यास्क के बहुत पहले रिक्याधिकार के प्रश्न को लेकर गरमागरम वाद-विवाद उठ खड़े हुए थे। हो सकता है कि रिक्याधिकार (वसीयत) सम्बन्धी इस प्रकार के वाद-विवाद कालान्तर में लिपिबद्ध हो गये हों। वसीयत-सम्बन्धी वार्ता की ओर यास्क ने जिस प्रकार से संकेत किया है, उससे झलकता है कि उन्होंने कुछ ग्रन्थों की ओर निर्देश किया है, जिनमें वैदिक वचनों के उदाहरण दिये गये थे।
एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वसीयत के विषय में यास्क ने एक पद्य का उदाहरण दिया है, जिसे वे श्लोक कहते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म-सम्बन्धी ग्रन्थ, श्लोक-छन्द में या श्लोकों (अनुष्टप्) में प्रणीत थे।
बुहलर जैसे विद्वान तो ऐसा कहेंगे कि पद्यबद्ध बातें स्मृतिशीले थीं, जो जनता की स्मृति में यों ही बहुत आती थीं।" यदि धर्म-सम्बन्धी विषयों के ग्रन्थ यास्क के पूर्व विद्यमान थे तो धर्मशास्त्रीय प्रत्ययों की तिथि बहुत प्राचीन मानी जाएगी। इस विषय में अन्य प्रमाण भी है।
गौतम, बौधायन तथा आपस्तम्ब के धर्मसूत्र निश्चित रूप से ईसा पूर्व 600 और 300 के बीच के है। गौतम ने धर्म शास्त्रों की चर्चा की है, बौधायन ने भी 'धर्मशास्त्र' शब्द का प्रयोग किया है।" बौधायन ने 'धर्म-पाठकों की चर्चा की है ।
गौतम ने बहुत से धर्म शास्त्रों के शब्द 'इत्येते' कहकर उद्धृत किये हैं। उन्होंने मनु की ओर एक बार तथा 'आचार्यों' की ओर कई बार संकेत किया है।" बौधायन ने औपजंघनि, कात्य, कश्यप, गौतम, मौद्गल्य तथा हारीत नामक धर्मशास्त्र कारों के नाम गिनाए हैं।
आपस्तम्ब ने भी एक, कण्व, कौत्स, हारीत आदि ऋषियों के नाम लिये हैं। एक वार्तिक भी है जिसने धर्मशास्त्र की चर्चा की है।" धर्मशास्त्र में लिखित शूद्र-कर्तव्य की ओर जैमिनि ने संकेत किया है।"
पतंजलि ने लिखा है कि उनके समय में धर्मसूत्र थे और उनके प्रमाण भगवान् की आज्ञा के बाद महत्त्वपूर्ण माने जाते थे।" उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि धर्मशास्त्र यास्क के पूर्व उपस्थित थे; कम-से-कम ई० पू० 300-600 के पूर्व तो वे थे ही और ईसा पूर्व की द्वितीय शताब्दी में वे मानव-आकार के लिए सबसे बड़े प्रमाण माने जाते थे।
इस ग्रन्थ में सम्पूर्ण धर्मशास्त्र पर विवेचना निम्न प्रकार से होगा। पहले धर्मसूत्रों का विवेचन होगा, जिसमें आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी तथा बौधायन लम्बे सूत्र-संग्रह है, गौतम तथा दलिष्ट बहुत बड़े संग्रह नहीं है। कुछ सूत्र-ग्रन्थ, यथा शंख-लिखित, पैठोनसि, केवल उद्धरण रूप में विद्यमान है।
धर्मसूत्रों के उपरान्त हम मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति आदि स्मृतियों का विवेचन उपस्थित करेंगे। इसके उपरांत नारद, बृहस्पति, कात्यायन की स्मृतियों का वर्णन होगा, जिनमें अन्तिम दो केवल उद्धरणों में ही मिलती हैं।
महाभारत, रामायण तथा पुराणों ने भी धर्मशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योग दिया है। अतः इस विषय में में उनकी चर्चा होगी। अनन्तर विश्वरूप, मेघातिथि, विज्ञानेश्वर, अपराकं, हरदत्त नामक स्मृति-टीकाओं का वर्णन उपस्थित किया जायगा इसके उपरान्त धर्म के संक्षिप्त नीति-संग्रह, यथा हेमाद्रि, टोडरमल, नीलकण्ठ आदि का विवेचन होगा।
धर्मशास्त्र के ग्रन्थों का काल-निर्णय बड़ा कठिन कार्य है। मैक्समूलर तथा अन्य विद्वानों के मतानुसार सूत्र-ग्रंथों के उपरान्त अनुष्टुप् छन्द वाले ग्रन्थ प्रणीत हुए।" किन्तु यह मत प्रस्तुत लेखक को मान्य नहीं हो सकता।
उन दिनों के ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान इतना न्यून है कि इस प्रकार का सामान्यीकरण समीचीन नहीं है। श्लोक-छन्द वाला ग्रंथ मनुस्मृति कुछ धर्मसूत्रों से, जैसे विष्णु धर्मसूत्र से प्राचीन और वसिष्ठघर्मसूत्र का समकालीन है।
कुछ प्राचीनतम धर्मसूत्रों में, यथा बौधायन धर्मसूत्र में, लम्बे-लम्बे प्रबन्ध श्लोक-छन्द में पाये जाते हैं, और उनमें कुछ तो उद्धरण मात्र हैं। यहाँ तक कि आपस्तम्ब में भी बहुत-से श्लोक पाये जाते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्लोक-बद्ध ग्रंथ धर्मसूत्रों से पूर्व भी विद्यमान थे। इसके अतिरिक्त आपस्तम्ब तथा बौधायन के समय में धर्म-सम्बन्धी एक बृहत् साहित्य था, जो आज उपलब्ध नहीं है।