भोपाल. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश के बाद 5 साल बाद आयुष कॉलेज में अवैध तरीके से भर्ती घोटाले के दोषियों के खिलाफ कारवाही की प्रक्रिया शुरू हुई. पूर्व आयुक्त आयुष एवं आईएएस की भूमिका को जांच के दायरे से बाहर रखा गया है. जबकि पूरे भर्ती घोटाले में आयुक्त आइस की भूमिका भी संदिग्ध रही है. आयुष विभाग में अभी तीन अधिकारियों और संबंधित कालेजों के प्राचार्यो को नोटिस जारी किया है.
प्रदेश में अब आयुष कॉलेजों (Ayush collage) में अवैध तरीके से भर्ती करने का घोटाला उजागर होने के 5 साल बाद कारवाही की प्रक्रिया शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हरी झंडी मिलने के बाद आयुष विभाग ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की शुरू की है. बीते विधानसभा के सत्र में पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और कांग्रेस विधायक सचिन यादव ने लिखित प्रश्न और ध्यानाकर्षण के जरिए घोटाले का मुद्दा उठाया था. इस मुद्दे का सदन में जवाब देने के बाद आयुष विभाग ने इससे संबंधित दस्तावेज सहित फाइल मुख्यमंत्री सचिवालय को भेजी थी. मुख्यमंत्री चौहान ने घोटाले से संबंधित दस्तावेज का परीक्षण करने के बाद आयुष विभाग को कार्रवाई करने के निर्देश दिए है. मुख्यमंत्री की पहल पर ही आयुष विभाग ने घोटाले में लिप्त अधिकारियों एवं संबंधित कॉलेज के प्रिंसिपल ओर से नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है.
क्या है पूरा मामला :
इस पूरे मामले की जांच कमेटी ने पड़ताल की तो पता चला कि आयुष संचालनालय, मेडिकल यूनिवर्सिटी (Medical university) के अधिकारियों की सांठगांठ से इस घोटाले (Scame) को अंजाम दिया गया है. वर्ष 2016 से 2018 तक आयुष कॉलेजों में हुए एडमिशन संबंधी जब जानकारी जुटाई गई तो 1292 अपात्र छात्रों को एडमिशन (Ayush Collage admission) देने का मामला सामने आया. इसमें 2016 और 2017 में जो निजी आयुष कॉलेज एमपी ऑनलाइन (MP online) की काउंसिलिंग में शामिल नहीं हुए थे. उन्होंने अवैध तरीके से 1120 छात्रों को प्रवेश दे दिया. वर्ष 2018 से नीट (NEET) परीक्षा अनिवार्य होने के बावजूद निजी आयुष कॉलेजों ने गलत तरीके से 172 छात्रों को आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी के निजी कॉलेजों में सीधे प्रवेश दे दिया गया.
रिपोर्ट के बाद भी कोई एक्शन नहीं :
आयुष कॉलेजों में अपात्र छात्रों को प्रवेश देने की शिकायत फरवरी 2020 में हुई थी, जिस पर संचालनालय ने 3 सदस्यीय जांच समिति बनाई थी. ये जांच कमेटी ने इस पूरे मामले की पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट 21 जून को प्रमुख सचिव करलिन खंगवार को सौंप दी है, लेकिन 6 महीने बाद भी इस मामले में प्रमुख सचिव ने अब तक कोई एक्शन नहीं लिया है.