भोपाल। निर्माण कार्यों में उपयोग में आने वाली साल एवं सागौन ही अब वन विभाग के डिपो के माध्यम से क्रय-विक्रय की जा सकेंगे तथा शेष वनोपजों को व्यक्ति स्वयं से ही क्रय एवं विक्रय कर सकेगा। इसके लिये राज्य के वन विभाग ने 42 साल पुराने कानून मप्र वन उपज व्यापार विनियमन अधिनियम 1969 के तहत इन दोनों वनोपजों को विनिर्दिष्ट वनोपज घोषित कर दिया है तथा शेष वनोपजों को विनिर्दिष्क्ष्ट वनोपज की सूची से बाहर कर दिया है।

दरअसल साल एवं सागौन वन विभाग के जंगलों में भी होता है और ग्रामीणजन जिनमें आदिवासी भी शामिल हैं, की स्वयं की भूमि पर भी रहते हैं। जंगल एवं निजी स्वामित्व के साल एवं सागौन में अंतर कर पाना कठिन होता है, इसलिये कानून के अंतर्गत इन दोनों वनोपजों का क्रय-विक्रय वन विभाग के डिपो के माध्यम से ही अनिवार्य किया गया है।

निजी स्वामित्व में लगे साल एवं सागौन को काटने के लिये कानून के तहत वन विभाग से अनुमति लेनी होगी तथा अनुमति देने के पहले वन अफसर निरीक्षण करेंगे एवं इन पेड़ों पर इनकी पहचान हेतु मार्किंग करेंगे। निजी भूमि पर लगे वृक्षों को काटकर बेचने के लिये मालिक मकबूजा का भी वन विभाग ने लोक सेवा गारंटी कानून के तहत प्रावधान किया हुआ है।

इसके तहत, निजी व्यक्ति इन वृक्षों को वन विभाग के डिपों को उसकी निर्धारित दरों पर बेच सकता है या फिर लाट बनाकर इनकी वन डिपो के माध्यम से नीलामी भी करा सकता है। 45 दिन के अंदर से लोक सेवा गारंटी के तहत भुगतान भी प्राप्त हो जायेगा। विभागीय अधिकारी ने बताया कि पहले कानून में बहुत सारी वनोपज विनिर्दिष्ट वनोपज थीं लेकिन अब सिर्फ दो वनोपज साल एवं सागौन को ही विनिर्दिष्ट वनोपज घोषित किया गया है।