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बदलना होगा यह चरित्र

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 03 Apr

सार

केंद्रीय राज्यमंत्री एवं रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को भी ‘1984’ उपन्यास की याद आना सटीक लगता है..!!

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विस्तार

पुलिस लगभग देश के हर राज्य में एक जैसे चरित्र में है। ‘होली बनाम नमाज’ और ‘होली बनाम नवरात्रि’ तथा हिंदू-मुसलमानों के त्योहारों के समग्र परिप्रेक्ष्य में, खासकर पुलिस के आदेशों का, विश्लेषण किया जाए, तो ‘1984’ की कथा आज भी भारत के कई हिस्सों में प्रासंगिक लगती है। केंद्रीय राज्यमंत्री एवं रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को भी ‘1984’ उपन्यास की याद आना सटीक लगता है। 

जॉर्ज ऑरवेल का यह उपन्यास 1949 में प्रकाशित हुआ था, जिसकी कहानी भविष्य के एक काल्पनिक प्रांत पर आधारित थी। उस प्रांत की पुलिस निरंकुश, तानाशाही प्रवृत्ति की होगी और आम नागरिक के अधिकारों का हनन होगा। यह एक काल्पनिक समाज विज्ञान का चित्रण था। प्रांत का नाम ‘ओशिनिया’ रखा गया था। यूँ तो भारत एक स्थापित लोकतांत्रिक देश है, लेकिन इसकी बहुधा पुलिस काफी हद तक निरंकुश है। 

सडक़ पर नमाज अदा करने के हम भी खिलाफ हैं, लेकिन किसी निजी परिवार की छत पर भी नमाज पढ़ी नहीं जा सकती, यह लोकतांत्रिक आदेश नहीं लगता। मेरठ पुलिस ने तो एक कदम और बढक़र आदेश जारी कर दिए कि यदि नमाज संबंधी फरमान की अवहेलना की गई, तो आपराधिक केस दर्ज किया जा सकता है। उस शख्स का पासपोर्ट और लाइसेंस आदि भी रद्द किए जा सकते हैं।  

यह पुलिस का कौन सा संवैधानिक अधिकार है? बेशक संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह सडक़ या राजमार्ग बाधित कर अपना धार्मिक, सामुदायिक त्योहार मनाने का अधिकार नहीं देता। यह संवैधानिक अनुच्छेद कांवड़-यात्रा, जागरण, भंडारा और शोभा-यात्राओं पर भी उतना ही प्रभावी होना चाहिए। कांवड़-यात्रा के दौरान करीब एक माह तक सडक़, मार्ग और राजमार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।आम नागरिक का गुजरना दूभर हो जाता है। बल्कि सरकारी हेलीकॉप्टर से कांवडिय़ों पर पुष्प-वर्षा तक की जाती है। 

संवैधानिक अनुच्छेद का क्रियान्वयन दोगला कैसे हो सकता है? पुलिस का एक अफसर इतना निरंकुश कैसे हो सकता है कि रमजान-होली या नवरात्रि के त्योहारों पर ‘सेवइयां बनाम गुझिया’ की बात करे। विडंबना है कि मुख्यमंत्री या मंत्री का स्तर तो चरम अवस्था है, लेकिन जिला और प्रखंड स्तर के पुलिस अधिकारी भी ऐसे बयानों को खारिज नहीं करते। खामोशी से इन बयानों को मान्यता ही देते हैं। 

समग्रता में नतीजा यह है कि हिंदू बनाम मुसलमान का तनाव, विभाजन और नफरत का माहौल पसरा रहता है। उसी में से सांप्रदायिक दंगे पनपते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी हिंदू-मुस्लिम बस्तियों की बात कही है, जो भावनाओं को भडक़ाती है और असुरक्षा-बोध पैदा करती है। 

संयोग है कि नवरात्रि और रमज़ान एक साथ हैं, जबकि हिंदू त्योहार तो नौ लगातार दिन तक चलेगा। नवरात्रि के दिन उप्र, दिल्ली, मध्यप्रदेश, हरियाणा, राजस्थान आदि राज्यों में शोर मचा है कि नवरात्रि के दौरान मांस की दुकानें बंद रखी जाएं। हरियाणा सरकार ने सरकारी छुट्टी भी रद्द कर दी है। दिल्ली में मांस की अवैध दुकानों को बंद करने का सरकारी आदेश दे दिया गया है। ऐसा आभास दिया जा रहा है मानो मीट की दुकानदारी मुसलमान ही करते हैं! प्राप्त डाटा के मुताबिक, मीट का व्यापार करने वालों में करीब 60 प्रतिशत हिंदू हैं और 40 प्रतिशत मुसलमान हैं। 

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भी देश में 83.4 प्रतिशत पुरुष मांसाहारी हैं, जबकि 70 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं मांस खाती हैं। नवरात्रि के दौरान उत्तरी भारत की संस्कृति भिन्न है, जबकि पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पूर्वोत्तर राज्यों में नवरात्रि के दौरान भी मांस खाते हैं। प्रशासन कुछ भी जबरन नहीं थोप सकता और न ही जनता को बाध्य किया जा सकता है। मंदिरों के मुद्दे पर सरसंघचालक मोहन भागवत कुछ और विचार और नसीहत देते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री योगी की सोच बिल्कुल अलग है।