कॉमेडियन को भी गंभीरता से लिया जाने लगा है. कॉमेडी में हेट स्पीच तोड़-फोड़ और केस तक पहुंच गई है. हंसना-हंसाना जिंदगी है. लेकिन गंभीरता सियासत है. सियासी बयानों में वही शब्द हजारों बार प्रयोग किए गए होंगे, लेकिन कॉमेडी में इस गद्दार शब्द का उपयोग हेट स्पीच बन गया..!!
इस कॉमेडी में भी सियासत ही दिखाई पड़ती है, अन्यथा अगर इससे कोई आहत हुआ है, तो फिर उसके दुख को कम करने के लिए उसे हंसाने के लिए माफी से ज्यादा बेहतर कोई दवा नहीं हो सकती.
मुंबई के कॉमेडियन कुणाल कामरा केस में तो फंस गए हैं, लेकिन अभी तक माफी नहीं मांगी हैं. पॉलिटिक्स में तो माफी भी एक कॉमेडी जैसा ही होता है. आजादी के समय अंग्रेजों से किसने लड़ाई लड़ी, किसने माफी मांगी, इसके लिए कॉमेडी अब तक चल ही रही है. दल-बदल में कौन गद्दार है और कौन सरदार है, यह जनादेश तय करता है.
महाराष्ट्र में शिवसेना में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत ही आज असली शिवसेना साबित हो गई है. अदालत, चुनाव आयोग में तो साबित ही हुई है. जनादेश में भी इसी शिवसेना को असली शिवसेना मान लिया गया है.
शिवसेना की इस बगावत की पीड़ा उद्धव ठाकरे और उनका परिवार कभी भी भूल नहीं पाएगा. ठाकरे परिवार तो बगावती शिवसेना को खासकर एकनाथ शिंदे को पानी पी-पी कर गद्दार करार देते रहे हैं. इसका जवाब भी उन्हें हिंदुत्व की विरासत का सौदा करने वालों के रूप में मिलता रहा है.
शिवसेना छोड़ने के बाद तो एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए. चुनाव के बाद उपमुख्यमंत्री बन गए हैं. उद्धव ठाकरे के गद्दार कहने पर उन्हें उतना एतराज नहीं होता जितना एतराज कॉमेडियन के गद्दार कहने पर हो रहा है.
पॉलिटिक्स में जनादेश सर्वोपरि होता है. इसी के लिए पॉलीटिशियन कॉमेडी और ट्रेजेडी का खुलकर प्रयोग करते हैं. पॉलिटिकल हेट स्पीच खुद जितनी दे सकते हैं, उतनी तो देते ही हैं, फिर अनुयायियों से उसकी धार तेज करते हैं. आज-कल तो साधु-संत, मुल्ला-मौलवी भी हेट स्पीच के टूल बने हुए हैं. यह सारे टूल अंततः सियासत का ही हिस्सा होते हैं. कॉमेडी भी सियासत का ही पार्ट है.
कॉमेडियन का विरोध करने वाले एक तरफ हैं, तो उसका समर्थन करने वाले भी सियासी जमात में ही शामिल हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. अगर देश में सबसे अधिक संविधान के किसी प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है, तो वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. स्वतंत्रता से बड़ी कोई चीज नहीं है, लेकिन कर्तव्य और मर्यादा इससे जुड़ी है. कानून के राज का यही आशय है, कि हर नागरिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा उपयोग करें. लेकिन कर्तव्यबोध और मर्यादा के साथ किसी भी कथन से अगर किसी को भी ठेस पहुंचती है, उसका अपमान होता है, उसकी मानहानि होती है, तो फिर कानूनी प्रक्रिया स्वाभाविक है.
मानहानि के मामलों में भी पहली शर्त यही होती है, कि माफी मांग ली जाए. जब माफी नहीं मांगी जाती, तब फिर केस की कार्यवाही प्रारंभ होती है. राजनीति में एक दूसरे के खिलाफ मानहानि के मामले की संख्या तो बढ़ती जा रही है. राहुल गांधी तो मानहानि के मुकदमे झेलने वाले अभ्यस्त नेता कहे जा सकते हैं. मानहानि के मामले में उनकी संसद सदस्यता भी चली गई थी. अदालत से रोक के बाद ही उनकी सदस्यता बहाल हुई थी. उनके खिलाफ कई अदालतो में मानहानि के मामले अभी भी चल रहे हैं.
वैसे मानहानि के मामले सियासत में ज्यादा होते हैं. पिछले कुछ सालों से कॉमेडियन भी ऐसे मामलों में उलझते देखे गए. यह शायद इसलिए होता है, क्योंकि कॉमेडियन अपनी सियासी प्रतिबद्धता के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने लगते हैं. मौजूदा मामले में जिस तरह से कॉमेडियन के पक्ष में उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी खड़ी हो गई है, उससे तो यही लग रहा है, कि यह कॉमेडी भी एक पॉलिटिकल ट्रेजेडी है.
अभी भी अदालतों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिक महत्व दिया जाता है. खासकर कॉमेडी और संस्कृति के पक्षों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार किया जाता है. जब कॉमेडी के मंच को ही सुनियोजित ढंग से राजनीति में उपयोग किया जाएगा तो फिर ऐसे विवाद स्वाभाविक हैं. इन हालातो में विवादों को टाला नहीं जा सकता.
महाराष्ट्र तो इस समय गठबंधन की सियासत के अस्तित्व की कहानी लिख रहा है. शिवसेना के जनक बालासाहब ठाकरे ने जो सोचा भी नहीं था, वह उनके वारिसों ने कर दिखाया. हिंदू हृदय सम्राट की विरासत को कांग्रेस के साथ जाकर उद्धव ठाकरे ने जो दुस्साहस किया था, उसी का परिणाम एकनाथ शिंदे की नई राजनीति कही जा सकती है.
कॉमेडी और पॉलिटिक्स में भाषा का स्तर गिरता ही जा रहा है. जब भी यह सोचा जाता है, कि अब तो हद हो गई है, तो कुछ समय बाद ही गिरावट की नई हद सामने आ जाती है. हास्य की भावना जीवन का आधार है, लेकिन किसी को अपमानित करने के दृष्टिकोण से निर्मित हास्य, अपराध की श्रेणी में आ जाता है.
गुस्सा, हताशा, चिंता और उदासी जैसा हंसी भी ईश्वर प्रदत्त गुण होती है. इसमें केवल हंसी सकारात्मक है, बाकी सब नकारात्मक है. समाज में नकारात्मकता इतना हावी हो गई है, कि आजकल चैनलों पर कॉमेडी शो और कॉमेडी फिल्मों को ज्यादा सराहना मिलती है.
पॉलिटिक्स कॉमेडी और ट्रेजडी में भी अपना मार्ग तलाश लेती है. जिनका प्रोफेशन पॉलिटिक्स है, वह भी जनता के चेहरे पर खुशी लाना चाहते हैं. उनकी चाहत और वास्तविकता भले ही कभी एक साथ नहीं हो पाएं, लेकिन चाहत तो हंसी फैलाने की ही होती है. पॉलीटिशियन और कॉमेडियन दोनों हंसी के सौदागर हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मान देना दोनों का धर्म है. यह स्वतंत्रता बाधित ना हो, लेकिन इसका दुरुपयोग भी ना हो, यह हम सब की जिम्मेदारी है.