मुंबई का क्रूज ड्रग्स कांड बहुत बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। चूंकि इसमें फिल्मी सुपरस्टार शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान का नाम जुड़ा है और वे जेल में भी हैं लिहाजा देशभर में इसकी चर्चा है। साथ ही विवादों का गहरा साया भी है।
आरोप-प्रत्यारोप और बयानबाजी का सिलसिला तो काफी पहले से चल रहा है, लेकिन हाल में एक गवाह का यह कहना कि उससे कोरे कागज पर दस्तखत करवाए गए और वह तलाशी के समय वह मौके पर मौजूद ही नहीं था, एनसीबी यानी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो अधिकारियों की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
हालांकि विस्तृत जांच के बगैर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए, मगर पिछले कुछ समय से ड्रग्स से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों का जो रुख देखने में आया है, उससे ऐसा लगता है कि बड़े पैमाने पर ड्रग्स कारोबार करने वालों और निजी तौर पर इसका सेवन करने वालों में फर्क उनकी नजरों में थोड़ा धुंधला हुआ है।
आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि एजेंसियों का काम बड़े पैमाने पर होने वाले अवैध कारोबार को रोकना है ताकि आम युवाओं तक ड्रग्स पहुंचे ही नहीं और उनके इस चंगुल में फंसने की गुंजाइश ही न बने। एजेंसी के सीमित संसाधन अगर एक-एक व्यक्ति से जुड़े मामलों में लगाया जाने लगे तो बड़े लेवल पर चलने वाले रैकेट पर अंकुश लगाने का काम प्रभावित हो सकता है।
इस संदर्भ में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का पिछले दिनों दिया गया यह सुझाव बेहद महत्वपूर्ण है कि एनडीपीएस एक्ट में आवश्यक सुधार करके यह सुनिश्चित किया जाए कि ड्रग्स के चंगुल में फंसे लोग अपराधी नहीं बल्कि विक्टिम माने जाएं।
मौजूदा कानूनों के मुताबिक किसी ड्रग्स का सेवन करने वाले को एक साल तक की कैद या बीस हजार तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इसमें पहली बार सेवन कर रहे और बार-बार ड्रग्स लेने वालों में भी कोई फर्क नहीं किया गया है। वैसे भी किसी संयोग या साजिश के तहत ड्रग्स इस्तेमाल की चपेट में आने वालों को अपराधी मान लेने से उनमें और ड्रग पेडलर में कोई फर्क नहीं रह जाता, जिससे बुराई की जड़ तक पहुंचकर उसे खत्म करने का मकसद हासिल करना और कठिन हो जाता है। सॉफ्ट ड्रग जैसे भांग, गांजा और हार्ड ड्रग जैसे कोकीन, हेरोइन आदि के बीच कानूनी फर्क मिटाने से भी यही होता है।
जहां तक हालिया मामले की बात है तो अब इसमें महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री नवाब मलिक का खुलकर कूदना और एनसीबी के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेडे पर सीधे निशाने लगाना, एक ऐसा व अप्रिय घटनाक्रम है कि इससे इस जांच एजेंसी की भी छवि खराब हो रही है और पूरी लड़ाई की टाइमिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं।
इसलिये कहा जा सकता है कि अब वह वक्त आ गया है जब सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय के इस सुझाव को गंभीरता से लेते हुए न केवल कानून के प्रावधानों में आवश्यक बदलाव किए जाएं बल्कि विभिन्न एजेंसियों के रुख को भी ज्यादा कारगर बनाने की दिशा में उपयुक्त कदम उठाएं, क्योंकि ड्रग्स लेने वाले युवाओं को सबसे पहले बेहतर काउंसलिंग की जरूरत होती है। ताकि भविष्य में वे बेहतर नागरिक के रूप में खुद को ढालें, यदि कानूनी प्रक्रियाओं की उलझने चलती रहेंगी तो उनके सुधर पाने की गुंजाइश भी खत्म होने लगेगी।
ड्रग्स लेना गुनाह तो है ही, इससे बड़ा गुनाह वह है जो संगठित माफिया अपने नेटवर्क के जरिये लोगों तक पहुंचाता है। बड़ी-बड़ी नशे की खेपें हाल के दिनों में पकड़ने की खबरें भी आयी हैं। यह बताता है कि माफिया कैसे युवाओं को जाल में उलझा रहा है। लिहाजा उसे नेस्तनाबूद करना सबसे जरूरी काम है।
आशीष दुबे