किसी भी इंसान का जो व्यक्तित्व सामने दिखाई देता है वह उसका एक रूप है। ऐसे कई व्यक्तित्व अपने अंदर छिपाए रहता है मल्टीपल पर्सनालिटी डिस् आर्डर नामक मनोरोग से पीड़ित मरीज। उसके विचारों में निरंतरता नहीं होती और न ही उसकी याददाश्त का तारतम्य सही रह पाता है। आइए समझते हैं इस मनोरोग की जटिलताएं....!

जरूरी बातें याद नहीं रहतीं..

डॉ. संजीव एनेस्थिसियोलॉजिस्ट के अनुसार..

मनोरोग को "डिसोसिएटिव इ डिस्ऑर्डर' भी कहा जाता है। इस रोग से पीड़ित की अपने विचारों में निरंतरता कायम नहीं रह पाती है। वह अपनी याददाश्त, आसपास के वातावरण और खुद के क्रियाकलापों के बीच कोई कनेक्शन नहीं रख पाता है। वह कई बार अपनी पहचान तक भूल जाता है। 

मरीज ऐसा जानबूझकर नहीं कर रहा होता है क्योंकि वह वास्तविक संसार से दूर भाग चुका होता है। रोजमर्रा के जीवन में हालांकि मरीज यह व्यवहार खुद की इच्छा से नहीं कर रहा होता है लेकिन दूसरों के लिए यह तकलीफदायक साबित होता है।

कुछ समय के लिए मरीज की याददाश्त गायब हो जाती है और वह अपने से संबंधित घटनाओं को, घर और समाज के सदस्यों को पहचान नहीं पाता है। साथ ही खुद से संबंधित जरूरी जानकारी भी याद नहीं रख पाता है। मसलन उसका नाम क्या है तो वह बता नहीं पाता है, कहां रहता है तो यह बताने में उसे उलझन होती है। 

शोध अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जिन परिवारों में वयस्क अपने बच्चों के सामने बहुत डरावना और अप्रत्याशित व्यवहार करते हैं, वे डिसोसिएशन डिस् ऑर्डर के शिकार हो जाते है। यह तो तय है कि मल्टीपल पर्सनालिटी डिस् ऑर्डर के बीज मरीज के मानस पर बचपन में ही बो दिए जाते हैं।

क्यों होता है ऐसा..

डिसोसिएटिव डिस्आर्डर आमतौर पर किसी मानसिक अथवा बचपन में हुई शारीरिक प्रताड़ना की याद को भूलने की प्रतिक्रिया के रूप में पैदा हो जाता है। कई लोगों के साथ बचपन में यौन प्रताड़ना अथवा बिना वजह की मारपीट उन्हें इस मनोरोग की ओर धकेल देती है। 

शोध अध्ययन बताते हैं कि 6 साल की उम्र से पहले हुई इन घटनाओं का असर जीवन भर बना रहता है। इस बीमारी के कई लक्षण 'भूलने की बीमारी' तथा ‘वैकल्पिक पहचान' के रूप में सामने आते हैं। वैकल्पिक पहचान का अर्थ यह है कि जो वह वास्तविकता में है उससे परे मरीज अपने आपको कोई 'दूसरा' इंसान बताने की कोशिश करता है। इस रोग के लक्षण तनाव के बढ़ने के साथ ही अस्थाई तौर पर तीव्र हो जाते हैं।

अजीब से लक्षण प्रकट होते हैं:

इस मनोरोग से पीड़ित मरीजों में अजीब से लक्षण प्रकट होते हैं जैसे वह समय का चक्र भूलने लगता है। वह शरीर से 'बाहर जाकर दुनिया को देखकर लौटने के अनुभव भी शेयर करने लगता है। कुछ मरीज खुद को प्रताड़ित करने लगते हैं। खुद को चोट पहुंचाकर तसल्ली महसूस करते हैं। 

उदाहरण के तौर पर डिसोशिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर का मरीज इतनी तेज और जोखिम भरी ड्राइविंग करने लगता है जिससे खुद को या दूसरों को घातक चोट लग जाए। इसी तरह वह कंपनी में अपने मालिक अथवा दोस्तों के पैसों को चुराने लगता है।

कई मरीज तो यहां तक कह देते हैं कि उन्हें पैसा चुराने के लिए किसी ने 'मजबूर' किया था। मरीज यह भी कहते हैं कि इस शरीर में वे यात्री की तरह सफर कर रहे हैं न कि किसी ड्राइवर की तरह। वे मानते हैं कि उनके पास इसके सिवा कोई दूसरा चारा ही नहीं था। कई मरीजों को लगता है कि संसार रियल नहीं है बल्कि दूर कहीं एक धुंधली छाया भर है।

इस मनोरोग के साथ और क्या समस्याएं हैं:

1. अवसाद,

2. मूड स्विंग,

3. आत्महंता प्रवृत्ति,

4. अनिद्रा या नींद में चलने की समस्या,

5. एंग्जायटी, पैनिक अटैक और फोबिया,

6. कल्पना में विचरण करना,

क्या हो सकता है इलाज:

यद्यपि यह रोग पूरी तरह ठीक नहीं होता है लेकिन लंबे समय तक इलाज मिलने से मरीज को काफी राहत मिल जाती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण इलाज है साइको थेरेपी.

इसे टॉक थेरेपी या बातचीत के जरिए इलाज की विधा कहा जाता है। इस थेरेपी का मुख्य उद्देश्य काल्पनिक रूप से अपनाए गए व्यक्तित्व को नहीं उभरने देने का है। इसके जरिए उन सभी ट्रिगर्स को नियंत्रित किया जाता है जो 'स्प्लिट पर्सनालिटी' को सामने लाते हैं। इस थेरेपी में परिजनों की मदद भी जरूरी होती है।

हिप्नोथेरेपी:

• इस थेरेपी को साइको थेरेपी के साथ-साथ चलाया जाता है। क्लिनिकल हिप्नोसिस के जरिए मरीज के मन की गहराई में छिपी हुई तथा दबाकर रखी गई यादों को बाहर लाने की कोशिश की जाती है। 

• अपने साथ हुई दुखद घटनाओं की यादों को बाहर लाने के बाद मरीज खुद को हल्का महसूस करने लगता है।

एडजेक्टिव थेरेपी:

• इस तरह की थेरेपी में मरीज को किसी कला विधा के साथ अथवा किसी अच्छे उद्देश्य के सामाजिक आंदोलन के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। ऐसा करने से मरीज पीड़ादायक यादों को दिमाग से दूर करने में सफल होता है।