शक्तिपात सिद्ध योग विद्या का एक अहम साधन है|

शक्तिपात दीक्षा समर्थ गुरु ही कर सकता है|

यूं तो आज अनेक स्वयंभू गुरु अपने शिष्यों को दीक्षा देते हैं|  लेकिन शक्तिपात दीक्षा विशिष्ट दीक्षा है जिसे देने के लिए गुरु को खुद शक्ति संपन्न बनना होता है|

संपन्न गुरु के शक्तिपात से जागृत हुई कुंडलनी साधक को योग मार्ग से मोक्ष तक की यात्रा कराती  है| 

जागृत कुंडलनी के प्रभाव से साधक में अष्टांग योग अपने आप घटित होता है|  साधक को उसकी योग्यता को बढ़ाने के लिए स्वयं अनेक प्रकार के योगासन, बंध, मुद्रा, प्राणायाम, ध्यान, धारणा  होने लगते हैं| 

कई बार साधक को उसके प्रारब्ध के साधन के कारण अनायास ही शक्तिपात हो जाता है|  कई बार उसे उसकी साधना के परिणाम स्वरुप समर्थ सद्गुरू मिलते हैं जो उसकी आंतरिक शक्ति को जागृत कर देते हैं|

सबके अंदर कुंडलनी शक्ति उसके आधार क्षेत्र में मौजूद होती है|  सामान्य मनुष्य में वह कुंडलनी सुप्त अवस्था में होती है लेकिन जब साधक शक्तिपात प्राप्त करता है तो उसकी कुंडलनी क्रियाशील हो जाती है| 

जब कुंडलनी क्रियाशील होती है तो साधक के मूलाधार में कंपन होने लगता है| शरीर में तेज वाइब्रेशन होता है| विभिन्न प्रकार के प्राणायाम होते हैं| रोमांच पैदा होता है| अनेक प्रकार के भाव के आवेश पैदा होते हैं| साधक में उड्डियान बंध, जालंधर बंध, मूलबंध लगने लगते हैं| खेचरी मुद्रा लगती है| केबल कुम्भक हो जाता है| गुरु मंत्र चलने लगता है| मंत्र अजपा हो जाता है| अपने आप प्रणव  का जाप होने लगता है| अनेक प्रकार के मंत्र प्रस्फुटित होने लगते हैं| नाना प्रकार के नाद होते हैं| शांभवी मुद्रा लगने लगती है| शरीर चक्की की तरह घूमता है, अनेक प्रकार से क्रिया करता है| कुंडलनी के आवेश से आनंद ही आनंद होता है| संकल्प मात्र से ही शरीर में क्रियाएं होने लगती हैं| अनेक प्रकार के शब्द निकलते हैं| स्थान स्थान पर प्राण की गति मालूम होने लगती है| जहां मन लगता है वहां प्राण की क्रिया शुरू हो जाती है| शरीर विभिन्न प्रकार के आसन लगाता है| अपने आप शीर्षासन लगने लगता है| हाथ से तालियां बजती है| ध्यान का नशा चढ़ जाता है| मस्ती छा जाती है| समय-समय पर आवेश आने लगता है| देवताओं के दर्शन होते हैं| दिव्य गंध रूप रस शब्द स्पर्श के अनुभव होते हैं| मन एकाग्र होने लगता है| दिव्य शक्तियों से वार्तालाप होता है| सूक्ष्म शरीर सामने दिखने लगता है| अनेक प्रकार के प्रकाश दिखाई देते हैं| भूत भविष्य और वर्तमान की कई बातों का ज्ञान होता है| भ्रुकुटी में दृष्टि स्थिर हो जाती है| शक्तिपात से जागृत कुंडलनी अलग-अलग प्रकार से साधक के अनुकूल क्रियाएं कराते हुए आत्म साक्षात्कार की ओर ले जाती है| पातंजल योग दर्शन के अनुरूप यम, नियम, आसन, प्राणायाम,, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की अवस्थाएं स्वयं घटित होती हैं|

शक्तिपात दीक्षा के अनेक प्रकार है|  

धर्म-दर्शन कहता है कि जब तक कुंडलनी शक्ति मूलाधार में निद्रा अवस्था में है तब तक जप तप  ज्ञान ध्यान पाठ पूजन मंत्र यंत्र से कोई लाभ नहीं होता| इसलिए कुंडलनी शक्ति की जागृति जरूरी है| कुंडलनी शक्ति की जागृति के लिए गुरु का सामर्थ्यवान होना जरूरी है तो शिष्य में भी योग्यता होनी जरूरी है| यदि शिष्य पात्र नहीं है, उसके अंदर अध्यात्मिक उत्कंठा नहीं है, उसके अंदर ईश्वर प्राप्ति की प्रबल जिज्ञासा और मुमुक्षा नहीं है, तो वह शक्तिपात का अधिकारी नहीं होता, साधक के अंदर की जिज्ञासा और मुमुक्षा ही उसे शक्तिपात का अधिकारी बनाती है|

 

अतुल विनोद 

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