प्रायः सभी मनुष्यों के जीवन में किसी-न-किसी समय ये प्रश्न आये बिना नहीं रहते कि 'मैं कहाँ से आया हूँ?' और 'कहाँ जाऊँगा ?'
जगत् सृष्टि के समय से यह खोज सभी देशों में और सभी मतों तथा सभी दर्शनों में की जा रही है। विभिन्न मतवाले लोग परलोक तथा पुनर्जन्म के सम्बन्ध में अपने-अपने विचार भी प्रदर्शित करते रहे हैं। इन सब विचारों पर परामर्श किए बिना अपने-अपने आध्यात्मिक सिद्धांत को स्थापित करना असम्भव नहीं तो, कठिन अवश्य है।
कठोपनिषद तथा श्रीमद्भागवत गीता का बीज-प्रश्न भी यही है। अन्यान्य उपनिषदों में, पुराणों में और दर्शन ग्रंथों में भी इस विषय पर बड़ी चर्चा आयी है। वह ठीक ही है; क्योंकि पुनर्जन्म-परलोक संबंधी चर्चा के बिना अध्यात्म विचार हो ही नहीं सकता।
यह जो प्रश्न अधिकारी शिष्य नचिकेता ने गुरु ब्रह्मविद्याचार्य वैवस्वत यम से किया, वह प्रश्न सनातन ही है। गीता का द्वितीय अध्याय, जो गीता का हार्द है और जिसमें अर्जुन के मुख्य प्रश्न का उत्तर आया है, वह सम्पूर्णत: कठोपनिषद पर ही आधारित है।
कई सिद्धांत वाक्य समान रूप से उपलब्ध होते हैं, यह बात विद्वानों को विदित ही है। सभी दार्शनिक ग्रंथों में विशेष रूप से गीता में स्पष्ट सिद्ध किया गया है कि आत्मा अजर-अमर तथा अविनाशी है|
परलोक और पुनर्जन्म भारतीय वैदिक धर्म की मूल भित्ति होने से इन्हीं विषयों पर यह 'कल्याण' के विशेषांक का प्रकाशन सभी के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।