भोपाल। प्रदेश में बारह साल बाद राम वन गमन पथ निर्माण का काम शुरु कर दिया गया है। इसके लिये इस साल अध्यात्म विभाग ने 30 करोड़ रुपयों का बजट तो रखा है, परन्तु फिलहाल वह एक करोड़ रुपये से इसकी डीपीआर बनवा रहा है। डीपीआर बनाने का काम मप्र सडक़ विकास निगम (एमपीआरडीसी) को सौंपा गया है जिसे टेण्डर आदि करने के लिये एक करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया गया है तथा इसमें से 50 लाख रुपयों का उसे भुगतान भी कर दिया गया है।
एमपीआरडीसी ने 1450 किलोमीटर लम्बे राम वन गमन पथ के लिये डीपीआर बनाने के लिये इच्छुक कन्सल्टेंट कंपनियों से एक्सप्रेशन आफ इन्ट्रेस्ट मांग लिये हैं। 27 अक्टूबर को तकनीकी बिड खोली जायेंगी तथा फायनेन्शियल बिड खोलने की सूचना अलग से जारी की जायेगी। डीपीआर में इस मार्ग के बनने पर धार्मिक पर्यटन से कितनी आय सरकार को होगी, इसका भी उल्लेख किया जायेगा।
उल्लेखनीय है कि राम वन गमन पथ के लिये राज्य सरकार ने वर्ष 2008 में एक कमेटी बनाई थी जिसने शोध एवं सृजन यात्रा के संबंध में दो प्रतिवेदन सरकार को सौंपे थे। वर्ष 2009 में पहले चरण की यात्रा चित्रकूट से बांधवगढ़ तक की गई थी तथा इसके बाद दूसरी यात्रा वर्ष 2010 में भोपाल से शुरु की गई जो विदिशा, सिरोंज, होशंगाबाद, पिपरिया, नरसिंहपुर, गाडरवारा, भेड़ाघाट, कटनी, उमरिया, शहडोल और अमरकंटक तक की गई।
ये स्थान नहीं माने गये राम वन गमन पथ :
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुछ स्थानों को राम वन गमन पथ नहीं माना है। होशंगाबाद के सेठानी घाट के बारे में समिति ने लिखा है कि वाल्मीकि रामायण तथा राम कथा में कहीं भी श्री राम के नर्मदा पार करने का उल्लेख नहीं है। शहडोल के विराट नगर के बारे में लिखा है कि यह महाभारत कालीन स्थान है तथा यहां स्थित बाणगंगा कुण्ड का रामायण काल से कोई संबंध नहीं है। विदिशा के सांची के बारे में लिखा कि रामकथा में यह स्थान किसी भी प्रकार से चर्चित नहीं है। छतरपुर जिले के खजुराहो के बारे में लिखा कि यह राम वन गमन मार्ग पर नहीं है। इसी जिले के लवकुशन नगर में चरण पादुका के बारे में लिखा कि राम वन गमन स्थल का प्रमाण नहीं है।
वन विभाग की नई भूमि नहीं :
राम वन गमन पथ के बारे में वन विभाग का कहना है कि वर्तमान में इस मार्ग पर कोई नई वन भूमि नहीं आ रही है तथा जो मार्ग चालू हैं, उन्हीं पर ही यह राम वन गमन मार्ग बनेगा।