कहीं घातक न बन जाए अंधविश्वास
आज चिकित्सा विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि मनुष्य का हृदय भी सफलतापूर्वक बदला जा सकता है। विज्ञान न केवल धरती पर वरन आकाश को चीरता हुआ अन्य ग्रहों पर भी अपने पैर जमा चुका है, फिर भी जिन रूढ़िवादी मान्यताओं रीतिरिवाजों से हम जकड़े हुए हैं, उनसे सावधान रहना होगा वरन् घातक परिणाम सामने आएंगे, आ रहे हैं। आज जिस प्रकार से तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक व कथित बाबाओं के जाल में समस्याओं के निराकरण के लिए हम जाते हैं, इस पर गंभीरता से सोचें कि कहीं आपका शोषण न हो जाए। प्रस्तुत है विभिन्न रोगों पर अंधविश्वास से बचाव एवं उपयुक्त उपचार।
अकसर कुत्ता काटने पर हम तुरंत झाड़ फूंक करवाने जाते हैं, जबकि कुत्ता काटने पर अपने जख्मों को अच्छी तरह साफ़ कर तुरंत जात्यादि तेल 100 ग्राम, पदमकादि तेल 100 ग्राम, मोम सफेद 200 ग्राम, महादेशी 75 ग्राम, राल 75 ग्राम, कायफल 25 ग्राम, सिंदूर 25 ग्राम, गंधक आमलासार 25 ग्राम, नीलाथोथा 10 ग्राम, कत्था सफेद 10 ग्राम को चूर्ण बनाकर एक कड़ाही में तेल डालकर गर्म करें और औषधियों के चूर्ण के अतिरिक्त जो मोम है, उसे कड़ाही में डाल दें। गल जाने पर औषधियों का चूर्ण डालकर घोटकर सुरक्षित डिब्बी में रख लें और इसे विशेष तौर पर कुत्ता, सांप, बिच्छू आदि के काटने पर तो उपयोग करें ही साथ ही मुंहासों, दाद, खाज, खुजली, फोड़े अथवा बिंवाई पर भी उपयोग कर आशातीत लाभ ले सकते हैं।
चूंकि कुत्ता काटने पर हमारा भय के कारण मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और घबराकर जो भी व्यक्ति जैसी सलाह देता है, मान बैठते हैं, जबकि स्वयं देखें कि कहीं वह कुत्ता पागल तो नहीं था और कहीं मर तो नहीं गया है। अब तो बाजार में सुरक्षित रेबीज विरोधी टीके भी उपलब्ध हैं। ध्यान रखें, उपयुक्त चिकित्सा के अभाव में कहीं पीड़ित को रेबीज या हाईड्रोफोबिया हुआ, तो मृत्यु अटल है। इसलिए अंधविश्वास से परे रहकर उपयुक्त चिकित्सा करें, नीबू के बीज का चूर्ण 5 ग्राम, अपामार्ग (लटजीरा) चूर्ण 10 ग्राम में शहद मिश्रित कर चटाएं, लाभ होगा।
सांप के काटने पर
सांप के काटने के बाद ध्यान रखें कि डरें नहीं, क्योंकि 90 प्रतिशत सांप विषैले नहीं होते और सर्प तभी काटता है, जब वह आपसे ज्यादा डर जाए। अतः तुरंत ही ऊपर की ओर (काटने के स्थान से) एक कड़ी पट्टी कस दें, ताकि रक्त प्रवाह कम हो और विष अगर हो भी, तो जल्दी असर न डाल सके, जबकि लोग तुरंत ही झड़वाने के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं और उपयुक्त चिकित्सा के अभाव में रोगी मर भी जाता है।
अतः तुरंत ही चिकित्सक को दिखाएं और 50 ग्राम हल्दी पावडर, 40 ग्राम गूलर के पत्तों का पावडर, 30 ग्राम निम्ब, 20 ग्राम कनेर, 10 ग्राम भुनी फिटकरी।
सभी को एक साथ मिलाकर बारीक पावडर बनाकर उपयोग से पूर्व घाव को जल में नीमपत्र डालकर उबले हुए जल से साफ करें, फिर पावडर लगाएं। प्राथमिक उपचार हेतु आप इसे सुरक्षा हेतु 1 वर्ष पूर्व बनाकर रख सकते हैं।
पीलिया रोग में
यह रोग प्रायः रक्त में बिलिरुबिन की मात्रा बढ़ने से होता है, इसका प्रभावी अंग लिवर (यकृत) होता है, चूंकि यकृत की विशेषता होती है कि उसकी क्षतिग्रस्त कोशिकाओं का नवनिर्माण बहुत तेजी और पूर्णता के साथ होता है और कम समय में ही लिवर पुनः पुरानी मुस्तैदी से कार्य करने लगता है और इसी का फायदा उठाकर तांत्रिक, झाड़-फूंक करने वाले अपना उल्लू सीधा करते हैं।
यह अवश्य ध्यान रखें कि यह केवल वायरल पीलिया में ही होता है। यदि यह कैंसर या अन्य जटिलता की वजह से हो, तो झाड़ना-फूंकना और भी बेवकूफी होगी, बल्कि तुरंत ही विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाएं।
प्राथमिक उपचार के लिए तुरंत आहार के साथ सूखी मूली के यूष अथवा कुलथी के यूष का सेवन कराएं, साथ ही अमलतास के फल का गूदा 2 ग्राम और त्रिकटु चूर्ण 2 ग्राम को गन्ने के रस से दिन में 3 बार दें। सिद्ध योग में कुमार्यासव / लोहासव / पुनर्नवासव को भोजनोत्तर बराबर-बराबर जल मिलाकर दो-दो चम्मच दिन में 3 बार दें।
हिस्टीरिया में
अकसर मानसिक चिंता के कारण दिमाग में उतार-चढ़ाव अनर्गल ही होते रहते हैं, ये ही बाद में गंभीर परिणाम को जन्म देकर मरीज को पागल-सा बना देते हैं। तुरंत ही लोग ओझा/बाबा को बुलाकर झड़वाते हैं और जब तक बाबा अपने हथकण्डे अपनाते हैं, तब तक तो दौरे का समय समाप्त हो जाता है और लोग महसूस करते हैं कि झाड़-फूंक के कारण ही ठीक हुआ है। अगर दोबारा दौरा आया, तो फिर कुछ दिनों बाद कह दिया जाता है कि बड़े शैतान, जिन्न का साया है और तांत्रिक लोग जमकर मरीज को बेवकूफ बनाकर पैसा और समय बर्बादी के साथ ही मरीज की जान से भी उचित चिकित्सा के अभाव में खिलवाड़ करते हैं।
मिर्गी (एपिलेप्सी)
यह बीमारी बचपन से भी प्रारंभ हो सकती है। चूंकि इसकी दवा लंबे समय तक चलती है और अगर बीच में बंद कर दी जाए, तो दौरा पड़ने की संभावना रहती है। इस बीच अगर मरीज को दवा न मिलने पर दौरा पड़ जाए, तो वह यही सोचता है कि इतने दिनों की दवा का भी कोई उचित परिणाम नहीं? फिर वह नीम-हकीमों से लेकर तांत्रिकों-झाड़-फूंक वाले व्यक्तियों के पास जाने लगता है।
चूंकि कई बीमारियां, जैसे छोटी माता, खसरा, इन्फ्लुएंजा, गलसुआ, डेंगू आदि का उपचार न भी करें और मात्र घर में जहां आराम करते हैं, ताजी नीम की पत्तियां ही फैलाकर रखें, तो स्वतः ही ठीक हो जाती हैं और इसी का फायदा कथित बाबा वगैरह उठाते हैं। कई दिनों तक झाड़ने का नाटक किया जाता है और अपने आप ठीक होने को लोग बाबा का चमत्कार मानने लगते हैं। हकीकत में जैसे ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी, तो इस प्रतिकारक शक्ति बढ़ने के कारण ही लाभ होता है।
चिकित्सा
1. दौरा आने पर तीक्ष्ण कट्फल की छाल का बारीक चूर्ण कर सुंघाएं।
2. एक छोटी शीशी में चूना व नौसादर मिलाकर हिला दें, तो बनने वाली अमोनिया गैस सुंघाने पर दौरा समाप्त हो जाएगा।
3. शुद्ध हींग 20 ग्राम, दूधिया वच 20 ग्राम, जटामांसी 20 ग्राम, मीठा कूच 40 ग्राम, काला नमक 40 ग्राम, वायविडंग 180 ग्राम सभी को कूट-पीसकर सुरक्षित रखें। 2-2 ग्राम की मात्रा कुनकुने जल से दिन में 3 बार दें। लगभग 3 माह तक उक्त प्रयोग से लाभ होगा।
4. स्वर्णमाक्षिक भस्म, लौहभस्म, चतुर्भुज रस, रजत भस्म, प्रवालपंचामृत रस, स्वर्ण सूतशेखर रस, ब्राह्मीवटी, शिलाजित्वादि वटी, शिवा गुटिका, आरोग्य वर्धनी वटी आदि औषधियां रोगी की प्रकृति के • अनुसार दी जा सकती हैं।
इसी प्रकार दमा रोग में रोगी को जीवनभर अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा मौसम /प्राकृतिक तत्वों से करनी पड़ती है, तभी वह सामान्य रह सकता है। कछ लोग उपचार स्वरूप भभूत की पुड़िया देते हैं, कुछ लोग जिंदा मछली के मुख में दवा रखकर देते हैं, कुछ लोग खीर, शहद आदि में दवा मिश्रित करके देते है, जबकि इसमें अनुपान व दवा का महत्व है न कि किसी रूप में तंत्र, झाड़-फूंक का । दमा मुख्यतः खानपान की एलर्जी के कारण होता है। इसकी चिकित्सा आयुष्मान के शीत ऋतु अंक 2004 में पेज क्रमांक 89 में स्पष्टतः विस्तार से है।
इसी प्रकार टायफाइड क्रमश: 14, 21, 42 दिन का हो सकता है। वास्तव में उपचार के बाद एक सप्ताह के अंदर तापमान सामान्य हो जाना चाहिए।
इसी की भांति गठिया वात भी है, यह रोग एक बार होकर जीवन भर रहता है। मात्र दवा लेते वक्त आराम रहता है, फिर दवा न लेने पर पुनः तकलीफ बढ़ जाती है, खासकर ठंड व
बरसात में। फिर भी आज कई लोग इसको तंत्र-मंत्र द्वारा ही ठीक करने की ग्यारंटी लेते हैं। बीच शहर में ही लोग तंबू तानकर शीशी में दवा/तेल भरकर ठीक करने की ग्यारंटी लेते हैं। दावा करते हैं कि हिमालय से, अमरकंटक से और तो और विदेशों से लाई जड़ी-बूटियां हैं। कई बार कलाकारी द्वारा फिल्मी हीरो-हीरोइनों के साथ फोटो बनवाकर लोगों के ऊपर प्रभाव जमाकर पैसा ऐंठते हैं और एकाध माह में फिर डेरा कहीं और? इनसे सावधान रहकर स्थाई इलाज चिकित्सा विशेषज्ञ से कराएं।
कुष्ठ रोग में
कुष्ठ रोग को आज भी पिछले जन्म का पाप कहा जाता है। समाज आज भी रोगियों को देख तिरस्कृत करते हैं, जबकि यह जैविक संक्रमण के कारण होता है। प्रायः महात्मा-पंडित भी पूजा करवाकर रुपयों के लालच में ठगते हैं, जो सरासर अनुचित है। भगवान के नाम पर मरीजों को बेवकूफ बनाना घोर पाप है। आज कुष्ठ रोग उचित चिकित्सक की सलाह लेकर लंबे समय तक चिकित्सा क्रम अपनाने पर ठीक हो जाता है।
चिकित्सा
1. नारंगी के छिलके का चूर्ण 2 ग्राम, सेंधा नमक 2 ग्राम मिलाकर सेवन करें अथवा नारंगी के छिलके का चूर्ण पानी में डालकर सेवन करें।
2. बड़ी इलायची, कूठ, दारुहल्दी, सौंफ, चित्रक, वायविडंग, रसौँत और हर्र बारीक पीसकर जल में मिलाकर लेप करें।
3. मैनसिल, हरताल, कालीमिर्च, मदार का दूध समभाग लेकर तिल मिलाकर लेप करें।
4. रस कर्पूर, महामंजिष्ठादि क्वाथ, मुस्तादिचूर्ण, खादिरारिष्ट, आरोग्यवर्धनी वटी, गंधक रसायन, कुष्ठकुठार रस, त्रिफलाघृत, महामरिच्यादि तेल का उचित प्रयोग करें, तो लाभ होगा।
नोट : उपयुक सभी उपाद अपने डॉक्टर की देखरेख में ही करें|