अंतिम संस्कार के लिए दो गज जमीन भी नसीब नहीं

बांध बनने के बाद नई बसावट में अब तक नहीं बना श्मशान घाट
- प्रशासन को आवेदन दे-देकर थक गए ग्रामीण
नीमच. डिजिटल इंडिया के दौर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास के आयाम गढऩे के सपने दिखाए जा रहे हैं, लेकिन गांवों के हालात आज भी बदतर हैं। जिले का एक गांव ऐसा भी है जहां पर किसी की मौत हो जाए तो अंतिम संस्कार के लिए श्मसानघाट तक नहीं है। विकास की बड़ी योजना के रूप में यहां बांध तो बना दिया लेकिन जिंदगी के अंतिम पड़ाव की जरूरत छीन ली।
यह हालात हैं जीरन तहसील के अंतर्गत कोई 2 हजार की आबादी वाले गांव काली कोटड़ी के। इस गांव के समीप ही कोई तीन बरस पहले हमेरिया बांध बना। इस बारिश में यह बांध लबालब भरा है। बांध के कारण दम तोड़ते खेत आबाद हो गए। लेकिन गांव के आसपास की अधिकांश जमीनें बारिश में टापू बन गई हैं। बांध बनने के पहले किए गए सर्वे में पंचायत, स्कूल, कई घर डूब में चले गए। नियम है कि जो गांव डूब में आते हैं उनकी पुनर्बसावट की जाती है।
दैनिक पत्रिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें उन तमाम सुविधाओं के लिए जमीन आरक्षित कर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं जो बांध बनने से पहले के गाव में मौजूद रही हैं। इस गांव की कई सुविधाओं के साथ श्मसानघाट भी डूब में चला गया। नई बसावट के लिए शासन ने जिस स्थान पर श्मसानघाट के लिए भूमि आरक्षित की थी उसकी यह स्थिति है कि वर्तमान में वहां 5-5 फिट पानी भरा रहता है।
मुर्रम डालकर यह श्मसानघाट बनाया गया था जो अब दिखाई भी नहीं देता।
खेतों पर किया जाता है अंतिम संस्कार-
इस गांव में बांध बनने के बाद जितने भी लोगों की मौतें हुई हैं, मजबूरी में ग्रामीणों को उनका अंतिम संस्कार खेतों पर ही करना पड़ा है। महत्वपूर्ण यह है कि यहां श्मसानघाट की मांग लोगों ने कई बार जनप्रतिनिधियों से की लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की।