भोपाल. उपचुनाव में हार पर फीडबैक लेने के लिए कांग्रेस ने 9 नवंबर को राजधानी भोपाल में बैठक बुलाई है, जिसमें प्रदेश भर के जिला प्रभारियों को तलब किया गया है. बैठक में उपचुनाव में मिली हार पर मंथन कर उसके कारणों पर चर्चा होगी. साथ ही कांग्रेस के सदस्यता अभियान और जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने को लेकर भी चर्चा होगी. हार के बाद फिर से नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. इसके साथ ही प्रदेश अध्यक्ष के लिए पिछड़े वर्ग से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के हाथों में बागडोर सौंपे जाने की मांग भी उठने लगी है.
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खंडवा लोकसभा चुनाव और जोबट एवं पृथ्वीपुर विधानसभा उपचुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो गई है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने हार पर मंथन करने के लिए प्रदेश कार्यसमिति की जगह जिला प्रभारियों की बैठक बुलाई है. यह बैठक 9 नवंबर को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में आयोजित की गई है. बैठक में 50 जिला प्रभारी उपस्थित रहेंगे. बैठक का एजेंडा मंडलम और सेक्टर के पुनर्गठन और उनके संगठनात्मक ढांचे पर चर्चा होगी. इस बैठक के पूर्व ही कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने लगे हैं. इसके लिए कांग्रेस का बहु प्रचारित नारा 'वक्त है बदलाव' का इस्तेमाल किया जा रहा है.
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विधायक लक्ष्मण सिंह के अलावा नाम न छापने की शर्त पर बुंदेलखंड के धाकड़ नेता एवं पूर्व मंत्री ने साफ तौर पर कहा है कि अब वक्त बदलाव का आ गया है. पार्टी हाईकमान को प्रदेश नेतृत्व पर मंथन कर मिशन-2023 के लिए किसी और के हाथों बागडोर सौंपी जानी चाहिए. उनका कहना यह भी था कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ नेतृत्व में सरकार आई और उन्हीं की कार्यशैली के चलते 15 महीने में पार्टी सत्ता से बेदखल भी हो गई. बेदखल होने के बाद 32 विधानसभाओं में उपचुनाव हुए, जिसमें 10 सीटों पर कांग्रेस जीती और शेष 22 सीटों पर पराजय का स्वाद चखना पड़ा. पार्टी नेतृत्व से असंतुष्ट होकर एक और विधायक सचिन बिरला ने कांग्रेस अलविदा कह दिया. दिलचस्प पहलू यह है कि एक-एक कर पार्टी छोड़ गए विधायकों ने प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ पर निशाना साधा पर हाईकमान किंकर्तव्यविमूढ़ है. यही वजह है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा.
मिशन-2023 की तैयारी में जुटे कमलनाथ
'बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ' की कहावत पर अमल करते हुए प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने मिशन 2023 के लिए मंडलम और सेक्टर को मजबूत करने पर फोकस किया है. कमलनाथ यह स्वीकार करते है कि बीजेपी का संगठन बहुत ही मजबूत है. बातचीत में वे यह भी कहते हैं कि मैं भाजपा, प्रशासन पुलिस और पैसा से अकेले लड़ रहा हूं. यानी डेढ़ से दो हजार पदाधिकारियों का संगठन होते हुए भी कमलनाथ अपने आप को अकेले महसूस कर रहे हैं. वे यह भी कहते हैं कि वह संगठन में कोई बदलाव नहीं चाहते क्योंकि जिनको हटाएंगे वह नाराज हो जाएंगे. इसीलिए मंडलम और सेक्टर को मजबूत करेंगे और उन से सीधा संवाद भी करेंगे. शिवराज सरकार के खिलाफ अब आंदोलन के रोड पर भी तैयार करेंगे. इस पर उनके कोर ग्रुप ने मंथन भी शुरू कर दिया है. दरअसल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के फेल होने के पीछे उनके किचन केबिनेट सदस्य सज्जन सिंह वर्मा, एमपी प्रजापति, बाला बच्चन, सुश्री विजयलक्ष्मी साधो, रवि जोशी और चंद्र प्रभाष शेखर की भूमिका रही है. इनकी गिरोह बंदी की मानसिकता के कारण कांग्रेस में योग्य नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता मुख्यधारा से दूर होते गए. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और उनके किचन केबिनेट सदस्य अपने राजनीतिक असुरक्षा के चलते किसी को आगे बढ़ने ही नहीं दिया. यही वजह रही कि किचन कैबिनेट के सदस्यों ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, पूर्व मंत्री डॉक्टर गोविंद सिंह, पूर्व मंत्री मुकेश नायक, पूर्व मंत्री राजा पटेरिया, पूर्व मंत्री एवं कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र चौधरी, प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत, आदिवासी विधायक उमंग सिंगार एवं ओमकार सिंह मरकाम, युवा विधायक प्रवीण पाठक जैसे कुशल संगठक को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ से सीधे जुड़ने नहीं दिया.
गुट बंदी से गिरोह बंदी तक कांग्रेस
80 के दशक तक कांग्रेस गुटबंदी में बैठी हुई थी. यह गुटबंदी भी प्रदेश स्तर तक ही सिमटी हुई थी. दिवंगत नेता अर्जुन सिंह ने प्रदेश की गुटबंदी का विस्तार जिला स्तर पर किया. फिर यह धीरे-धीरे ब्लॉक स्तर तक फैल गई. जब संगठन की बागडोर दिग्विजय सिंह ने संभाली तो गुटबंदी का स्वरूप ही बदल गया. गुटबंदी, गिरोह बंदी में तब्दील हो गई. यहीं से कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा कमजोर होने लगा. दिग्विजय सिंह के बाद जितने भी प्रदेश अध्यक्ष बने, चाहे वह सुरेश पचोरी ही क्यों ना हो, सभी ने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की जगह गिरोह बंदी पर ज्यादा फोकस किया. गिरोह बंदी के चलते कांग्रेस में दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को पनपने नहीं दिया. यही नहीं, गिरोह बंदी और चाटुकारिता के चलते ही प्रदेश पदाधिकारियों की प्रतिष्ठा भी विजिटिंग कार्ड में सिमट कर रह गई. मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ ने कांग्रेस को कारपोरेट कल्चर में संचालित करने का प्रयास कर रहें हैं. कारपोरेट कल्चर के चलते ही विधायक उपेक्षित होते रहे हैं और कांग्रेस को अलविदा कहते रहे. ऐसी स्थिति में मिशन-2023 मैं कांग्रेस को सफलता मिलेगी इसमें अभी संशय की स्थिति है.
अजय सिंह ने सेट किया रैगांव फार्मूला
पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह जीत का नया फार्मूला गढ़ा. नेता प्रतिपक्ष ने मतदाताओं में एकजुटता का संदेश देने के लिए एक ही वाहन में विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा, उषा चौधरी और वे स्वयं भी बैठकर चुनाव प्रचार किया. ताकि कांग्रेस की एकजुटता का संदेश मतदाताओं तक पहुंचे. साथ ही क्षेत्रीय क्षत्रपों में मान-सम्मान कायम रहा. राजनीतिक प्रेक्षको ने इसे रैगांव फार्मूले का नाम दिया. बीजेपी की परंपरागत सीट पर पता कर अजय सिंह ने अपने कुशल नेतृत्व का परिचय भी दिया है.