बलिदानियों के नाम पर बीट, पुस्तकों में शौर्य गाथा..


भोपाल: मप्र के वन महकमे ने संभवत: पहली बार सुदूर जंगलों में अपनी ड्यूटी के दौरान वन माफिया या जानवरों के शिकारियों से संघर्ष में जान गंवा देने वाले कर्मचारियों को याद करने व याद रखने की नयी पहल शुरू की है। 


इसके तहत वन संपदा की चोरी, शिकार व वन भूमि पर कब्जा करने वालों से मुठभेड़ में बलिदान हुए वनकर्मियों की कहानी को नए वनकर्मी पढ़ेंगे। इसके लिये प्रदेश के सभी 11 वन विद्यालय में विशेष सूचना पटल लगाए जा रहे हैं। जिनमें शहीद वनकर्मियों के नाम लिखे जाएंगे। उनके बलिदान की संक्षिप्त कहानी भी पढ़ाई जाएगी।


दर्जा देने की गुहार बेअसर मगर वन महकमे ने की नई शुरुआत 50 वन कर्मियों ने दी जान


मप्र में जंगलों का दायरा अन्य राज्यों से ज्यादा है। लिहाजा यहां माफिया और वन कर्मियों के बीच झड़प अक्सर होती हैं। हर साल औसतन तीन वनकर्मी जान गंवा देते हैं। बताया जाता है कि पिछले 15 साल में 50 से अधिक वनकर्मी ड्यूटी पर मारे गये हैं लेकिन उन्हें बलिदानी का दर्जा नहीं मिला है। 


वन कर्मियों की ख्वाईश है कि बलिदान होने पर उन्हें भी सैनिकों की तरह तिरंगे में लपेटकर अंतिम यात्रा पर ले जाया जाए। इस दर्जे के लिये लगातार मांग होती रही है। विभाग की ओर से भी शासन को लिखा जा चुका है। इस देरी से होने वाली खिन्नता को भांपते हुए बलिदानियों के सम्मान में विभाग यह कदम उठा रहा है।


11 स्कूलों में होती है ट्रेनिंग..


मप्र में 11 वन स्कूल हैं। इनमें वन परिक्षेत्र अधिकारी, उप वनपरिक्षेत्र अधिकारी, वनपाल और वनरक्षकों के लिये प्रशिक्षण सत्र चलते हैं। इसके लिये दो साल तक का कोर्स होता है। अब सभी स्कूलों को ऐसे सूचना पटल लगाने के निर्देश दिए गए हैं जहां बलिदानियों का उल्लेख होगा। बलिदानियों की शहादत की संक्षिप्त कहानी भी स्कूलों में रखी जाएगी। ताकि प्रशिक्षणार्थी वनकर्मी इसे पढे।