वैष्णव अखाड़े
(प्रमुख)
1. निर्मोही (अनी),
2. दिगम्बर (अनी),
3. निर्वाणी (अनी),
इतिहास:
श्री रामानन्द के समय तक हिन्दुओं की सामाजिक स्थिति बहुत गिर चुकी थी। मूर्तियों का खण्डन करना, विश्वासों का हनन करना विधर्मियों के कृत्य थे। कहा जाता है कि सिकन्दर लोदी (सन् 1489-1517 ई.) के समय तक हिन्दुओं पर अत्याचार करने का एक आन्दोलन ही चल पड़ा था और यह क्रम बढ़ता ही जा रहा था। यहाँ तक कहा जाता है कि सन् 1398 में तैमूर ने हरिद्वार में बहुत अधिक संख्या में बैरागियों को मरवा डाला था। ऐसी स्थिति में श्री बालानन्द का उदय हुआ जो कि आचार्य बृजानन्दजी के शिष्य थे। इन्होंने सन् 1672 में चतुः सम्प्रदाय एवं सम्बन्धित अखाड़ों को संगठित किया। घुर्ये यह मानते हैं कि वैष्णव बैरागियों के अखाड़े का संगठन 1650-1700 के बीच हुआ है। इस स्थान का एक कारण यह भी था कि वैष्णवों के चार वर्गों में विभाजन और मतभेद था जिसका लाभ लेकर शैव सम्प्रदाय के साधु-महात्मा बैरागियों को तंग किया करते थे। श्री बालानन्द ने पारस्परिक भेदभाव की उपेक्षा कर उन्हें एकसूत्र में बांधने के लिए ही अखाड़ों की प्रथा चलाई थी ताकि संगठित होकर वे प्रति पक्षियों से अपनी रक्षा के साथ ही तीर्थों की प्रतिष्ठा बचाने में भी समर्थ हो सकें।
"वृहद् उपासना रहस्य' कहा गया है
शस्त्र सुविधा सबहिं पढ़ाई। बाधेऊ सात अखाड़े भाई। स्वामी बालकानंद कृपाला। राखेउ तिलक लठो जस भाला।।
श्री वेदप्रकाश गर्ग उनके लेख 'वैष्णव अनी अखाड़े' में लिखते हैं कि 18वी शताब्दी में वैष्णव सम्प्रदायों को अनेक संकटों का सामना करना पड़ा था। यवन आक्रमणकारियों और विधर्मी शासकों से तो उनको अपना कष्ट था। वैष्णवेतर सम्प्रदायों की असहिष्णुता भी उनके त्रस्त कर रही थी। सुना जाता है कि विक्रम संवत् 1720 के लगभग किसी कुम्भ के अवसर पर नंगे होकर तीर्थ पर स्नान करने वाले शैव तथा शाक्त सम्प्रदायों को वैष्णवों ने रोका - 'तुम ऐसा शास्त्र विरुद्ध आचरण मत करो। तीर्थ जलाशयों में नग्न होकर स्नान करना निषिद्ध है।' इस पर वे चिढ़ गये। इसी शास्त्र विरुद्ध कृत्य को करना उन्होंने अपना धर्म समझ लिया और वैष्णवों पर अत्याचार करने लगे। कहा जाता है कि लक्ष्मीगिरि और भैरवगिरि नामक गुँसाइयों (शंकर मतावलम्बी) ने तो प्रतिदिन कम से कम पाँच-पाँच वैष्णवों का वध करके ही भोजन करने की प्रतिज्ञा कर ली थी। उन्हें जब वैष्णव नहीं मिलते थे तो वे आटे के वैष्णव बनाकर उन्हें तलवार से काटते थे और तब भोजन करते थे।
अखाड़ा' शब्द की उत्पत्ति:
श्री बाबूलाल शर्मा यह मानते हैं कि आम्नाय का अपभ्रंश रूप अखाड़ा है जबकि डॉ. भगवती प्रसाद सिंह की मान्यता है कि अखाड़ा 'अखण्ड' शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है। किन्तु रामदल के अनुयायी 'अखाड़ा' शब्द को इस रूप से ग्रहण नहीं करते। श्री नरहरिदास जी ने वार्तालाप के दौरान यह बताया कि अखाड़ा शब्द आध्यात्मिक रूप से प्रयोग किया जाता है, क्योंकि मल्लशाला में अखाड़े का प्रदर्शन नहीं होता।
बैरागियों के साम्प्रदायिक साहित्य में अखाड़े' की व्याख्या निम्न रूप से की गई है-
नाहमादिरखंडो यत्र स अखंड उदाहतः
चतुर्णा सम्प्रदायों अखाड़ा सप्त वै मताः।
अखंड संज्ञा संकेतः कृतो धर्म विवृद्धे
बालानन्द प्रभृति भिः सम्प्रदाय नुसारिभिः।।
सर्वेक्षण के अवसर पर यह भी ज्ञात हुआ कि अखाड़ों की अपनी शब्दावली है। रामादल के अनुयायी अखाड़ों को 'गाँव' कहते हैं! डॉ गंगादासजी ने जानकारी दी कि भारत में अखाड़ों की प्रमुख बैठक हैं - अयोध्या, वृन्दावन. चित्रकूट, नासिक एवं जगन्नाथ पुरी।
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नागा साधु
अखाड़ों की विशिष्ट शब्दावली