खजुराहो की उत्पत्ति की प्राचीन परंपरा एवं नामकरण के संबंध में यह कहा जाता है कि एक समय इसके गेट पर दो सुनहरे खजूर के पेड़ थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत (625 45 ए.डी.) के अनुसार, उसने इसे 'चीन-ची-टू' कहा।
गंडदेव के शिलालेख (999 ए.डी.) में इसे 'श्री खूजूर वाहिका' कहा गया है। कवि चंद ने इसे 'खजूरपुरा' अथवा 'खाजीपपुरा' नाम दिया। अलबरूनी (सन् 1031) ने इसे 'खजूराहा' कहा। अंत में इब्नबतूता (सन् 1235) ने इसका नाम 'खजुराहो' रखा।
कहते हैं, खजुराहो कभी बड़ा शहर था, जो आठ वर्ग मील क्षेत्र में फैला हुआ था वस्तुतः खजुराहो में केवल एक ही मंदिर नहीं है, बल्कि दो दर्जन से अधिक मंदिर हैं। ऐसा विश्वास है कि पूर्व में वहाँ पचासी मंदिर थे।
नौवीं एवं बारहवीं शताब्दी के बीच इन मंदिरों का निर्माण शक्तिशाली चंदेल राजा यशोवर्धन ने करवाया। तत्पश्चात् धंग, विद्याधर, कीर्ति वर्मन, मदन वर्मन आदि राजाओं ने इन मंदिरों को बनवाया। ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया और सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त कर दिया। उसके बाद वह खजुराहो भी गया था, लेकिन कंदारिया महादेव मंदिर की अद्भुत कला से वह इतना अभिभूत हुआ कि उस मंदिर को उसने नहीं तुड़वाया।
खजुराहो में ब्राह्मण, वैष्णव, शैव, शाक्त और जैन सभी धर्मों एवं मतों के मंदिर स्थित हैं। इसके अलावा चौंसठ योगिनी, चित्रगुप्त, सौर मत, ब्रह्मा, वराह, देवी, लक्ष्मण, देवी जगदंबा, जवारी, वामन, खाखरा मठ, चतुर्भुज मंदिर, ललगवाँ महादेव, विश्वनाथ, टूलादेव, मंगतेश्वर, पार्वती तथा महादेव शैव मत के मंदिर हैं। जैन मंदिरों में घंटई पार्श्वनाथ और आदिनाथ मुख्य हैं।
इन मंदिरों की अपनी-अपनी कला एवं नक्काशी है। चौंसठ योगिनी, ललगवाँ महादेव, ब्रह्मा, मंगतेश्वर तथा वराह मंदिरों का निर्माण विशेष ढंग से करवाया गया है। कुछ मंदिरों के ऊपरी भाग सादे हैं तो कुछ के कलापूर्ण कंदारिया महादेव में सबसे अधिक मैथुन (स्त्री-पुरुष संगम मुद्रा) को दिखलाया गया है।
काम-वासना में डूबे जोड़ों की मूर्तियाँ, स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबंधों को बहुत सुंदर, सहज और जीवंत रूपों में दरशाया गया है। कुछ मूर्तियाँ इतनी सुंदर और जीवंत लगती हैं, मानो वे अभी बोल पड़ेंगी। इनका आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्त्व भी है, तभी तो ये मंदिरों में प्रतिष्ठित हैं।

खजुराहो के प्रायः सभी मंदिर ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। यहाँ गर्भगृह, अंतराल, महा मंडप, मंडप तथा अर्धमंडप कई मंदिरों में मिलते हैं। यहाँ देवताओं, सुंदरियों, परियों और नाग-कन्याओं की भी सैकड़ों मूर्तियाँ हैं। ऐसा कहा जाता है कि लंबी नाक और लंबी गर्दन वाली औरतों की मूर्तियां गुप्त काल की हैं।
कुछ लोग इन मूर्तियों में तंत्र-मंत्र की छाया पाते हैं। वस्तुतः ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में भारत में तंत्र-मंत्र का बड़ा प्रभाव था। अनेक पाखंडी तांत्रिक धर्म के नाम पर औरतों से खिलवाड़ करते थे।
ऐसा अनुमान है कि चौंसठ योगिनी का मंदिर इन तांत्रिकों ने ही बनवाया हो। उस काल में भारत कला, साहित्य एवं धन-दौलत में अत्यंत समृद्ध था। यह विश्व भर में सोने की चिड़िया' के नाम से विख्यात था।
खजुराहो के मंदिर भारत में निर्मित किसी भी मंदिर की अपेक्षा भव्य एवं प्रभावोत्पादक हैं। वे अपने सौंदर्य एवं सजावट के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। प्रायः सभी मंदिर ऊँचे और पक्के चबूतरे पर निर्मित हैं। वे सभी तत्कालीन स्थापत्य कला से परिपूर्ण हैं।
मुख्य प्रतिमाएँ गर्भगृह में स्थित हैं। उनमें प्रवेश के लिए मध्य के सभी सभागृहों का आधार एक ही ऊँचाई का है। उनकी छतें समान ऊंचाई पर गोलाकार पंक्तियों के रूप में छोटी होते-होते एक सुंदर शिखर के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं और अंत में गर्भगृह का क्षेत्र बन जाता है।
अनेक मंदिरों में गर्भगृह के बाहर तथा मंदिर की बाहरी दीवारों पर मूर्तियों की दो-तीन पंक्तियाँ हैं। इनमें विशेषकर देवी-देवताओं की अलौकिक सौंदर्य युक्त एवं आलिंगनबद्ध युगल, नागा शार्दुल तथा शालभंजिका की मूर्तियाँ अलंकृत हैं।