भारत में रामलीला, रामलीला का इतिहास, रामलीला की परंपराएं, रामलीला क्यों होती है, रामलीला के क्या-क्या स्वरूप है, रामलीला का इतिहास।
रामलीला को भारतीय, सांस्कृतिक आयोजन कहा जाता है। संस्कृति, सांस्कृतिक, संस्कृत और संस्कार की परिभाषा समझ लेना आवश्यक है। संस्कार करना का अर्थ होता है शुद्ध करना, साफ करना, परिष्कृत करना, सजना और परिपूर्ण करना, निर्दोष या 'परफेक्ट' बनाना भी संस्कार करना है।
इस अर्थ में भारत में वैदिक युग से जीवन के संस्कारों की चर्चा की गयी है। दस, बारह, सोलह या अठारह संस्कार बनाये गये हैं। ये संस्कार आस्था-विश्वास, भावना और ज्ञान के आधार पर निर्धारित किये गये।
व्यावहारिक जीवन के तीन विभाग हैं- ज्ञान, कर्म, उपासना और इन्हें संस्कारों से सम्बद्ध किया गया है। संस्कारों का आरंभ, जन्म से बहुत पहले होता है। जन्म से पूर्व गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन संस्कार होते हैं, इसका आशय है पति-पत्नी, समय, स्थिति और अवस्था को ध्यान में रखकर शुभ निश्चय करें कि उन्हें संतान उत्पन्न करनी है (ऐसा नहीं कि अनचाहे ही गर्भ रह जाए) तब गर्भाधान किया जाए।
पुत्र की कामना हो तो पुंसवन संस्कार करें। गर्भावस्था के तीसरे चौथे मास। फिर गर्भस्थ शिशु के स्वस्थ मानसिक विकास के लिये सीमंतोन्नयन छठे मास करते हैं। अब गर्भिणी की विशेष देखरेख की जाती है। जब शिशु का जन्म होता है तो जातकर्म अथवा सुखद प्रसव, शिशु को मेधा, बल, बुद्धि तथा दीर्घायुष्य प्राप्ति के हित संस्कार करते हैं।
अब नवजात अपनी जीवनयात्रा आरंभ करता है और संस्कार इसके पड़ाव हैं- नामकरण, अन्नप्राशन, बहिर्गमन, चूड़ाकरण, कर्णवेध। शिशु किशोर होता है तो विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत और समावर्तन संस्कार होते हैं। इस प्रकार सभ्य सुसंस्कृत बना युवा-विवाह संस्कार द्वारा गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके कर्मक्षेत्र में आता है और जीवन के अंत में उपासना करते हुए दिवंगत होता है।
मृत्यु जीवन जैसी ही अनिवार्य है और इस संस्कार को अंत्येष्टि कहते हैं। जैसे जन्म से पहले ही संस्कारों का सिलसिला आरंभ होता है उसी प्रकार मृत्यु के भी कुछ काल बाद संस्कार चलते हैं। अंत्येष्टि में आसन्न मृत्यु से पूर्व प्रियजनों से अंतिम विदाई, मृत्यु के समय मुख में तुलसी, में सोना, गंगाजल की आहुति फिर अरथी, शव की विदाई, शवयात्रा, अनुस्तारिणी, दाह (अग्रि-संस्कार), संतप्त परिवार के प्रति सहानुभूति, असूया, अस्थि चयन, शांतीकर्म, स्मारक, श्राद्ध और सपिंडीकरण संस्कार होते हैं।
इस प्रकार जीवन का इंद्रधनुष बनता है जिसमें दृश्य वर्णों के अलावा अदृश्य जन्म पूर्व के संस्कार ‘इनफारेड' से और मृत्यु के बाद के ‘अल्ट्रावायलेट'-संस्कारों तक के वर्णों की पूरी प्रकाश व्यंजना विद्यमान है।
संस्कार में होता क्या है। संस्कार के अवयव हैं (1) अग्नि, (2) यज्ञ, प्रार्थना और आशीर्वचन, (3) स्नान-आचमन-मार्जन, (4) दिशा विशेष की ओर उन्मुख होना, (5) लोकाचार-साइत सगुन ।
संस्कार जीवन में उत्साह, उल्लास के अवसर प्रदान करते हैं। अंत्येष्टि को छोड़कर और सबसे पहले संस्कारों का उल्लेख करने वाले गृह्यसूत्र में संस्कारों की सूची में अंत्येष्टि को शामिल नहीं किया गया है क्योंकि यह दुखद, अशुभ, अमंगल कर्म हैं।
जन सामान्य के गहरे विश्वास का प्रतिनिधित्व करते ये संस्कार प्राणिमात्र को अशुभ प्रभावों से बचाने और देवकृपा प्राप्त करने की कामना अभिव्यक्त करते हैं। संस्कारों की सूची देखें तो स्पष्ट होगा कि इसमें समाज और उसके सदस्य के रूप में व्यक्ति के विकास की समूची प्रक्रिया विद्यमान है।
सभी चाहते हैं घर परिवार में सुख शांति रहे, समृद्धि हो, अन्न, वस्त्र, रत्नादि के साथ पशुधन प्राप्त हो, घर में पुत्र-पुत्री हो, परिवार के लोग बुद्धिमान हों, शक्तिशाली हों और उन्हें गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त हो।
संस्कार एक उद्देश्य है व्यक्ति और उसके परिवार के आनंद, सुख दुख की अभिव्यक्ति, अतिथि तथा प्रियजनों के स्वागत सत्कार की अभिलाषा की आपूर्ति।
राम-लक्ष्मण-जानकी वल्कल धारण कर दशरथ से विदा लेते हैं। अत्यंत करुण प्रसंग जनता के मन को दुख की अग्नि में तपाकर निर्मल कर देता है। सुमंत रथ में बैठाकर तीनों दिव्य पात्रों को तमसा तीर ले आते हैं। यहाँ निषादराज से भेंट होती है। छूत-अछूत के भेद मिट जाते हैं। प्रभु इन दीन हीन लोगों के अतिथि बनते हैं इनके यहां भोजन करते हैं। कोई भी यहाँ मानव प्रेम का संदेश प्राप्त कर सकता है। प्रभु का राज प्रेम राज है। राज में लक्ष्मण निषादराज को गीता का उपदेश सुनाते हैं।
सुमंत को विदा कर तीनों मूर्तियां गंगा तट पर आती हैं। केवट का मधुर प्रसंग और भारतीय आस्था की अनूठी छवि (कि प्रभु ही भवसागर से पार उतारते हैं) का विश्वास होता है। गंगापार कर श्री राम पार्थिव पूजन करते हैं गंगा जी की पूजा की जाती है। आगे वन को कष्टमय यात्रा नहीं एक तीर्थ-यात्रा आरंभ होती है।
व्यक्तियों को संकट काल में ऋषियों के दर्शन करके उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए। राम यही आदर्श प्रस्तुत करते हैं। प्रभु के साथ हम भारद्वाज और वाल्मीकि आश्रम होते हुए चित्रकूट पहुंचते हैं। इस मार्ग में एक ग्राम लीला भी आती है। गाँव की सरल भोली भाली स्त्रियाँ सीता माता से जानना चाहती हैं कि 'ये कौन हैं'। वे ब्रह्म को जानना चाहती हैं। भारतीय मनीषा ने इस बात पर ध्यान दिया है कि अनपढ़ गंवार प्राणी भी प्रभु का परिचय चाहता है यह बात अपने आप में अद्भुत है। गोपी को उद्धव के योग की नहीं केवल निष्कपट संपूर्ण प्रेम की आवश्यकता है। लीला चित्रकूट वासी प्रभु का संदेश देती है कि मैं प्रेम के बस में हूँ।
अगली लीला नये आदर्श के लिये फिर अवध क्षेत्र में आ जाती है। भरत लौटते हैं और सारी कथा सुनकर मर्माहत होते हैं, दशरथ का निधन हो चुका है मरण और अंत्येष्टि संस्कार नहीं दिखाते क्योंकि ये हमारी परंपरा के विरुद्ध है। सच पूछिये तो गृह्य सूत्र ने संस्कारों की सूची में अंत्येष्टि को गिना ही नहीं है। यह जीवन की कथा है मृत्यु की नहीं। भरत का चरित्र देखने सुनने वाले सभी को पवित्र कर देता है।
आज का व्यवहार कुशल भाई होता तो माँ की पीठ ठोंकता और ठाठ से राज करता। पर भरत तो समूची भारतीय परंपरा के आदर्श हैं उनके बारे में प्रभु श्री राम का विश्वास है 'भरतहिं होई न राजमद, विधि हरिहर पद पाइ' अवध का राजपद तो बहुत ही छोटा है। लीला में ऐसे प्रेम पयोधि का दर्शन कर भक्तगण ही नहीं, महाज्ञानी वशिष्ठ भी ठगे से रह गये।
भक्तराज की अपूर्व चित्रकूट यात्रा आरंभ होती है। रामनगर की लीला में भरत और अवधवासी ही नहीं समूचा दर्शक भक्त समाज यात्रा पर चल पड़ता है (और ऐसा किसी नाटक-तमाशे में नहीं होता, हो भी नहीं सकता) यात्रा के पड़ाव आते हैं। निषाद के गाँव में संदेह के बादल उमड़ते हैं जो प्रेम की वर्षा बनकर बरस जाते हैं। पुनः ऊँच-नीच का भेद मिटता है। भरत और निषाद राज का मिलन भारतीय आदर्श का नमूना है। आगे भरद्वाज आश्रम में हम ऋषियों की सिद्धी का चमत्कार देखते हैं। अंत में यात्रा चारू चित्रकूट की ओर बढ़ती है।
यमुना पार करके भरत चित्रकूट पहुँचते हैं। उधर राम को सूचना मिलती है। लक्ष्मण मानव सहज स्वभाव के अनुसार शंका करते हैं पर प्रभु का प्रेम अविचल है। एक संदेश और मिलता है कि मनुष्य को बिना विचारे सहसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए, यह बुद्धिमत्ता नहीं है।
चित्रकूट में भरत मिलाप होता है। इस मिलाप को देखने वाले कृतकृत्य हो जाते हैं। भाइयों में प्रेम हो तो ऐसा। फिर भरत के साथ आये समाज से मिलाप होता है इसका परम्परागत क्रम है, तरीका है। पहले प्रभु गुरुदेव वशिष्ठ से मिलते हैं, फिर माताओं से और तब पुरवासियों से। दशरथ मरण की सूचना मिलती है, तो परम्परानुसार राम उनका तर्पण श्राद्ध करते हैं।
अगली दो लीलाएँ जिसमें जनक के आगमन के बाद उच्च स्तरीय राजनीतिक सभा होती है, रामकथा के अद्भुत प्रसंग हैं। समस्या है, कोई भी पक्ष दूसरे पर जोर जबरदस्ती नहीं करना चाहता, तर्क और माँग के साथ अतिशय विनम्रता और विनय है।
काश कि आज के आंदोलनकारी और दुराग्रह पूर्ण असंभव माँगें पेश करने वाले इससे कुछ सीखते। राम की प्रतीक रूप पादुका प्राप्त कर भरत अवध लौटते हैं। सिंहासन पर उन्हें स्थापित करते हैं और फिर वनवासी वेश में नंदीग्राम में वास करते हैं। राजा विहीन राज्य का शासन कैसे चलाया जा सकता है इसका अनूठा आदर्श और उदाहरण प्रस्तुत होता है।
उधर चित्रकूट में रामलीला आगे बढ़ती है। जंगल में मंगल होता है। राम सीता का पुष्प श्रृंगार करते हैं (और लोग समझते हैं पत्नी का स्वर्णाभूषणों से सजाना ही श्रृंगार है)। अब आज के छेड़छाड़ करने वाले दुष्टों के लिये एक प्रसंग आता है। इंद्र का पुत्र जयंत कौवा बनकर सीता जी के पैर पर चोंच मारता है और फिर प्रभु के कोप का भाजन बनकर त्रैलोक्य में शरण माँगता फिरता है और रामशरण में आने पर ही हल्का दंड पाकर उसकी मुक्ति होती है।
राम चित्रकूट त्याग कर दक्षिण की ओर बढ़ते हैं। अत्रि मुनि के आश्रम में सीता अनुसूया संवाद भी भारत के गृहस्थ जीवन का स्वर्णिम उपदेश है। राम पंचवटी पहुँचते हैं। यहाँ पुनः भक्तजनों को श्रीराम के मुख से एक और गीता सुनने का लाभ मिलता है।
वन प्रदेश के संकट सिर उठाते हैं। शूर्पणखा के रूप में हमारी वासना प्रकट होती है, लक्ष्मण नाक कान काट कर उस कुरूपता को उजागर कर देते हैं। माताओं बहनों के लिये सीता-सूर्पनखा के दो विपरीत आदर्श प्रस्तुत होते हैं। सत्य और धर्म का आग्रह करने वाले के लिये मार्ग कठिन है। उसे खर दूषण से लड़ना होता है। रावण के दरबार में सूर्पनखा की गुहार पहुँचती है और मदांध रावण सीता हरण का संकल्प करके मारीच को बाध्य करता है कि वह स्वर्ण मृग का छल करे।
लोभ बड़ा प्रबल होता है और सीता का सात्विक मन भी स्वर्ण मृग के लिये चंचल हो उठता है। राम मृग के पीछे जाते हैं। मृग मरते समय भी छल करके लक्ष्मण को पुकारता है। सीता का चंचल मन, निर्मल चरित्र लक्ष्मण पर भी आरोप लगाने से नहीं चूकता लक्ष्मण रेखा खींचकर जाते हैं। हमारे समाज में अनेक लक्ष्मण रेखाएँ खींची हैं और इन्हें लांघने का कुफल सीता हरण जैसा ही दुखद होता है। रावण छलपूर्वक सीता हरण करके चलता है।
सीता हरण लीला का सबसे अद्भुत पात्र है, भारत का प्रथम सत्याग्रही 'जटायु'। जटायु बूढ़ा है दुर्बल है वह रावण के बल तथा पराक्रम से परिचित है, उससे लड़ने का परिणाम भी जानता है, पर उसके जीते जी कैसे कोई ऐसा अन्याय कर सकता है वह रावण से लड़कर प्राण त्याग देता है। रामायण का संदेश प्रचारित होता है। प्राण देकर भी अन्याय से लड़ो। आज नित्य सीता हरण होते रहते हैं पर कोई भी जटायु आगे नहीं आता। कोई नहीं सोचता कि राम को हम क्या जवाब देंगे।
सीता अपने वस्त्र आभूषण गिराती (राम के लिये मार्गदर्शन कराती) अशोक वाटिका में स्थापित होती हैं। इधर राम मृगचर्म लिये लौटते हैं तो कुटी को सूनी पाते हैं। विरही नायक की भाँति विलाप करते वे जटायु तक आते हैं। जटायु का अंतिम संस्कार करते हैं (मानो अपने पिता का कर रहे हों और इस प्रकार धर्म और सत्य के लिये शहीद होने वाले का कैसे सम्मान करना चाहिए इसका आदर्श प्रस्तुत करते हैं)।
अगली लीला शबरी मिलन की लीला है। एक भीलनी जो वर्षों से दर्शन की लालसा में बैठी बूढ़ी हो चुकी थी, प्रभु ने उसके प्रेम का कितना आदर और मान किया, शबरी के झूठे बेर खाये, सराह-सराह कर खाये और 'सबसे ऊँची प्रेम सगाई' का संदेश दिया। प्रभु ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश भी दिया।
आगे पंपासर के पास हनुमान से मिलन होता है और प्रभु सुग्रीव से मित्रता करते हैं। मित्रता का अर्थ स्पष्ट होता है।
बाली-सुग्रीव का युद्ध तथा बाली वध परिवार में कलह, शंका, लोभ आदि के दुष्परिणाम प्रगट करते हैं। सुग्रीव राजा बनते हैं और सीता की खोज आरंभ होती है।
महाबली हनुमान मैनाक, सुरसा, छाया ग्राहिणी और लंकिनी जैसी बाधाओं को पार कर लंका पहुंचते हैं। कैसे दुर्जनों के राज्य में विभीषण जैसे सज्जन भी बसते हैं- 'जिमि दसनन मंह जीभ बिचारी', इसका प्रमाण मिलता है। अशोक वाटिका में दुष्ट रावण सीता को धमकाता है पर दृढ़प्रतिज्ञ नारी कैसे निर्भय होकर उसका सामना करती है और नारी दर्शकों को मार्गदर्शन होता है कि कैसे दृढ़ता से दुर्जनों से सामना करना चाहिये ।
हनुमान मुद्रिका लेकर माता की सेवा में उपस्थित होते हैं, राम कथा सुनाते हैं। फिर असुरदल को चुनौती देते हैं-वाटिका उजाड़ कर, लंका जलाकर हनुमान की इस तोड़फोड़ के पीछे राम का बल था, धर्म तथा सत्य का बल था, दुराचारी को एक चुनौती थी। (यह आज की तोड़फोड़ से कितनी भित्र थी!)
विभीषण रावण को समझाते हैं पर विनाशकाले विपरीत बुद्धि होने के कारण विभीषण को लात मारकर लंका से निष्कासित किया जाता है। विभीषण राम की शरण में आता है। धर्मयुद्ध करने निकले लोग असंभव कार्य भी कर डालते हैं और सागर पर पुल बांधना इसी की एक मिसाल है।
यहाँ रामकथा एक और समस्या का समाधान करती है। सम्प्रदायों के भेद दूर किये जाते हैं- वैष्णव और शैवों का मिलन होता है- श्री राम रामेश्वर शिव की स्थापना करके घोषणा करते हैं कि वैष्णव और शैव परस्पर द्वेष नहीं करेंगे, एक दूसरे का आदर करेंगे। काश कि इस लीला से हम पुनः एक और रामेश्वर की स्थापना करके सर्वधर्म समभाव स्थापित कर पाते। एक बार फिर राम की तरह घोषणा करते कि राम-विष्णु-शिव-अल्लाह-गॉड सब एक हैं, सबका आदर करो। आदर्श प्रस्तुत हैं, माडल हाजिर है, अब पालन हम सबको करना है।
सिंधु पार करके राम संधि संदेश लेकर अंगद को रावण के दरबार में भेजते हैं। भारतीय राजनीति में युद्ध से पहले संधि वार्ता और दूतकर्म का यह गौरवपूर्ण अध्याय है। अंगद-रावण संवाद सुनने लायक होता है साथ ही माननीय भी है।
अब युद्ध आरंभ होता है। रणनीति की बारीकियाँ सामने आती हैं। कोई भी दुश्मन कमजोर नहीं होता। लक्ष्मण घायल होते हैं और हनुमान अब अतुलित बल का परिचय देते हुए औषधि लाते हैं। सत्कार्य में कैसे छल कपट बाधा डालते हैं यह बात कालनेमि प्रसंग स्पष्ट करता है। कुंभकर्ण-मेघनाद मारे जाते हैं। रावण युद्ध में यज्ञ करके दैवी सहायता प्राप्त करना चाहता है अस्तु ऐसा अनिष्टकारी यज्ञ ध्वंस कर दिया जाता है।
राम रावण का घनघोर युद्ध चलता है और रावण मारा जाता है। मरने के बाद शत्रुता शेष हो जाती है और विभीषण रावण का संस्कार करते हैं।
विभीषण का राज्याभिषेक, सीता की अग्नि परीक्षा और मृत वानरों को जीवनदान के बाद पुष्पक विमान से वापसी यात्रा आरंभ होती है।
रामलीला का सर्वाधिक मोहक प्रसंग है- भरत मिलाप चौदह वर्ष के विरह के बाद जब भाई-भाई गले मिलते हैं तो कैसे देखने वाले निर्मल होकर धन्य हो जाते हैं यह बात तभी समझ में आ सकती है जब आप अपनी आँखों से भरत मिलाप देखें।
राम का राज्याभिषेक रामलीला यज्ञ की पूर्णाहुति है। लीला के संयोजक ने लीला आरंभ से पूर्व जो संकल्प लिया था उसकी सानंद समाप्ति होने का अपरिमित आनंद गाने बजाने, उत्सव में अभिव्यक्त होता है ऐसे अवसर पर आमोद-प्रमोद में हम अपने आपको धर्म कर्म, सद्व्यवहार, प्रेम और सत्य को भूल न जाएँ इस हेतु सनक सनन्दन पधार कर जनोपदेश करते हैं, 'रामराज्य' की रूपरेखा प्रस्तुत की जाती है।
एक आदर्श शासन का भारतीय आदर्श है, 'रामराज्य' जिसकी हम सबको कामना है और हम सबको उसे स्थापित करने का प्रयास करना है। रामलीला उस सुखद स्वप्न का संदेश देकर एक वर्ष के लिए विश्राम करती है।
भारतीय संस्कार, धर्मदर्शन, नीति और सद्व्यवहार, ज्ञान-विज्ञान का 'रामलीला' से बढ़िया दर्पण क्या कहीं मिल सकेगा?