एक समय था जब भारत में शेर अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, देश से शेर खत्म होने को थे, लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि घटते शेर बढ़ने लगे?
शेर हमारी पहचान हैं, आदरणीय हैं, शेरों को सत्कार दीजिए….
भारत आज पहचान रखता है तो उसके पीछे भारत की प्राकृतिक और जैविक संपदा भी है। भारत शेरों का देश है। भारत ने न सिर्फ जांबाज क्रांतिकारी शेर रूपी मनुष्य पैदा किए बल्कि भारत में वास्तविक शेर भी पैदा हुए। हालांकि शेरों को भारत में कई बार संकटों का सामना करना पड़ा।
लेकिन तमाम संकटों के बावजूद शेर के अस्तित्व को हमने बचाए रखा, क्योंकि हम मूल रूप से जानवरों को देवता के रूप में पूजने वाले लोग हैं। शेर अपनी तेजस्विता के लिए जाना जाता है। इसके प्रति हम खासतौर से आदर सम्मान और प्रेम रखते हैं। हम उसके सामने नतमस्तक होते हैं। उसका उदाहरण देते हैं और उसे देखने के लिए जंगलों की सैर करते हैं।
एक समय था जब भारत में अंग्रेजों का शासन था। राजा महाराजा और अंग्रेजों में कई ऐसे भी थे जो शेर का शिकार करना मर्दानगी की बात समझते थे। भारत में शेर सिर्फ जूनागढ़ में बचे थे। हालांकि वहां के नवाब महाबत खान इस प्राणी का शिकार करने की बजाय उसकी रक्षा करना अपना धर्म समझते थे। उस समय शेरों के शिकार का कोटा सिस्टम रखना पड़ता था। क्योंकि वायसराय गवर्नर को शिकार करने से कोई मना नहीं कर सकता था।
इसलिए उन्हें साल में 4, 6 शेर मारने की रियायत देनी पड़ती थी। नवाब महाबत खान दोस्ती भी कम ही रखते थे, क्योंकि दूसरे राजा महाराजा शिकार के लिए अनुमति मांग सकते थे। 1947 में देश का बंटवारा हुआ। नवाब महाबत खान पाकिस्तान चले गए। हालांकि जाते वक्त उनकी आंखों में आंसू थे। आखिर उनके शेरों की रक्षा कौन करेगा।
आजादी हुई। आजादी के बाद देश में प्राकृतिक संसाधनों पर अतिक्रमण शुरू हुआ। लोग पशु और प्राणियों का बेदर्दी से शिकार करने लगे। प्रकृति पर कहर बरपा। लाखों पेड़ काटे गए, खेती होने लगी, जंगल घटने लगे, जानवरों के खाने पीने के साधन भी कम होते गए। बड़े पैमाने पर शिकार होने लगा। कुछ लोग शौक के लिए शिकार करते थे तो कुछ लोग पैसे कमाने के लिए।
कहते हैं कि आज से 100 साल पहले भारत में शेरों की आबादी 60,000 के लगभग थी लेकिन 1970 के दशक में 2,000 ही शेष रह पाए, वे बड़ी मुश्किल अपना अस्तित्व बचा पाए।
यदि हम समय रहते नहीं जागते, देश के प्रकृति और पर्यावरण प्रेमी इस दिशा में कदम नहीं उठाते, आवाज नहीं लगाई जाती तो फिर हम हाथ मलते रह जाते। और भारत शेर विहीन हो जाता, उस समय फॉरेस्ट सर्विस ऑफिसर कैलाश सांखला देश के सबसे बड़े वन्य जीव संरक्षक बने, ये कैलाश सांखला ही थे, जिन्होंने 1953 में एक टाइगर को अपनी रायफ़ल से मारा था, लेकिन यह वह दौर था जब मरते हुए शेर की आंखों में पीड़ा देखकर kailash सहम गए, उनका दिल दहल गया और फिर जीवन के आखिर तक वह शानदार प्राणी को बचाने के अभियान में जुट गए।
यह बहुत मुश्किल काम था। कोई सुनने वाला नहीं था। 1965 में कैलाश सांखला को दिल्ली के जू में डायरेक्टर बनाया गया। उन्होंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया। चिड़ियाघर में उन्होंने नेचुरल हैबिटेट बनाया।
उस दौर में बाघ की खाल का कारोबार अखबारों में सुर्खियों में आया, खाल खुलेआम दिल्ली के बाजारों में बिक रहे थे, 1970 में प्राणियों की खाल और हड्डियों का एक्सपोर्ट भारत से बंद हुआ। कैलाश सांखला ने देशभर में स्टडी की। उनके अभियान को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी सराहा। काफी विरोध के बाद भी 1972 में संसद में वाइल्डलाइफ प्रोटक्शन एक्ट पास हुआ। जंगली प्राणियों के शिकार पर बैन लगा।
सरकार को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी बनाने का मौका मिला। बाघ की रक्षा के लिए टाइगर टास्क फोर्स बनाई गई और प्रोजेक्ट टाइगर का जन्म हुआ। कैलाश सांखला इस अभियान के पहले डायरेक्टर थे। उनका उस समय बहुत अच्छी तरीके से साथ दिया आईएएस अफसर MK रणजीत सिंह ने। वे शिकार करने वाले रॉयल फैमिली से थे, 1973 में 9 टाइगर रिजर्व स्थापित किए गए, ताकि बाघ शेर नेचुरल हैबिटेट में फल-फूल सकें। कई गांव को रीलोकेट किया गया, क्योंकि जानवर और मनुष्य के बीच में झड़प हो रही थी।
आज प्रोजेक्ट टाइगर विश्व भर में बड़ी सफलता माना जाता है। आज भी शेरों पर खतरा मंडरा रहा है, लेकिन लोगों की जागरूकता, वन्यजीव प्राणियों के प्रशंसकों की बढ़ती संख्या और सरकारों की सजगता ने टाइगर को फिर से अस्तित्व बचाने का मौका दिया। टाइगर की आबादी बढ़ती गई।
आज देश में दुनिया के 75 फ़ीसदी टाइगर हैं।आज मध्य प्रदेश टाइगर स्टेट के नाम से जाना जाता है। आज मध्य प्रदेश के कई टाइगर रिजर्व में टाइगर की संख्या काफी बढ़ चुकी है।