ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर एक बात तो तय है कि पक्ष और विपक्ष दोनों ही आरक्षण के पक्ष में हैं। 

सदन में सवाल ये था कि आखिर किसकी वजह से ओबीसी आरक्षण पर कोर्ट की तलवार लटक गई। अब आगे क्या होना चाहिए। 

विपक्ष के स्थगन पर सत्तापक्ष ने स्वीकृति जताई और चर्चा शुरू हो गई। विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम ने सदस्यों से शुरुआत में ही अनुरोध किया कि बहस सार्थक हो शोर-शराबा ना हो और सदस्य बाहर ना जाएं। इसके बाद चर्चा शुरू हुई प्रश्नकाल रोका गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि चर्चा में सदन की गरिमा का ध्यान रखा जाए, रोका टोकी ना हो मुझे भी शांति से सुना जाए। पहले कई मौके ऐसे आए जब मुख्यमंत्री के जवाब के दौरान कांग्रेस ने सदन की कार्यवाही से बहिर्गमन यआ बहिष्कार कर दिया था।

चर्चा के दौरान कांग्रेस एमएलए कमलेश्वर पटेल के तेवर चर्चा का विषय बने। कमलेश्वर पटेल ने ना सिर्फ अपनी बात रखी बल्कि सत्ता पक्ष और मुख्यमंत्री के जवाब के दौरान वह बीच में अपने तथ्य और तर्क रखते रहे।

एक मौका तो ऐसा आया जब कांग्रेस के सदस्यों को कहना पड़ा कि मुख्यमंत्री को कमलेश्वर पटेल के आरोपों का जवाब देने की बजाय नेता प्रतिपक्ष की बात पर अपनी बात रखनी चाहिए। इस दौरान सज्जन सिंह वर्मा ने कमलेश्वर पटेल को बच्चा कह दिया। मुख्यमंत्री ने तुरंत इस पर चुटकी ली और कहा कि कांग्रेस की नजर में कमलेश्वर पटेल की हैसियत बच्चे की जैसी है लेकिन हम उन्हें विद्वान सदस्य मानते हैं।

नरोत्तम मिश्रा भी अपनी सीट पर खड़े हो गए, मुख्यमंत्री बैठ गए और नरोत्तम मिश्रा ने कांग्रेस की ओर सवाल दागा कि क्या वह अपने विधायक को बच्चा मानती है और उसके उठाएं प्रश्नों का जवाब देना सही नहीं मानती?

पूर्व मंत्री गोविंद सिंह चर्चा के दौरान काफी आक्रामक नजर आए, हालांकि उन्होंने कुछ बातें ऐसी भी कहीं जिससे कांग्रेस का पक्ष कुछ कमजोर हुआ। एक बार तो वह अपने ही दल के सदस्यों के ऊपर भड़क गए।

मुख्यमंत्री भी लंबे समय बाद चर्चा को विपक्ष के आरोपों के जवाब के साथ आगे बढ़ाते दिखे। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण के बीच में विपक्ष को टोका टोकी और अपनी बात रखने का भरपूर मौका दिया।  

पूरी चर्चा में हंसी ठहाकों का दौर भी चला तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी।

दोनों ही पक्ष के सदस्य अपनी अपनी तैयारी के साथ आये थे। 

ओबीसी आरक्षण को लेकर बनी स्थिति पर एक दूसरे पर प्रहार करते हुए दिखाई दिए। दोनों ही पक्ष दरअसल ओबीसी आरक्षण का मामला अटकने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार बताना चाहते थे और खुद को बेकसूर।

विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम ने भी सदस्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका दिया। हालांकि बीच-बीच में उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष के उन लोगों को हिदायतें भी दी जो किसी सदस्य के भाषण के दौरान बोल रहे थे।

इसके बावजूद भी कहीं कोई तनाव नजर नहीं आया और चर्चा निर्बाध रूप से आगे बढ़ती रही, मुख्यमंत्री के भाषण के दौरान तो बीच-बीच में कई बार चर्चा जैसी स्थिति बन गई। 

कई बार बात हंगामे तक  पहुंच गई, लेकिन दोनों ही पक्षों ने इस हंगामे को अवरोध बनने से रोकने का संयम दिखाया। विपक्ष ने बात का बतंगड़ बना बहिर्गमन या बहिष्कार से परहेज किया।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने तथ्यों के साथ विपक्ष के आरोपों की हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

हालांकि नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ ने बात संभाली और उन्होंने अपने पक्ष को कमजोर होता हुआ देख यह कह डाला कि इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष एक साथ मिलकर कोर्ट जाए हम साथ चलने को तैयार हैं।

नेता प्रतिपक्ष के नरम हुए तेवर के बाद मुख्यमंत्री भी विपक्ष को बहुत ज्यादा परेशान करने के मूड में नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपनी बात रखते हुए भी सदन के माहौल को तल्ख होने से बचाए रखा। 

विपक्ष की तैयारी तो बहुत थी लेकिन नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह ने इस मुद्दे पर जिस तरह से अपनी बात रखी कांग्रेस के तेवर उसी वक्त कमजोर पड़ने लगे थे।

दरअसल ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर कोर्ट ने हस्तक्षेप तब किया जब कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने और वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा ने इस मुद्दे पर कोर्ट में याचिका लगाई।

कांग्रेस को इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ी कि याचिकाएं परिसीमन और और अन्य कारणों के लिए लगाई गई थी। कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक डॉ गोविंद सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि यदि किसी ने गलत याचिका लगाई है तो प्रदेश अध्यक्ष को उसे बर्खास्त कर देना चाहिए भले ही वह छिंदवाड़ा का क्यों ना हो| कांग्रेस ने कहा कि ओबीसी आरक्षण की पहल उसकी सरकार के कार्यकाल में हुई।

इधर नगरी प्रशासन मंत्री ने कहा कि यदि उनके तथ्य गलत हैं तो वे इस्तीफा देने को तैयार हैं। नगरीय प्रशासन मंत्री ने यहां तक कह डाला कि इस मुद्दे पर वे जान की बाजी लगाने को तैयार हैं, हालांकि जान देकर भी आरक्षण लागू करवाने जैसे दावों से बचा जाना चाहिए था।

कुल मिलाकर बहस सार्थक रही और मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार कानूनी स्तर पर केंद्र सरकार के साथ मिलकर हर स्तर पर पुरजोर तरीके से अपनी बात रखेगी।