एलन मस्क के एआई ग्रोक जवाबों से राजनीति में तूफान मचा है. ग्रोक पीएम मोदी और सत्ता पक्ष को लेकर ऐसे ऐसे जवाब दे रहा है, जिससे विरोधी खुश हैं तो समर्थकों में निराशा है. ग्रोक राहुल गांधी को लेकर भी दिलचस्प जवाब दे रहा है. यूट्यूबर पत्रकार ऐसे खुश हो रहे हैं, जैसे एआई से मोदी को बदनाम किया जा सकता है..!!
एआई को ऐसे देखा जा रहा हैकि जैसे भविष्य में राजनीति इंटरनेट के प्लेटफार्म पर ही होगी. एआई को इंसान ने ही बनाया है. तकनीक के वेबाक जवाब देने की प्रवृत्ति उसके प्रशिक्षण डेटा से मिल रही है. इसकी डिजाइन में ही इसका इंटरफेस निहित है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), पॉलिटिकल इंटेलिजेंस (PI) से कभी बड़ा नहीं हो सकता. जैसे कि वोटर इंटेलिजेंस (VI) से बड़ा पॉलिटिकल इंटेलिजेंस नहीं होता. कौन सा एआई मुफ्त खोरी की योजनाओं की पॉलिटिकल इंटेलिजेंस का मुकाबला कर सकता है. बैंक खातों में नगद पैसे देकर जहां चुनाव की दिशा मोड़ी जाती है, वहां एआई या अन्य तकनीक का कोई दूसरा प्लेटफार्म क्या प्रभाव डाल सकता है? इससे डाटा जुटाया जा सकता है. संदर्भ निकाले जा सकते हैं. गणना सटीक की जा सकती है. कंटेंट बनाया जा सकता है लेकिन एआई और तकनीक का दूसरा इंटरफेस वही बता सकता है, जो डेटा उसको उपलब्ध कराया जाएगा. उपलब्ध कराने वाला हमेशा उस टेक्नोलॉजी और इंटरफेस से ऊपर ही होगा.
इसके पहले डीप फेक वीडियो की खूब चर्चा हुई. कुछ लोगों को निशाना भी बनाया गया लेकिन धीरे-धीरे इस तरह के फ्रॉड एक्सपोज होते गए. एआई के तूफानी जवाब भी अपनी विश्वसनीयता अंततः खो ही देंगे. किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग जब किसी को बदनाम करने या अफवाह फैलाने के लिए संगठित गिरोह द्वारा किया जाने लगता है तो फिर टेक्नोलॉजी की सुविधा भी निहित उद्देश्यों के लिए काम करने लगती है. टेक्नोलॉजी के कारण जितनी सुविधा बढ़ी है उतनी ही साइबर फ्रॉड की घटनाओं में इजाफा हुआ है. अब एआई फ्रॉड आकार लेने लगेगा.
ग्रोक के लांच होने के बाद सबसे ज्यादा सवाल पीएम मोदी को लेकर ही पूछे गए होंगे. यह सवाल भी मोदी और भाजपा विरोधी, कांग्रेस या वामपंथी विचारधारा के लोगों द्वारा ही किए गए होंगे. उत्तर से उत्साहित इस समूह ने ऐसा महसूस किया कि अब तो मोदी को टारगेट करने के लिए एआई टूल सबसे कारगर होगा. कई ऐसे यूट्यूबर पत्रकार हैं जो पहले मीडिया की मुख्य धारा में हुआ करते थे. मुख्य धारा से निकलने के बाद यह पत्रकार अपने यूट्यूब या दूसरे प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं. उनकी फॉलोइंग भी है लेकिन विश्वसनीयता नहीं बन पाती क्योंकि तार्किक-अतार्किक ढंग से मोदी का विरोध करना उनका टारगेट होता है. ग्रोक के उत्तरों से उनमें खुशी की लहर इसलिए आई क्योंकि एआई जैसे उत्तर दे रहा है, वैसे उत्तर या ख़बर वह हमेशा दिया करते हैं.
इंटरनेट मीडिया प्रभावशाली होने के साथ ही नरेंद्र मोदी उसके पहले टारगेट थे. गुजरात दंगों के बाद तो नफरत की राजनीति का उन्हें सरदार बताया जाने लगा. मोदी के अंध विरोध ने ही उनकी एक ऐसी मजबूत पर्सनालिटी विकसित की है, जो देशवासियों को पसंद आ रही है. अगर उनका इतना पुरजोर विरोध नहीं किया गया होता तो शायद उनकी पर्सनैलिटी की धार और चमक इतनी पैनी नहीं होती.
मोदी की पर्सनेल्टी पर अटैक करने की एआई रणनीति भी फेल ही होना है क्योंकि मोदी एआई की राजनीति नहीं करते. वह भारत की जमीनी राजनीति करते हैं. एआई और जमीनी हकीकत में सूरज चांद की दूरी है. अफवाह, साजिश और बदनामी लोगों को स्वयं का मूल्यांकन करने का अवसर देती है. और यही से वास्तविक नेतृत्व उभर कर आता है.
इसी प्रकार राहुल गांधी को इंटरनेट मीडिया पर पप्पू स्थापित करने में कोई कमी नहीं रखी गई है. उनके राजनीतिक विरोधियों ने भी इसमें भरपूर हिस्सेदारी की है. इस सब के बावजूद राहुल गांधी आज भारतीय राजनीति में स्थापित राजनेता हैं. संसद का अपना चुनाव न वह सिर्फ जीत रहे हैं बल्कि पार्टी की बदहाल स्थिति को सुधारने में भी जुटे हैं . इसका मतलब है कि अगर इंटरनेट मीडिया की विश्वसनीयता होती है तो फिर राहुल गांधी तो अब तक पप्पू साबित हो चुके होते. वोटर इंटेलिजेंस ने किसी भी एआई उत्तर को अब तक तो स्वीकार नहीं किया है.
सोशल और इंटरनेट मीडिया की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा सवाल है. हंसी, मजाक, अफवाह, ट्रोलिंग के लिए तो इसमें बहुत सारी सियासी सेना और युवा वर्ग भी लगा रहता है लेकिन जब विश्वसनीयता की बात आती है तो पॉलिटिकल इंटेलिजेंस पर ही भरोसा किया जाता है.
परिवार वाद की राजनीति को कौन सा टूल रोक सकता है? इस पर लगाम तो वोटर इंटेलिजेंस ही लगा सकता है. सियासत जिस संकट से गुजर रही है, उसको बढाने का ही काम यह सारे टूल कर सकते हैं. उनके किसी समाधान में इनकी बहुत अधिक उपयोगिता अब तक तो साबित नहीं हुई है.
इंटरनेट मीडिया से एक जो ग्लोबल विलेज की अवधारणा प्रभावी हुई है, उसका जरूर दुष्प्रभाव देश की राजनीति पर पड़ता है. चाहे विदेशी धन हो, चाहे विदेशी सहयोग हो उससे भारतीय राजनीति को अस्थिर करने की कोशिशें होती जरूर हैं. लेकिन टोटल इंटेलिजेंस इस देश और अपने भविष्य को ज्यादा जानते समझते हैं और उसी अनुरूप आचरण करते हैं.
राजनीति के हिसाब से देश लगभग विभाजित है. मीडिया भी विभाजित है. कोई भी सच न कहने को तैयार है और ना सुनने को. वह अपने टूल किट के हिसाब से ही बातों को रखना चाहता है. इससे यह जरूर हो रहा है कि सूचनाओं की बाढ़ आ गई है. जब कभी बाढ़ आती है तो उससे बचना और उसका समाज और राष्ट्र के हित में उपयोग करना वोटर इंटेलिजेंस पर ही निर्भर करता है.
राजनेताओं की ताकत उनका संगठन होता है. उनकी पर्सनालिटी और विश्वसनीयता होती है. उनका विरोध होता है. विरोध हमेशा जिंदा लोगों का ही होता है. मुर्दा की तो लोग तारीफ किया करते हैं. एआई एक धंधा है. जहां धंधा है वहां मालिक धन के लिए अंधा है. सब धन के लिए खेल रहे हैं. कुछ लोग जानबूझकर और कुछ लोग अपने निहित स्वार्थ में ऐसे टूल किट का हिस्सा बन जाते हैं. एआई के मामले में भी भारत में कुछ ऐसा ही हो रहा है.