क्लाइमेट चेंज का सीधा असर बच्चों पर पड़ रहा है| जलवायु परिवर्तन से बच्चे नए प्रकार की बीमारियों का शिकार बन रहे हैं| आपको शायद यह भी पता नहीं होगा कि बच्चों में डायरिया डेंगू और संक्रामक बीमारियां बढ़ने का कारण क्लाइमेट चेंज ही है| 

दुनिया भर में ऐसी रिसर्च हुई है जो बताती हैं कि जलवायु में बदलाव और वायु प्रदूषण के कारण बच्चे बेहद खतरे में हैं| 

हमारी कारगुजारियों का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ेगा| बच्चों में कुपोषण रोकने के लिए और संक्रामक बीमारियों पर रोकथाम पाने के लिए हमने आज तक जो भी किया है उस सब पर पानी फिर सकता है|

रिपोर्ट यह बताती है कि बच्चों में साल 2000 से बुखार का पैटर्न काफी तेजी से बढ़ा है| 9, 10 साल के बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं| इस दौर में बच्चों का इम्यून सिस्टम पहले से ही कमजोर होता है| यदि इसी तरह से क्लाइमेट चेंज होता रहा तो संक्रामक रोगों के खिलाफ बच्चे अपनी नेचुरल इम्यूनिटी खो सकते हैं|

क्लाइमेट चेंज की वजह से डायरिया जैसी बीमारियों के बैक्टीरिया आसानी से पनप जाते हैं और लंबे समय तक जिंदा रहते हैं, इसका सीधा असर बच्चों पर पड़ता है|

भारत में क्लाइमेट चेंज के कारण सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं| महंगाई बढ़ती जा रही है|

कुपोषित बच्चों के आंकड़े हैरान करने वाले हैं| टीनएज में भी बच्चों पर क्लाइमेट चेंज का असर पड़ता है| दुनिया भर में बातें की जा रही हैं कि हम कार्बन उत्सर्जन को कम करेंगे लेकिन जिस तरह से हमारी कार्बन पर डिपेंडेंसी है यह संभव नहीं दिखता| 

जंगलों में आग लग रही है किसान पराली जलाने से चूक नहीं रहे| भारत में हरियाणा, पंजाब में खुलेआम पराली जलाई जाती है| वाहनों की तादाद बढ़ती चली जा रही है, दीपावली पर पटाखे जले तो किस तरह से वातावरण प्रदूषित हो गया सब ने देखा| दुनिया में तापमान किस तरह से बढ़ रहा है इसे बताने की जरूरत नहीं है| 

वर्तमान हालात बद से बदतर हैं| पिछले आठ-दस साल किस तरह से गर्म रहे, रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी इसे भी हम सब ने देखा| उत्तर-पश्चिम कनाडा के टेंपरेचर में तीन डिग्री से ज्यादा की हैरतअंगेज वृद्धि दर्ज हुई है| 

जीवाश्म ईंधन का दहन क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग में सबसे बड़ी भूमिका अदा करता है| हम हर सेकेंड 1 लाख 71 हजार किलोग्राम कोयला, 1 करोड़ 16 लाख लीटर गैस, 1 लाख 86 हजार लीटर तेल जलाते हैं|

जीवाश्म ईंधन के दहन को जब तक पूरी तरह से नहीं रोका जाता इन मुसीबतों से हल नहीं मिलने वाला| दुनिया गर्म होती जा रही है बच्चों और किशोरों पर स्वास्थ्य संबंधी खतरा मंडरा रहा है| हम सब भी सुरक्षित नहीं हैं लेकिन आम आदमी इसके प्रति कितना संवेदनशील है?

सरकार इस दिशा में कितनी गंभीर है| क्या हम सब चलता है कि तर्ज पर आगे बढ़ें या तापमान को कम करने के लिए अपने-अपने स्तर पर को योगदान दें| कब तक हम सरकारों के भरोसे रहेंगे? आम आदमी को भी तो अपने-अपने स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करना पड़ेगा| आज सांस लेने के लिए हमारे पास साफ हवा भी नहीं बची है| इसका जिम्मेदार कौन है? हम सुनहरे भविष्य का सपना देख रहे हैं, लेकिन स्थिति क्या है यह समझना बहुत जरूरी है|