भोपाल: मप्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम (फारेस्ट कन्वरसेेशन एक्ट-एफसीए) 1980 में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित उस संशोधन को मंजूरी प्रदान कर दी है, जिसमें लोकोपयोगी सेवाओं के लिये बार-बार केंद्र सरकार से राज्य सरकारों को अनुमति न लेना पड़े।

दरअसल, एफसीए में प्रावधान है कि किसी भी प्रकार की भूमि पर लगे वृक्षों को काटने के लिये केंद्र सरकार से अनुमति लेना होगी और इसके लिये आवश्यक शर्तों जैसे दूसरे स्थान पर क्षतिपूरक वनीकरण आदि करना होगा। इस प्रावधान से केंद्र एवं राज्य सरकार के कई प्रोजेक्ट लम्बे समय तक अनुमति मिलने के इंतजार में अटके पड़े रहते हैं। मसलन, किसी हाईवे को बनाने के लिये छह लेन की भूमि आवंटित है और पहले चरण में सिर्फ एक या दो लेन ही बनाई गई हैं, तो आठ लेन तक सडक़ बनाने के लिये उसमें मौजूद वक्षों को काटने के लिये केंद्र सरकार के वन मंत्रालय से अनुमति लेना पड़ी है जबकि इस कुल आठ लेन सरकारी या निजी भूमि को अधिगृहित करने के लिये संबंधित सरकारी एजेन्सी पहले से ही मुआवजे का भुगतान कर चुकी है। यही स्थिति रेल्वे की भी रहती है तथा उसे अपनी रेल लाईन सिंगल से डबल या ट्रिपल करने के लिये केंद्र से वृक्ष काटने की अनुमति लेनी पड़ती है। इससे न केवन काफी विलम्ब होता है बल्कि क्षतिपूरक वनीकरण में अतिरिक्त राशि व्यय करना पड़ी है। इसीलिये केंद्र सरकार ने अपने 41 साल पुराने वन संरक्षण कानून में संशोधन का प्रस्ताव करना पड़ा है और राज्य सरकारों के पास इसे भेजकर उनके सुझाव मांगने पड़े हैं।

विभागीय अधिकारी ने बताया कि एफसीए में केंद्र सरकार ने लोकापयोगी सेवाओं के लिये बार-बार केंद्र से वृक्षों को काटने के लिये अनुमति न लेने संबंधी संशोधन का ड्राफ्ट भेजा है जिसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया है। ये वृक्ष वन विभाग के सहयोग से ही काटे जा सकेंगे तथा इन वृक्षों का विक्रय वन विभाग ही करेगा।