भोपाल के सरकारी हमीदिया अस्पताल परिसर स्थित कमला नेहरू अस्पताल में सोमवार रात नौ बजे भीषण आग लग गई. आग कमला नेहरू अस्पताल की तीसरी मंजिल पर लगी। काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका। इस दौरान वहां भर्ती हुए करीब पचास बच्चों को निकालकर अन्य जगहों पर भेज दिया गया। आग से इलाके में धुआं भी फैल गया। अंदर 4 बच्चों की मौत हो गई । परिवार के सदस्यों को अस्पताल में जाने की अनुमति नहीं है।

आग लगने की सूचना मिलने पर बड़ी संख्या में बच्चों के परिजन अस्पताल के बाहर जमा हो गए थे। अस्पताल प्रबंधन के प्रति नाराजगी साफ नजर आ रही थी. 

बताया गया कि तीसरी मंजिल पर बने बच्चों के वार्ड में करीब पचास बच्चे भर्ती थे। आग पर काबू पाने के बाद उन्हें खाली करा लिया गया है। बच्चों को धुएं से नुकसान तो नहीं हुआ है, इसकी जांच के लिए डॉक्टरों को बुलाया गया।

प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया की अव्यवस्था किसी से छिपी नहीं है। हमीदिया अस्पताल किसी न किसी रूप में सुर्खियों में रहा है। अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी यह अस्पताल हर साल किसी न किसी बड़े हादसे के रूप में अपनी अवस्था की कलई खुद खोल देता है। हमीदिया अस्पताल में आग से 4 मासूमों की मौत हो जाना शासन प्रशासन की बड़ी नाकामी है। इसे नाकामयाबी कहना भी अपर्याप्त होगा। इसे लापरवाही की इंतहा और आपराधिक जवाबदेही कहना ज्यादा बेहतर होगा।

रात को 8:30 बजे इस अस्पताल परिसर में चाइल्ड केयर के लिए बनाए गए कमला नेहरू गैस राहत हॉस्पिटल में तीसरी मंजिल पर बच्चा वार्ड के एनआईसीयू में आग लगी। 40 बच्चे भर्ती थे। बिजली की लाइन में शॉर्ट सर्किट हुआ और आग वार्ड तक पहुंच गई जहां बच्चों को रखा गया था। वार्ड में धुआं भर गया डॉक्टर और नर्स स्टाफ ने नवजात बच्चों को बाहर निकालना शुरू किया। लेकिन धुंआ बढ़ता ही जा रहा था यह वह धुंआ था, जो लापरवाही की आग से निकला। चिकित्सा शिक्षा मंत्री मौके पर पहुंचे। मुख्यमंत्री ने भी नजर बनाए रखी लेकिन लापरवाही तो हो चुकी थी। अस्पताल में आग बुझाने के लिए कोई तात्कालिक इंतजाम नहीं थे। टेक्नोलॉजी के युग में एक छोटी सी बोतल में आग बुझाने की पर्याप्त क्षमता होती है। लेकिन पता नहीं क्यों यहां पर फायर एक्सटिंग्विशर काम नहीं कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने ACS मोहम्मद सुलेमान को इस घटना की जांच के निर्देश दिए हैं। जुलाई में भी यहां वार्ड में आग लगी थी। जेपी अस्पताल में भी बच्चा वार्ड में आग लगने की घटनाएं हो चुकी है। यहां पर 40 बच्चे मौजूद थे लेकिन 3 दिन,2 दिन, 9 दिन के मासूम इस आग की भेंट चढ़ गए। 

इतना बड़ा अस्पताल रूट 400 मरीज ओपीडी में इलाज के लिए आते हैं, 300 मरीज भर्ती रहते हैं, इससे ज्यादा परिजन बाहर और अंदर मौजूद रहते हैं। आखिर कमला नेहरू अस्पताल ने फायर एनओसी क्यों नहीं ली?

फायर सेफ्टी के इंतजाम क्यों नहीं किए गए? 

अरबों लगाकर हमीदिया अस्पताल को देश के बेहतर अस्पतालों में शुमार करने की बातें कही जाती रही है। लेकिन इतनी बड़ी लापरवाही?

बेहद चौंकाने वाली यह घटना है! 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का यह सरकारी मेडिकल कॉलेज है। इसके तहत हमीदिया अस्पताल सुल्तानिया जनाना अस्पताल और कमला नेहरू अस्पताल आते हैं। यहां की चिकित्सा व्यवस्थाएं सुचारू करने के लिए अच्छा खासा बजट भी है। लेकिन इसके बावजूद भी कई बार यहां के डीन और सुप्रिडेंट सुपरिटेंडेंट को हटाने की नौबत आती है। यहां से रेमडेसीविर के इंजेक्शन चोरी हो जाते हैं। यहां मरीजों के साथ कई बार दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आती है। कई बार मरीज प्रॉपर इलाज न होने की शिकायत करते हैं।

 

घटनाएं होती है तब आला अफसर और मंत्रियों को इस अस्पताल की याद आती है। ताबड़तोड़ दौरे होते हैं निर्देश दिए जाते हैं, कुछ लोगों को हटाया जाता है कुछ को बनाया जाता है। लेकिन कुछ दिन बाद हालात वही हो जाते हैं। 

 

व्यवस्थाएं असंवेदनशील हो चुकी हैं। जिम्मेदार लोग काम के नाम पर औपचारिकताएं कर रहे हैं। डॉक्टर्स ड्यूटी करते हैं सिर्फ सैलरी बनाने के लिए। किसी को बुनियादी व्यवस्थाओं की चिंता नहीं होती। सब कुछ राम के हवाले है। लेकिन ऐसा कब तक चलेगा? कैसे चलेगा और क्यों चलेगा? जितना भी पैसा इस अस्पताल को दिया जाता है वह जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है। उसका सदुपयोग शासन प्रशासन की जिम्मेदारी है। यहां पर भर्ती होने वाले हर एक मरीज को सही इलाज मिले, सुरक्षित इलाज मिले, यह जिम्मेदारी किसकी है? और यह जिम्मेदारी नहीं निभाई जाती तो फिर उसकी सजा क्या होनी चाहिए?