कल्पना कीजिए जेल में..!

कितनी प्रताड़ना मिली होगी कि एक सशक्त देह और बुलन्द हौंसला लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र अभियान चलाने वाले क्राँतिकारी के प्राण ही साथ छोड़ गये। यह वीरता और करुणा से भरी कहानी है क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के की। वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म 4 नवम्बर 1845 को हुआ था। उन्हें भारत में क्राँतिकारी आँदोलन का जनक कहा जाता है। उन्होंने ब्रिटिश काल में किसानों वनवासियों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। पहले स्थानीय स्तर पर समझाने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं बनी तो उन्होंने संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने सबसे पहले युवकों की एक टोली बनाई तथा सामाजिक जाग्रति के लिये गाँव और वन क्षेत्रों में भ्रमण आरंभ किया।  

युवकों में राष्ट्रभक्ति और आत्म सम्मान का भाव जाग्रत किया विद्रोह करने के लिए लोगों को जागृत करने का कार्य आरंभ किया। उन्होंने महाराष्ट्र और उसके समीपवर्ती वनक्षेत्रो में कोळ, भील तथा धांगड जातियों को एकत्र कर उन्होने 'रामोशी' नाम का क्रान्तिकारी संगठन खड़ा किया। अपने इस मुक्ति संग्राम के लिए धन एकत्र करने के लिए उन्होने अंग्रेजों के एजेन्ट साहुकारों को रोका और जो न मानते उनसे धन छीन कर कर निर्बल समाज में वितरित करना आरंभ किया। वह दौर अकाल पीड़ा का था। जनता भूख से मर रही थी और अंग्रेजों के एजेन्ट अनाज एकत्र करके अंग्रेजों के पास भेज रहे थेश। वासुदेव बलवंत फड़के ने ऐसे ही अनाज गोदामो को निशाना बनाया।

उनकी प्रसिद्धि और समूह में निरंतर विस्तार हुआ। एक स्थिति तो ऐसी बनी कि उन्होंने पूना नगर पर अधिकार कर लिया। अंत में सेना भेजी गयीश। सेना ने पुणे पर घेरा डाला। सेना के पास तोपखाना था। वासुदेव बलवंत फड़के स्थिति देख बीजा पुर की ओर चले गये और छापामार युद्ध शैली में अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। अंततः अपने एक विश्वासघाती साथी के कारण २० जुलाई १८७९ को  गिरफ्तार हुये । उन्हें काले पानी का दंड देकर एडन जेल भेज दिया गया। जेल में भारी अत्याचार हुये अत्याचारों के चलते जेल में ही 17 फरवरी 1883 को उन्होंने प्राण त्याग दिये। वे भले दुनियाँ छोड़ गये पर भारत में क्राँतिकारी आँदोलन का एक मार्ग दिखा गये।