दुनिया एक गहरे संकट में पहुंच चुकी है. यह संकट नजर आते हुए भी निजी स्वार्थों के चलते लोगों के मन मस्तिष्क से ओझल है।

दरअसल हम इतने आत्म केंद्रित हो चुके हैं कि हमें दुनिया के इस सबसे बड़े संकट की आहट सुनाई और दिखाई नहीं दे रही। यह आहट पर्यावरण से जुड़ी हुई है और पर्यावरण हम से जुड़ा हुआ है। पर्यावरण इस हद तक प्रदूषित हो चुका है कि लोगों को सांस लेने में कठिनाई हो रही है। सांस लेना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन इस अधिकार को हमसे छीन लिया गया है।

बढ़ती आबादी ने इस अधिकार को हमसे छीना है। विकास कार्यों ने इस अधिकार को हमसे छीना है। बढ़ते इंडस्ट्री लाइजेशन ने इस इस अधिकार को हमसे छीना है।

पहले गांव में देश की आबादी का बड़ा प्रतिशत रहता था लेकिन गांव के लोग शहर में आकर बसने लगे।

अब कस्बे महानगरों का रूप लेते जा रहे हैं। यह शहर पर्यावरण को प्रदूषित करने में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी कर रहे हैं।

देश की राजधानी दिल्ली में जीना मुहाल हो गया है। वह बच्चे जो खतरनाक प्रदूषण के साथ बढ़ रहे हैं क्या वह इस देश का भविष्य बन पाएंगे? क्या हमें इस बात की चिंता है कि यह बच्चे जब बड़े होंगे तो किन किन बीमारियों से जूझ रहे होंगे?

बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण आज मानव जाति के लिए चुनौती बन चुका है, और यह चुनौती कब बड़े विनाश का कारण बन जाएगी कहा नहीं जा सकता।

किताबों में, धर्मगुरुओं ने सदियों पहले ही कयामत की चेतावनी दे दी थी। क्या बढ़ता वायु प्रदूषण ही प्रलय का सबब बनेगा? क्योंकि इस प्रदूषण के कारण जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। दुनिया में धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ते तापमान के चलते समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।

आखिर कयामत क्यों नहीं आएगी? 

पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं कि अब शहरों को इस लड़ाई का नेतृत्व करना होगा। क्योंकि शहर ही इस समस्या की जड़ है। जिसने समस्या पैदा की है वही इस लड़ाई को बेहतर ढंग से लड़ सकता है। समस्या की जड़ पर प्रहार किए बगैर समाधान कैसा?

हमारे शहर बेदर्द आबादी के बढ़ते दबाव को कब तक सहन करेंगे? इनका बेतरतीब विकास सर्वविदित है. शहरों में निकलना किस कदर कठिन है यह सब जानते हैं. सड़कों पर वाहनों का दबाव किसी से छुपा नहीं है. इन शहरों में प्राकृतिक आपदाएं आना अब नई बात नहीं रही. कभी बाढ़ का कहर तो कभी गर्मी कभी बढ़ता प्रकोप। कभी धूल का गुबार।

आखिर कैसे इस समस्या का निदान निकलेगा क्योंकि शहर जीने लायक बचे नहीं हैं?

शहरों में रहने वाले लोग तमाम तरह की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं. इसके लिए सरकार के पास क्या प्लान है? दिल्ली की सरकार हो या अन्य प्रदेशों की या फिर केंद्र की सरकार. क्या सब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? सिर्फ चिंताएं जताई जाती रहेंगी और फ्रंट पर कुछ नहीं होगा।

भारत के शहरों को पोलूशन से मुक्त करने की क्या प्लानिंग है? क्या शहरों की आबादी को बढ़ने से रोका जाएगा? शहरों के आसपास खेती लायक जमीन बची नहीं है. गिद्धों ने सब विकास के नाम पर हड़प ली। आसपास के लाखों गांव इनमें मिलकर कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके हैं। पेड़ों को सड़कों के लिए काटा गया, तो घर बनाने वालों ने आसपास सब कुछ कंक्रीट करके जमीन तक पानी पहुंचने के रास्ते बंद कर दिए। विकास योजनाओं के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई किसी से छिपी नहीं है।

जहां पर बुनियादी बात को ध्यान में नहीं रखा जाता, निजी स्वार्थ के लिए, कॉरपोरेट घरानों के लिए, बिल्डर्स और डेवलपर्स के लिए, सरकारी योजनाओं के लिए पर्यावरण को दांव पर लगाना आम बात है!

क्या यह बुद्धिमानी है या मूर्खता की पराकाष्ठा? इस मूर्खता के दौर में किस से उम्मीद की जाएगी। आम नागरिक खुद इतना स्वार्थी है कि उसे अपने हितों के आगे दूसरी कोई बात दिखाई नहीं देती। लेकिन लोग अपनी भूमिका नहीं निभाना चाहते। एक पेड़ लगाने में उन्हें नानी याद आती है। पेड़ लगा भी दिया बेमन से तो उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेने से घबराते हैं।

जिन पेड़ों से हमें ऑक्सीजन मिलती है, जिनकी बदौलत हमारा जीवन चल रहा है, उन पेड़ों को काटने में हम नंबर वन है लेकिन लगाने में सबसे पीछे।