देश ने नार्थ-ईस्ट हिस्से में आपस्मा यानि आर्म्ड फोर्सेज दे स्पेशल पॉवर एक्ट एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर इस हिस्से में कई तरह के सुर सामने आते रहे हैं। हाल में नगालैंड में सुरक्षा बलों की कार्रवाई और उसके बाद भड़की हिंसा से जो सवाल खड़े हो गये हैं वे सिर्फ 14 निर्दोष नागरिकों की मौत तक सीमित नहीं हैं। बल्कि सभी मानते हैं कि इस मामले में सुरक्षा बलों से बड़ी चूक हुई, खुद गृहमंत्री ने घटना पर अफसोस जताया है और जांच की घोषणा की है।
लेकिन सरकार के स्पष्टीकरण से ज्यादा बड़ा सवाल यह बनता है कि सरकारी स्पष्टीकरण को उस क्षेत्र के लोग किस तरह क्या स्वीकार करते हैं? नॉर्थ ईस्ट के में ऐसे तमाम मामलों में जांच की घोषणाएं तो हुई हैं लेकिन नका कोई खास नतीजा निकला दिखा। बात फिर उसी एक्ट की आती है जो इन इलाकों में लागू है और यह सुरक्षा बलों को असाधारण अधिकार दे देता है। सरकार की तरफ से यह प्रतिबद्धता दर्शाई गई है कि जांच में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कानून के मुताबिक उपयुक्त कार्रवाई की जाएगी, मगर आफ्सपा के रहते दोषियों के खिलाफ कानूनन किसी तरह की कार्रवाई संभव है? गौरतलब है कि यह कानून नगालैंड, असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों और जम्मू कश्मीर में लागू है।
इसके तहत सुरक्षा बलों के जवान और अधिकारी संदेह के आधार पर किसी को गोली मार सकते हैं, बिना किसी वॉरंट के घर की तलाशी ले सकते हैं और कानूनी कार्रवाई से भी बचे रह सकते हैं। हालांकि यह बात सामने आई कि ताजा घटना में सेना की टुकड़ी पर प्रकरण दर्ज किया गया है। मगर पिछले बीस वर्षों के दौरान जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से आर्मी के खिलाफ कार्रवाई की जितनी भी सिफारिशें आई, केंद्र ने आफ्सपा के तहत उन सभी मामलों में मुकदमा चलाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया।
उधर आफ्सपा झेल रहे तमाम इलाकों में इसे काले कानून के रूप में देखा जाता है। इस बार भी घटना के बाद से आफ्सपा हटाने की मांग तेज है। भाजपा के ही सहयोगी दलों से जुड़े मुख्यमंत्री नगालैंड के नेफ्यू रियो और मेघालय के कॉनण्ड संगमा भी ऐसी मांग करने वालों में अब शामिल हो चुके हैं। हालांकि आतंकवाद या उग्रवाद से निपटने के लिये सुरक्षा बलों को भी अपनी जान जोखिम में डालकर ड्यूटी करनी पड़ती है। इसीलिये इस कानून को भी लागू किया गया, ताकि फौरन कार्रवाई हो सके।
बावजूद सुरक्षा बलों या आम लोगों के बीच इस तरह का अहसास गहरा होने देना भी ठीक नहीं है कि सुरक्षा बलों के जवान कुछ भी करें उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। कई बार असीमित पावर के दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ती है। अपस्या हटाने की मांग भी इसी से जुड़ी है। सरकार को जनभावनाओं को भी समझना होगा और सीमावर्ती राज्यों की चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए संतुलन, संवाद और विश्वास के पुल बांधकर आगे बढ़ना होगा।