बड़ा सवाल कि, नेता प्रतिपक्ष ने ऐसा क्या किया जिससे स्पीकर को लगा कि सदन की गरिमा गिराई गई है? स्पीकर ने यहां तक कहा कि, नेता प्रतिपक्ष और सदस्यों को शालीनता बनाए रखना चाहिए. सदन में अनेक बार पिता, पुत्र, पति, पत्नी, भाई-बहन एक साथ सदस्य रहे हैं.
सोशल मीडिया पर जो वीडियो देखे गए उसमें राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका गांधी से कुछ बात करते दिखाई पड़े. उनके हाव-भाव को स्पीकर ने शालीनता के विपरीत मानकर मर्यादा का सख्त सुझाव दिया. इसके पहले भी सदस्यों के टी-शर्ट पहनने पर स्पीकर सख्त ऐतराज कर चुके हैं.
बोलने की आजादी जितनी भारत में है, उतनी दुनिया के किसी देश में नहीं हो सकती. इसके दुष्प्रभाव भी कई बार दिखाई पड़ते हैं. संसद में तो बोलने की आजादी पर संसदीय इम्यूनिटी भी प्राप्त है. सदन का नेता और नेता प्रतिपक्ष को तो शायद कभी भी यह शिकायत नहीं होना चाहिए कि उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया जाता. उन्हें तो यह संसदीय अधिकार है कि इस संसद के नियमों के मुताबिक कभी भी अपने विचार रख सकते हैं.यह आवश्यक है कि नियमों का पालन तो हर सदस्य को करना पड़ेगा. दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह बन गई है कि, विपक्ष संसदीय नियमों को दरकिनार कर संसद को राजनीतिक मंच बनाने से भी परहेज नहीं करता.
केवल जुबान नहीं बोलती, बहुत कुछ बोलता है. मौन बोलता है. वेशभूषा बोलती है. नीयत बोलती है. समय, पैसा और कर्म बोलता है. मनोभाव बोलते हैं. यहां तक कि विरासत और परिवार भी बोलता है. राहुल गांधी तो अपने हाव भाव से कई बार संसद को ही चौंका देते हैं.
यह घटना कभी नहीं भुलाई जा सकेगी जब राहुल गांधी सदन के अंदर अपने स्थान से उठकर प्रधानमंत्री के पास जाकर उन्हें गले लगा लेते हैं. प्रधानमंत्री सहित, सदन अचंभित हो गया था. उनकी संसद में आँख मारने की घटना भी सभी को याद है. चैनलों पर लाइव में यह सारे दृश्य देश ने देखे थे. राहुल गांधी केवल जुबान से ही नहीं बोलते. जुबान से बोलने पर स्पीकर नियमों की पाबंदी लगा सकते हैं लेकिन हाव भाव और वेशभूषा से राहुल गांधी जब बोलते हैं तब उस पर तो कोई भी रोक नहीं लगा सकता.
राहुल गांधी की सफेद टी-शर्ट हमेशा चर्चा में रहती हैं. ठंड में भी टीशर्ट पहनना, ब्रांड राहुल का सोचा समझा प्लान है. संसद का कोई ड्रेस कोड नहीं है लेकिन निर्वाचित पद बैठे व्यक्ति से ऐसे आचरण की उम्मीद की जा सकती है कि, उसकी वेशभूषा ऐसी हो जो भारतीय संसद, भारतीय संस्कृति और भारतीय शैली को प्रतिबिंबित करें.
राहुल गांधी की पर्सनैलिटी गांधी परिवार की विरासत के साथ ही गढ़ी गई है. इसके बिना उसका कोई आधार बच नहीं सकता. परिवार की विरासत ही उनकी ताकत है. और उसी का सदुपयोग-दुरुपयोग उनके हावभाव और जेश्चर में दिखाई पड़ता है.
संसद में प्रदर्शन के दौरान सांसदों पर हमला करने का भी उन पर आरोप लगा था. उन पर केस भी दर्ज हुआ था. राहुल गांधी को स्पीकर को हर बार यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि, लोकसभा का यह प्राथमिक नियम है, जो व्यक्ति इस सदन का सदस्य नहीं है उस पर कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता. राहुल गांधी का कोई भी भाषण अडानी, अंबानी के नाम के बिना पूरा ही नहीं होता.
संसदीय नियमों में यह संभव है कि लोकसभा सचिवालय भाषण के ऐसे वाक्य को विलोपित कर देता है. इस पर भी कई बार कांग्रेस द्वारा हंगामा किया गया हैं.
संसद के अलावा आजकल हर नेता का सोशल मीडिया बोलने की आजादी से भरा पड़ा होता है. जो संसद में नहीं बोला जा सकता वह सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया जाता है. कोई भी अगर कुछ भी कहना चाहता है तो इस दौर में तो ऐसा नामुमकिन है कि, उसकी बात को रोका जा सके. नियम के अनुरूप संसद में उठाया जा सकता है नहीं तो उसका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तो उसकी राजनीतिक संसद का ही स्वरूप बन जाती है.
राहुल गांधी कांग्रेस में जिम्मेदार नेताओं और कार्यकर्ताओं को बोलने की आजादी का ही संसदीय और समुचित उपयोग करना सिखा देते तो फिर पार्टी की छीछालेदर को बचाया जा सकता था. आए दिन नेताओं के बोल के कारण विवाद खड़े हो जाते हैं. दूसरे को तो छोड़िए, राहुल गांधी स्वयं अपनी बोल के कारण कई बार मुकदमों तक में फंस चुके हैं. यहां तक कि एक बार तो उनकी संसद सदस्यता भी चली गई थी.
अभी भी कई अदालतों में उनके खिलाफ मानहानि केस चल रहें हैं. अगर मानहानि के मामले में कोई नेता बार बार फंसता है, इसका सीधा मतलब है कि वह अपनी बोलने की आजादी का दुरुपयोग करने का आदी है.
ऐसा एक ट्रेंड चल रहा है कि राजनेता ऐसे ऐसे बयान दे देते हैं जो सभ्य समाज के सम्मानित लोगों को भी अपमानित करने वाले होते हैं. मध्य प्रदेश के विधायक जो पहले विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं उनका एक बयान साधु संतों को अपमानित कर रहा है. कार्यकर्ता सम्मेलन में पीसीसी प्रेसिडेंट और प्रदेश प्रभारी की उपस्थिति में यह बयान देते हैं कि, सांड बनकर साधु संत खेत चर रहे है. इसे बोलने की आजादी कहा जाएगा. अगर ऐसे ही आजादी कांग्रेस के लोग चाहते हैं तो फिर तो उनको राजनीति से आजादी मिलना चाहिए.
राहुल गांधी का आंकलन उनके परिवार और विरासत से नहीं होगा बल्कि उनके खुद के कर्मों से होगा. बोलने की आजादी दुधारी तलवार है. जिसको नाचना आता है, वह आंगन की परवाह नहीं करता. मर्यादा, शालीनता और संसदीय नियम संसदीय जीवन का आधार है. नहीं बोलना या कम बोलना मंजूर हो सकता है लेकिन मर्यादाहीन बोल या हावभाव दूसरे को नुकसान बाद में पहुंचाते हैं, खुद को तो बोलने के साथ ही नुकसान पहुंचा देते हैं.