मध्यप्रदेश में प्राकृतिक जल संरचनाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। लेकिन इसके लिए सरकार कितनी गंभीर है? मध्य प्रदेश में झील प्रोटेक्शन एक्ट बनाने की तैयारी शुरू हुई थी लेकिन अभी तक झील प्रोटेक्शन एक्ट सामने नहीं आया है।

कमलनाथ सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, लेकिन तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में इसमें प्रगति नहीं हो पाई, सरकार बदल गई इसके बाद तो प्रोटेक्शन एक्ट का मसौदा शायद रसातल में चला गया।

मध्यप्रदेश में जल स्रोतों के कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण और अवैध निर्माण धड़ल्ले से होते आए हैं। कब्जा हो गया तो हटाना बहुत मुश्किल होता है।

कानून बहुत जरूरी था लेकिन कानून है नहीं। आमजन की राय भी ली गई, विशेषज्ञों की समिति भी बनाई गई, लेकिन ऐसा कोई एक्ट अस्तित्व में नहीं आया।

मध्य प्रदेश तो छोड़िए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ही तालाबों के हाल बेहाल हैं। तालाब के कैचमेंट एरिया में बस्तियां बस गई है। मैरिज गार्डन बन गए है। अस्पताल और खेलकूद के केंद्र बन गए हैं।

बड़े तालाब को ले लीजिए, कलियासोत नदी के कैचमेंट एरिया को ले लीजिए, कैसे कलियासोत नदी का केचमेंट एरिया भूमाफिया और अफसरों की सांठगांठ का केंद्र बन गया, यहां बहुमंजिला इमारतें तन चुकी हैं।

भोपाल के कई तालाबों का तो अता पता ही नहीं है। कई तालाब अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।

इंदौर के खजराना तालाब और सिरपुर तालाब के कैचमेंट एरिया और पाल पर कितना अतिक्रमण है यह सब जानते हैं।

ग्वालियर क्षेत्र का वाटर लेवल बढ़ाने वाले 6 बांधों पर जबरदस्त अतिक्रमण है बांध के कैचमेंट एरिया पर लोगों का कब्जा है। यहां अवैध निर्माण के साथ बस्तियां तक बस गई है। कहीं ईट भट्टे संचालित हो रहे हैं तो कहीं ढाबा और मैरिज गार्डन।

रीवा के 56 तालाब में से अधिकांश अतिक्रमण की चपेट में आ गए हैं। कहीं खेती हो रही है तो कहीं बस्तियां बस गई है।

केचमेंट एरिया जीवनदायी है, केचमेंट एरिया को बचाए रखना बहुत जरूरी है। इसका संरक्षण बहुत जरूरी है।

कानून नहीं है नदी तालाब अतिक्रमण का शिकार हैं।

हमारे नेचुरल रिसोर्सेज को बचाने के लिए सरकार को गंभीर होना पड़ेगा, वरना इनके अस्तित्व को नहीं बचाया जा सकेगा।