भोपाल. माधव नेशनल पार्क प्रबंधन ने 2000 हेक्टेयर कॉरिडोर एरिया को कब्जेधारियों को बेदखल कराया. यह कार्रवाई तब हुई, जब प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल और प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी आलोक कुमार ने बेदखली की कार्रवाई के सख्त निर्देश दिए थे. दिलचस्प पहलू यह है कि कब्जाधारियों में ज्यादातर लोग वही थे जिन्होंने 2008 में बाघ पुनर्स्थापना के तहत लाखों रुपए मुआवजा ले चुके थे. यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि 2008 में वन विभाग ने माधव नेशनल पार्क से विस्थापन होने के लिए 27 करोड़ 99 लाख से अधिक का भुगतान बतौर मुआवजा दिया गया था.
वर्ष 2008 में मुआवजा लेने के बाद भी मामौनी, हरनगर, अर्जुनगवा, चकडोगर और लखनगवा गांव के लोग पार्क के कोरिडोर एरिया की 2000 हेक्टेयर जमीन में खेती कर रहे थे. ग्रामीणों द्वारा खेती करने के कारण 2007-08 से 2016-17 में बाघ पुनर्स्थापना की कार्रवाई लंबित रही. इस बीच माधव नेशनल पार्क में कई डायरेक्टर आए और चले गए. किसी ने भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं की. ऐसे या तो तय हो गया कि उनकी पार्क के कोरिडोर जमीन पर अवैध खेती कराने मैं कहीं न कहीं उनकी संलिप्तता रही है. फील्ड से मिली जानकारी के अनुसार 2017-18 में सबसे अधिक अतिक्रमण हुआ. बताया जाता है कि वर्ष 2017-18 से लेकर अब तक 1 दर्जन से अधिक आईएफएस अफसर माधव नेशनल पार्क के संचालक रह चुके हैं. इन अफसरों की भूमिका की जांच होनी चाहिए.
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अक्टूबर से शुरू हुई अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई
माधव नेशनल पार्क के डायरेक्टर सीएस निनामा ने प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल के निर्देश मिलने के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों और वन्य प्राणी प्रेमियों के साथ बैठक कर पहले तो ग्रामवासियों को कोरिडोर की भूमि से हटने के लिए समझाने की कोशिश की. जब वे नहीं माने तो राजस्व एवं वन विभाग की संयुक्त टीम बनाकर पुलिस की मदद से बेजा कब्जा हटाने की कार्रवाई की. माधव नेशनल पार्क के कॉरिडोर की जमीन शहर से लगी हुई है. इसकी कीमत 1500 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई है.
खेती के एवज में वसूलते थे राशि
माधव नेशनल पार्क के कोरिडोर की 2000 भूमि पर खेती होने के एवज में प्रबंधन और वहां के स्टाफ प्रति हेक्टेयर ₹2000 की वसूली करते थे. यही वजह रही कि 2008 के बाद जितने भी डायरेक्टर और स्टाफ आते-जाते रहे, वे सभी खेती कर रहे किसानों से राशि वसूलते रहे हैं. यहां की जमीन पर सबसे अधिक सरसों की खेती होती है.