भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि सनातन परंपरा में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इस दिन पार्वती एकादशी या डोल ग्यारस का त्योहार मनाया जाता है। यह पवित्र त्योहार मुख्य रूप से मध्य और उत्तर भारत में मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस पावन पर्व का धार्मिक महत्व, पूजा विधि आदि के बारे में।
सुबह जल्दी स्नान करके भगवान विष्णु की धूप, दीप, पीले फूल, पीले फल, पीली मिठाई से पूजा की जाती है। डोल ग्यारस के दिन, सात प्रकार के अनाज भरकर सात कुंभ स्थापित किए जाते हैं, कुंभ व्रत की समाप्ति के बाद दूसरे दिन ब्राह्मणों को दान दिया जाता है। इस व्रत में चावल का सेवन वर्जित है।
मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान कृष्ण सबसे पहले माता यशोदा और नंद बाबा के साथ शहर की यात्रा के लिए निकले थे। यही कारण है कि इस दिन कन्हैया जी को नए वस्त्रों से सजाया जाता है। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ भगवान कृष्ण की बारात निकाली जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण के दर्शन कर भक्त उनकी पालकी की परिक्रमा करते हैं।
इस दिन सभी लोग अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार पूजा-पाठ करते हैं और व्रत रखते हैं। हिंदू धर्म में ग्यारस का व्रत करने का विशेष महत्व है ।
ग्यारस के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान आदि से निवृत्त हो जाएँ। घर के मंदिर में दीपक जलाएं।
भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें। भगवान विष्णु को फूल और तुलसी दल चढ़ाएं। हो सके तो इस दिन भी व्रत रखें। भगवान को प्रसादी समर्पित करें। ध्यान रखें कि भगवान को केवल सात्विक चीजें ही अर्पित की जाती हैं। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को अवश्य शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु तुलसी के बिना भोग का सेवन नहीं करते हैं। इस शुभ दिन पर भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा करें।
मध्यप्रदेश में डोल ग्यारस का त्योहार व्यापक रूप से मनाया जाता है, घाटों के पास मेलों का आयोजन किया जाता है, जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।