यमाद्यष्टाङ्गयोगेद्धब्रह्ममात्रप्रबोधतः योगिनो यत्पदं यान्ति तत्कैवल्यपदं भजे॥
प्राणायाम अष्टांग योग का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस अष्टांग योग का प्रचार हिंदू संस्कृति के संचालक महर्षियों ने युगारंभ से ही किया है। सतयुग में पारमार्थिक कल्याण चाहने वाले की संख्या भारतवर्ष में अत्यधिक थी। उस समय सामान्य जनता का जीवन भी संयमशील था। मन का संयम और इन्द्रियों का दमन करने की शिक्षा दी जाती थी।
संयम न रखने वाला समाज में पतित माना जाता था। लोग व्यावहारिक छल-प्रपंच से सर्वांश में मुक्त थे। उनका जीवन सत्य-सदाचारमय था। धर्मशास्त्र कथित चार वर्ण और चार आश्रमों का पालन आग्रहपूर्वक किया जाता था।
सतयुग की जनता के जीवन में सत्य, सदाचार और संयम स्वाभाविक होने से अष्टांग योग का अभ्यास विधिवत होता था। सद्गुरु का जीवन भी परोपकार परायण होता था। उसके शिष्यों का अभ्यास निर्विघ्न चलता रहता था। दुष्ट प्रारब्ध से या भ्रम-प्रमादवश यदि कुछ हानि पहुँचती तो सद्गुरु अपने मानस बल से तुरंत उसे सम्हाल लेते थे और शिष्य का अभ्यास पूर्ण होने पर उन्हें घर जाने की अनुमति देते थे।
सत्ययुग के पश्चात् त्रेतायुग में जन-समाज में सत्य, सदाचार और संयम की मात्रा कुछ कम हुई। सत्य सदाचारादिके पालन करने वाले तो बहुत थे और आज कल में भी हैं, किंतु सत्य पालन करने वाले संयमशील मनुष्यों की संख्या कम हो गयी थी।
त्रेतायुग की अपेक्षा द्वापर में सत्य-सदाचारयुक्त संयमशीलों की संख्या और कम हुई और कल में इससे भी बहुत कम हो गयी। इस समय कलयुग के लगभग 5000 वर्ष व्यतीत हुए हैं, इतने में ही वर्तमान के कंट्रोल-कानून की कृपा से तो सत्य भारत वर्ष के कोने-कोने से प्रायः विदा होता जा रहा है।
सत्य, सदाचार और संयम का ज्यों-ज्यों ह्रास होता गया, त्यों-ही-त्यों अभ्यास करने वालों की संख्या कम होती गयी। इस समय योगाचार्यों की शिष्य परम्परा छिन्न-भिन्न हो गयी है। योगाभ्यास की इच्छा वाले मुमुक्षु सद्गुरु की प्राप्ति के लिये चारों ओर पत्र-व्यवहार करते रहते हैं।
कई मुमुक्षुजन स्वार्थी, अपूर्ण ज्ञान वाले योगाभ्यासी के कथनानुसार अभ्यास करके रोग पीड़ित हो गये हैं। उपनिषदों में वर्णित या भगवान पतंजलि कथित समाधि प्राप्त योगी इस युग में भी कहीं होंगे, किंतु वे साधारण जनसमाज के परिचय में नहीं हैं। साधारण जनता को अपूर्ण ज्ञान वालों का आश्रय से ही योगाभ्यास करना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में प्राणायाम का अभ्यास करने की इच्छा रखने वालों को कुछ मार्ग निर्देश प्राप्त हो, इसके लिये अपने अनुभव के अनुसार संक्षेप में लिखने का प्रयास करता हूँ।
प्राणायाम से शरीर-शुद्धि के अतिरिक्त मनोबल की प्राप्ति होती है। इसी से महर्षियों ने सन्ध्यावन्दना के साथ नित्य प्राणायाम का विधान किया है। 'प्राणायाम से पाप जल जाते हैं। यह संसार-समुद्र को पार करने के लिये महासेतु रूप है।' इस प्रकार का फल सुनने पर बहुतों के मन में प्राणायाम करने की इच्छा जाग उठती है।
पर विधिवत अभ्यास उन्हीं को करना चाहिये, जो वस्तुतः अधिकारी हों; अनधिकारी को नहीं, अन्यथा उल्टे इतनी हानि पहुँच सकती है कि फिर वे व्यवहार संभालने में भी असमर्थ हो जाते हैं।
प्राणायाम का तात्पर्य- प्राणायाम का अर्थ है प्राण का व्यायाम श्वसन-क्रिया में अपानवायु को जो बाहर से आकर्षित किया जाता है और प्राणवायु को जो बाहर निकाला जाता है, इसी क्रिया को विधिवत करने का नाम प्राणायाम है। विधि के अनुसार आकर्षण को 'पूरक', धारण को 'कुम्भक' और त्याग-बाहर निकालने को 'रेचक' कहते हैं; इन त्रिविध क्रियाओं का सम्मिलन ही प्राणायाम है।
भीतर जो वायु आकर्षित की जाती है, वह स्वरयंत्र, बृहत् श्वासनलिका और विभाजित श्वासनलिकाओं के द्वारा फुफ्फुसों के भीतर वाले वायु को वायु कोष्ठ के अंदर प्रवेश कराती है। उसका कुछ परिचय चित्र देखने पर मिल सकेगा।
फुफ्फुसकोषों में वायु कुछ अंश में सदा भरी रहती है। जीवित अवस्था में कभी भी वे बिल्कुल खाली नहीं होते। इनमें नयी वायु प्रवेश करती रहती है और पहले की दूषित वायु बाहर निकलती जाती है, प्राणायाम होने पर वे शुद्ध हो जाते हैं।
विभाजित श्वासनलिकाओं में से शाखा-प्रशाखा होकर अति सूक्ष्म प्रणालिकाएँ बन जाती हैं। उनके भीतर का मार्ग अति सूक्ष्म रहता है। उनका अंतिम सिरा वायु कोष्ठों से सम्बन्ध रखता है। ये वायु कोष्ठ अर्धगोला का हैं।
उन पर स्थिति-स्थापक स्नायु-सूत्र लपेटा हुआ है। इस स्नायु- सूत्रके आधार से वे बार-बार फैलते और सिकुड़ते हैं। जिस प्रकार रबर की थैली वायु भरने पर फूलती है और वायु निकाल देने पर मूल स्थिति में आ जाती है, उसी प्रकार वायु कोष्ठ वायु का पूरक होने पर फूलते हैं और रेचन होने पर उनका फुलाव दूर हो जाता है।
इन कोषों की स्थिति-स्थापक शक्ति बाल्यावस्था में अभ्यासद्वारा शनैः शनैः बढ़ायी जा सकती है, युवावस्था में किसी की शक्ति मर्यादित परिमाण में बढ़ सकती है और प्रौढ़ावस्था के पश्चात् नहीं बढ़ सकती। क्योंकि उस अवस्था में स्थिति-स्थापक गुण नहीं रहता; स्थिति स्थापक गुण के न होने की स्थिति में यदि प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है, तो उससे रोग उत्पत्ति होती है।
बहुतों को वायु प्रकोष्ठ प्रसारण (Emphysema) हो जाता है। फिर, कफ, कास, श्वासकृच्छ्रता, थोड़े से कृशता, परिश्रम से श्वास भर जाना, रक्त में विष रह जाने से शिराओं का रंग नीला हो जाना, शारीरिक अग्निमान्द्य और हृदय में भारीपन आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
प्राणायाम के अधिकारी– 'त्रिशिखा ब्राह्मणोपनिषद् के अनुसार यम, नियम और आसनों से जिसने नाड़ियों को शुद्धि की हो, वे ही प्राणायाम के अधिकारी माने जाते हैं।' 'हठयोगप्रदीपिका' कार ने लिखा है कि जिसका आसन दृढ़ हो गया है, जिसने मन और इन्द्रियों को वश में कर रखा है तथा जो हितकर, पथ्य भोजन परिमित मात्रा में करता है, वह प्राणायाम का अधिकारी है। जो मुमुक्षु नीरोग हो, सत्य, सदाचार और संयम का पूर्ण पालन करता हो, उसी को अधिकारी माना गया है।
आहार-विहार में स्वच्छंदता और अनियमितता बिलकुल नहीं होनी चाहिये। तंबाकू, भाँग, गाँजा, चाय आदि का व्यसन नहीं होना चाहिए। देहके रोग-पीड़ित होने पर नाड़ियों की शुद्धि नहीं रहती, ऐसी अवस्था में भी प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिये। पाचन-संस्था और श्वसन संस्था का कोई रोग नहीं होना चाहिए।
पाचन-संस्था के रोगों में जीर्ण मलावरोध, अतिसार, वमनादि तथा श्वसन-संस्था के रोग-श्वास, कास, राजयक्ष्मादि होने पर भी प्राणायाम करने से वायु का या निर्गमन यथोचित नहीं हो सकता।
यदि किसी प्रवेश श्वासप्रणाली या वायु कोष्ठ में वायु का रोध होगा तो फिर उसमें से वह बलात् बाहर निकलेगा। अतः शरीर में रोग हो तो पहले औषधोपचार या षट्कर्म और आसनों के द्वारा उसे दूर कर देना चाहिये। सबल निरोगी मुमुक्षु को अभ्यास से जितना लाभ मिल सकता है, उतना निर्बल या रोगी को नहीं मिल सकता।
जिसे मस्तिष्क विकृति, हृदय विकृति, वात प्रकोप, रक्त दबाव वृद्धि, उपदंश, सूजाक, मधुमेह पाण्डु या कामला रोग हो, उसे प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिये। जिनकी छाती जन्मसिद्ध निर्बल हो, जिसको बाल्यावस्था में मृद्वस्थि (Rickets) रोग हो गया अथवा जन्मजात हो, आयु बड़ी हो जाने के कारण जिनकी नाड़ियों और वायु कोष्ठों की स्थिति-स्थापक शक्ति दूर हो गयी हो, उनको भी चाहिए कि वे प्राणायाम का अभ्यास करें।
अधिकारियों में आयुर्वेद से उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ-तीन प्रकार होते हैं। 8 से 20 वर्ष तक की आयु वाले उत्तम, 21 से 40 वर्ष तक के मध्यम और इससे बड़ी आयु वालों को कनिष्ठ अधिकारी समझना चाहिये।
उत्तम अधिकारी के वायु कोष्ठ अधिक आघात सहन कर सकते हैं, मध्यम के उससे कम और कनिष्ठ के बहुत ही कम उत्तम अधिकारी कुम्भक अधिक परिमाण में कर सकते हैं, मध्यम परिमित परिणाम में तथा कनिष्ठ अधिकारी तो कुम्भक बढ़ा ही नहीं सकते। इस अधिकार को लक्ष्य में रखे बिना कुम्भक बढ़ाने का प्रयत्न किया जायगा तो फुफ्फुसों के वायु कोष्ठों की स्थिति स्थापक शक्ति नष्ट हो जाएगी, फिर दूषित वायु के शोधन का कार्य सुचारु रूप से नहीं हो सकेगा।
अभ्यास स्थान - अभ्यास स्थान शहर से दूर वायु युक्त और स्वच्छ होना चाहिए। मच्छर आदि का उपद्रव नहीं होना चाहिए। एकांत हो, बाहर से मशीन आदि की या मनुष्यों की आवाज न आती हो। क्योंकि अकस्मात् आयी हुई आवाज बलपूर्वक वायु बाहर निकालकर हानि पहुँचा देती है।
वक्तव्य– अधिकारियों को चाहिये कि निःस्वार्थी, क्रिया पारायण, सद्गुरु के आश्रम में रहकर उनके आज्ञानुसार अभ्यास करें। दूर रहकर अभ्यास करने पर अभ्यास ठीक हो रहा है या उसमें कोई भूल हो रही है, यह विदित नहीं हो सकता। जो साधक केवल शास्त्र पढ़कर अभ्यास करने लगते हैं, वे बहुधा हानि उठाते हैं।
साधकों को चाहिये कि अभ्यास उतना ही करें कि जिससे बलका अति क्षय न हो। प्रतिदिन प्रातःकाल उठने के समय शरीर में उत्साह रहना चाहिए, थकावट बिलकुल न रहनी चाहिये। जल्दी अधिक लाभ मिल जाये, इस आशा से जो साधक अभ्यास का अतियोग करते हैं, उनके बल का क्षय होता है फिर अकस्मात् फुफ्फुस रोग, वात विकार अथवा हृदय रोग हो जाता है, जो औषधोपचार से भी दूर नहीं हो सकता।
प्राणायाम के समय मूल बंध, उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध- इन तीन बन्धों का आश्रय लेना पड़ता है। अत: इन तीनों बन्धों का अभ्यास पहले से कर लेना चाहिये। पैर के पाणिभाग के गुदद्वार के पास सीवन पर लगाने से गुदनलिका (Rectum) का आकुंचन होकर अपानवायु की ऊर्ध्वगति हो जाती है। इस क्रिया को 'मूल-बन्ध' कहते हैं।
नाभि के ऊपर और नीचे के उदर प्रदेश को, पीठ की ओर आकर्षित करने से वायु पूरित फुफ्फुसों के नीचे आधार मिल जाता है, जिससे फुफ्फुसों को वायु के आघात से हानि नहीं पहुंचती और रेचन क्रिया उचित रूप से होती है। इस क्रिया को 'उड्डीयानबन्ध' कहते हैं। गलबिलका आकुंचनकर चिबुक (ठोड़ी) को कण्ठ भाग से नीचे और हृदय प्रदेश के ऊपर स्थापित करने से फुफ्फुसगत वायु में चंचलता आने पर भी हानि नहीं पहुंचती तथा मस्तिष्क में संग्रहीत प्राणशक्ति (प्राण वायु में रूपांतरित विद्युच्छक्ति) का व्यय नहीं होता। इस क्रिया को 'जालन्धर बन्ध' कहते हैं।
प्राणायाम के अभ्यास के पहले देह में अति मेद, मति, कफ, अति मल या आम रहा हो, अथवा मस्तिष्क, उदर, फुफ्फुसादि प्रदेश में अधिक दोष रहा हो तो नेति, कपालभाति, धौति, नौलि, बस्ति और त्राटक-इन प्रक्रियाओं में से आवश्यक क्रिया करके प्राण मार्ग को शुद्ध और देह नाड़ियों को प्राण धारणक्षम बना लेना चाहिये। लेखका कलेवर बढ़ जाने के भय से षट्कर्मों का वर्णन यहाँ नहीं किया जाता।
प्राणायाम प्रकार- अनुलोम-विलोम, सूर्यभेदी, उज्जायी सीत्कारी, शीतली, भस्त्रा, भ्रामरी, मूर्च्छा और प्लाविनी– प्राणायाम के ये नौ प्रकार हैं। इनमें से रोगहीन मनुष्यों को देह के स्वाभाविक मलके शोधन और धारणशक्तिकी वृद्धि के लिये अनुलोम-विलोम प्राणायाम कराया जाता है। इसकी सिद्धि होने पर शेष आठ प्रकारों में से अनुकूल प्रकार का आश्रय लिया जाता है।
अनुलोम-विलोम प्रकार के प्राणायाम में दोनों फुफ्फुसों को सहन हो सके उतने परिमाण में व्यायाम होता रहता है और बीच-बीच में क्रमश: दोनों को विश्राम मिलता जाता है, श्वास-प्रणालिकाओं का मार्ग शुद्ध होता है और वायुकोष्ठों की धारण शक्ति शनैः शनैः बढ़ती जाती है। इस प्रकार में हानि पहुँचने का भय बहुत कम रहता है। इस हेतु से प्राणायाम के अभ्यास के प्रारम्भ में अनुलोम-विलोम का विधान किया गया है।
अनुलोम-विलोम विधि- अनुलोम-विलोम प्राणायाम विशेषतः पद्मासन लगाकर किया जाता है। इतर आसनों की अपेक्षा प्रारम्भिक अभ्यासियों के फुफ्फुसों के नीचे आधार रूप से उदर-प्रदेश आ जाने में फुफ्फुसों पर वायु का आघात पहुँचने का भय कम रहता है; किंतु जिन साधकों का पद्मासन ठीक न होता हो, दोनों पाष्णिभाग नाभि के दोनों ओर के उदर-प्रदेश पर उचित रूप से न लगते हों, उनको मूलबन्ध या स्वस्तिकासन या अन्य सुखासन से बैठाकर अभ्यास कराया जाता है।
प्राणायाम प्रारम्भ करने के समय गणपति का पूजन कर, इष्ट देवता को नमस्कार कर, पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में मुख रखकर मृदु आसन पर पहले चन्द्र नाड़ी (वाम नासापुट)- से श्वास ग्रहण करना अर्थात पूरक करना चाहिये। उसे यथाशक्ति धारण करें अर्थात कुम्भक करें। फिर सूर्य नाड़ी (दक्षिण नासापुट) से रेचन करें अर्थात वायु को बाहर निकाल दें। (यह एक प्राणायाम हुआ।) फिर सूर्यनाडी से पूरक करके कुम्भक करें और चन्द्रनाड़ी से रेचन करें अर्थात जिस नासापुट से रेचन करें, उसी नासापुट का पूरक करें। (यह दूसरा प्राणायाम हुआ।)
इस प्राणायाम के अभ्यास में पूरक, कुम्भक और रेचक- ये तीन क्रियाएं विधिवत होती हैं, मनगढ़ंत रीति से नहीं। कुम्भक उतने समय तक करना चाहिये कि रेचन क्रिया शांतिपूर्वक अन्तर शक्ति के बल से हो सके। बलात्से वायु बाहर न निकल जाए, इसकी सावधानी रखें।
यदि रेचक जल्दी हो जाएगा, तो वायु-प्रणालिकाओं में आघात पहुंचने की सम्भावना होगी। कुम्भक यदि शक्ति से अधिक काल तक रह जाएगा, तो वायुकोष्ठि का स्थिति-स्थापक गुण कम हो जाएगा। फिर वे यथोचित सिकुड़ नहीं सकेंगे परिणाम में रोगोत्पत्ति हो जाएगी।
अनुलोम-विलोम प्राणायाम के प्रारम्भ काल में बारह मात्रा (साढ़े सोलह सेकंड) का कुम्भक करने का शास्त्रोक्त विधान है, इसे 'कनिष्ठ प्राणायाम' कहा गया है। मध्यम प्राणायाम में चौबीस मात्रा (सवा तैंतीस सेकंड)-का और उत्तम प्राणायाम में छत्तीस मात्रा (पचास सेकंड) का कुम्भक किया जाता है। यह सामान्य नियम है।
किंतु साधक को साढ़े सोलह सेकंड का कुम्भक करना ही चाहिये, ऐसा आग्रह न रखें। वायु कोष्ठों की धारण शक्ति जितनी कम होगी, उतना ही कम कुम्भक हो सकेगा। इस धारण शक्ति को शनैः शनैः बढ़ाना चाहिए। वायु कोष्ठों की धारण शक्ति जल्दी बढ़ाने की आशा से अधिक काल तक कुम्भक नहीं रखना चाहिये। अन्यथा रेचन-क्रिया पर अधिकार नहीं रह सकेगा। अनुलोम-विलोम प्राणायाम धारावाहिक होते हैं।
अर्थात पूरक, कुम्भक, रेचक, फिर तुरंत पूरक, कुम्भ रेचक- इस तरह क्रिया सतत करते रहना चाहिए। बीच में तोड़ नहीं देना चाहिये। यदि अधिक श्रम होने कारण क्रिया न हो सकती हो, तो उस समय उतने में ही क्रिया समाप्त कर देनी चाहिये। दूसरे समय पर कुम्भक कम करें, जिससे क्रिया धारावाहिक हो सके।
प्रारम्भ में 5, 7, 10, 15, 20, 25 कुम्भक-इस तरह शनैः शनैः बढ़ाये। शास्त्रकारों ने अस्सी प्राणायाम तक बढ़ाने का और दिन में चार बार अभ्यास करने का विधान किया है; किंतु वर्तमान समय में सामान्यतः पचीस प्राणायाम तक बढ़ाये और प्रातः सायं दिन में दो ही बार अभ्यास करें।
शास्त्रकारों ने तीन मास में नाड़ी शुद्धि और उत्तम प्राणायाम की सिद्धि होने का वर्णन किया है। उसके स्थान पर वर्तमान में कम अभ्यास करें तो एक वर्ष लग सकता है। किंतु इस तरह शांतिपूर्वक और शक्ति अनुसार अभ्यास करने में हानि होने का कोई भय नहीं रहता।
कनिष्ठ प्राणायाम के अभ्यास काल में स्वेद अधिक आता है। मध्यम प्राणायाम में कम्पन होता है और उत्तम प्राणायाम में प्राण उत्तम स्थान (ब्रह्मरन्ध्र) को प्राप्त होते हैं। अर्थात वायु जो वायु कोष्ठ में प्रवेश करता है, उसमें से प्राणवायु (Oxygen) रक्त में आकर्षित हो जाता है, वह धमनी मार्ग से रक्ताभिसरण-क्रिया द्वारा मस्तिष्क में पहुँच जाता है, उसमें से कुछ अंश का परिवर्तन प्राणतत्त्व (विद्युत) रूप में हो जाता है।
यह विद्युत धारण हो सके, उससे अधिक बढ़ने पर वस्त्रों में भी कुछ-कुछ आती रहती है, शीतकाल में और रेशम के वस्त्रों में अधिकतर प्रतीत हो जाती है। अन्धकार में रेशम के या सूत के वस्त्र के दो पर्त अलग करने पर चटचट आवाज होकर नीला तेजस्वी प्रकाश उत्पन्न हो जाता है।
बाहर से जो शुद्ध वायु आकर्षित की जाती है, वह रक्त में प्रवेश करने पर रक्ताभिसरण-क्रिया द्वारा गति से सारे शरीर की धमनियों (Arteries) और शिराओं (Veins) में पहुँच जाती है और वहाँ के मल, तीव्र आम, रक्त वारि (Plasma) और अपक्षय-प्राप्त रक्ताणुओं को जला (तपा) कर स्वेद द्वारा बाहर निकाल विष, देती है। जिस प्रकार विषमज्वर में उष्णता बढ़ने पर कीटाणु-विष जलकर स्वेद द्वारा बाहर निकल जाता है।
इसी प्रकार प्राणायाम में भी स्वेद मार्ग से विकार का निवारण हो जाता है। फिर भी साधा वस्थामें ज्वर आदि रोगों को निकालने के लिये प्राणायाम का प्रयोग नहीं होता। कारण, रोग से उत्पन्न मल, जा स्थूल होता है, प्राणायाम करने पर रक्त-मांसादि धातुओं में प्रवेश करके सूक्ष्म भाव को प्राप्त हो जाता है और मस्तिष्क आदि सारे शरीर में फैल जाता है।
साधनावस्था में कुम्भक कम होता है और रक्त की पूरी शुद्धि नहीं हो सकती। इसी हेतु से ज्वर आदि रोगों में तीन होने वाले मल का बल बढ़ जाता है। इसलिये प्राणायाम का निषेध है।
जो प्राणवायु चारों ओर रक्त में फैलता है, वह रूपांतरित होकर प्राणशक्ति (विद्युत) रूप बन जाता है। फिर वह मस्तिष्क के केंद्र और वात-नाड़ियों में फैल जाता है। रक्त में से जो रक्त वारि जल जाता है, उस स्थान पर रस संस्था में से नया रस आकर्षित हो जाता है तथा जीर्ण रक्ताणुओं का स्थान नूतन सबल रक्ताणु ग्रहण कर लेते हैं।
फिर उसी शुद्ध और सबल रक्त में से मांस, मेद, शुक्रादि धातुएँ उत्पन्न होती हैं, जिससे वे भी और सबल बनती हैं। शुद्ध रक्त में अशुद्धि अधिक होती है तो स्वेद अधिक आता है और अधिक दिनों तक आता है। अशुद्धि कम होती है, तो स्वेद कम होता है और कम दिनों तक आता है।
रक्त शुद्धि होने के साथ-साथ प्राण-वायु के धारण की शक्ति बढ़ती जाती है। इस तरह कनिष्ठावस्थाम से मध्यमावस्था की प्राप्ति होती है। इस अवस्था में स्वेद बहुत कम हो जाता है; किंतु प्राणशक्ति अधिक उत्पन्न होती रहती है। उसका धारण वात नाड़ियों से यथोचित नहीं होता, जिससे स्थान-स्थान पर मन्द-मन्द कम्प (Spontaneous Convulsion) होता रहता है। यह कम्प भी ज्यों-ज्यों वात नाडियाँ सबल होती हैं, ज्यों-ही त्यों कम होता जाता है।
फिर उत्तमावस्था प्राप्त होने पर शनैः शनैः प्राणशक्ति अधिकाधिक धारण होती जाती है। मस्तिष्क में प्राणशक्ति का अधिक संग्रह होने पर प्रारम्भ में मस्तिष्क में भारीपन आता है, जो एक-दो घंटे में दूर हो जाता है। फिर मस्तिष्कस्थ प्राणसंग्रह स्थान सबल बनने पर शनैः शनै: भारीपन वाली अवस्था दूर हो जाती है, नादानुसंधान होने लगता है। और मानसिक संकल्पों की सिद्धि होने लगती है।
पश्चात् अभ्यास-वृद्धि और यम-नियम आदि के पालन के अनुरूप उत्तरोत्तर लाभ की वृद्धि होती जाती है।
सूचना–
(1) यह अभ्यास शुद्ध वायु वाले स्थान में होता है। किन्तु वायु का वेग तेज न होना चाहिये; अन्यथा स्वेद उचित मात्रा में बाहर नहीं निकल सकेगा, फलतः शोधन-क्रिया ठीक नहीं होगी। अतः खिड़की नीची हो तो बंद रखनी चाहिये। स्वेद आये, उसे कपड़े से पोंछ कर देर न करे, शरीर पर मल दे। इससे देह में लघुता आएगी, त्वचा तेजस्वी बनेगी और मांसपेशियाँ दृढ़ बनेंगी।
(2) अभ्यास प्रारम्भ करने पर प्रथम अवस्था में भोजन में दूध-भात लेने का विधान है। दूध-भात का सरलता से पाचन हो जाता है। उसमें से विशेषांश का पाचन आमाशय में ही हो जाता है। बहुत कम अंश का पाचन तंत्र में होता है। जिन साधकों को आमाशय निर्बल होने से दूध अनुकूल न पड़ता हो, वे ताजे दही का मट्ठा बनाकर ले सकते हैं। भात अनुकूल न हो, तो वे गेहूँ का दलिया ले सकते हैं। केवल दूध या केवल मट्ठे पर रहा जाए तो विशेष उत्तम।
(3) साधक के लिये जितना दूध (गोदुग्ध) हितकारी है, उतना मट्ठा नहीं। दूध से वात, पित्त, कफ धातुएँ आवश्यक परिणाम में बनती हैं और सब ऋतुओं के लिए वह समान उपकारक है। मट्ठा लेने पर उससे कफ धातु की उत्पत्ति कुछ अधिक न हो जाये, शरद् ऋतु या ग्रीष्म ऋतु में दही खट्टा न हो जाये, और वात या पित्त का प्रकोप न हो जाये- इस बात को संभालना पड़ता है।
मट्ठा लेने पर सेंधा नमक, जीरा और काली मिर्च मिलानी पड़ती है। दूध सेवन की अपेक्षा अभ्यास में प्रगति भी कुछ कम होती है। फिर भी जिनको पहले संग्रहणी या पेचिश हो गयी हो, अथवा जो वंशगत अर्श के रोगी हों, उनको दूध अनुकूल न होने पर मट्ठा देना पड़ता है।
(4) चावल कुछ साधकों के अनुकूल नहीं पड़ते। जिसके आमाशय का पित्त तेज हो, जिसके मूत्र की प्रक्रिया अम्ल हो अथवा जिसने देश में चावल खाने की प्रथा न होने से पहले से गेहूं या ज्वार का सेवन किया हो, उस साधक को गेहूं का दलिया या ज्वार की रोटी पर रखना पड़ता है। संक्षेप में जो शरीर को अनुकूल हों और पचने में भारी न हों, सरलता से पच जाए, उसी का सेवन करना चाहिये। यह नियम उत्तम प्राणायाम की दृढ़ता होने तक है।
फिर जब कुम्भक में अधिक प्रगति हो जाती है, तब भोजन में अधिक आग्रह नहीं रखा जाता। फिर भी रजोगुणी और तमोगुणी भोजन की तो प्रधानता नहीं होनी चाहिये। अपथ्य भोजन भी नहीं करना चाहिये।
(5) जिस प्रकार सिंह, व्याघ्र, हाथी आदि पशु शनैः शनैः वश होते हैं- बलात् करने पर नहीं, इसी प्रकार (कुम्भक) प्राणायाम का अभ्यास शनैः शनैः युक्तिपूर्वक करने पर वायु वश में होता है। युक्ति का त्याग तो साधक को मार देता है अर्थात् मनगढ़ंत रीति से प्राणायाम का अभ्यास किया जायगा तो उससे हिक्का, श्वास, कास, सिरदर्द, कर्णरोग और नेत्र-विकारादि नानाविध रोगों की उत्पत्ति हो जाएगी और प्राणान्त कष्ट होगा।
(6) इस प्राणायाम के अभ्यास में 'मूलबन्ध' को सतत धारण किया जाता है तथा पूरक के अन्त में ‘जालन्धर बन्ध’ और कुम्भक के अन्त में (रेचक के आरम्भ में) 'उड्डीयानबन्ध' लगाया जाता है। ये बन्ध न लगाए जाएंगे अथवा ये उचित रूप से न लगाये जायेंगे, तो प्राणायाम की सम्यक् सिद्धि नहीं हो सकेगी।
उपर्युक्त विवेचन के अनुसार पूरी सावधानी के साथ शास्त्र विधि के अनुरूप अभ्यास करते रहने पर जब नाड़ी शुद्धि हो जाती है अर्थात् रक्त वाहिनियों में प्राणवायु की प्रधानता हो जाती है; आंगारिक वायु, विष, दूषित, रक्ताणु, कीटाणु आदि का नाश हो जाता है तथा रक्ताभिसरण क्रिया सबल बनती है, तब वायु का यथेष्ट धारण होता है, अग्नि प्रदीप्त होती है, नाद की अभिव्यक्ति होती है और आरोग्य की प्राप्ति होती है। उस समय मेद, कफ आदि जल जाने से शरीर कृश प्रतीत हो जाता है, किंतु स्फूर्ति आदि कम नहीं होते।
नाडी शुद्धि होने के पश्चात कुम्भक बढ़ाने और कुण्डलिनी के प्रबोधार्थ, केवल कुम्भक के प्राप्त्यर्थ अथवा राजयोग में प्रवेशार्थ कितने ही साधक सूर्यभेदी आदि प्राणायाम तथा खेचरी आदि मुद्रा का आश्रय लेते हैं। स्थानाभाव से यहाँ उन प्राणायामों की विधि तथा खेचरी आदि मुद्राओं का विवेचन नहीं किया जा सका।