दिल्ली कोर्ट ने दिल्ली व केंद्र सरकार को फटकारा भी है। वहां आशिक लॉकडाउन लगाना पड़ा है। इसलिए प्रदूषण की निरंतर बढ़ती समस्या के प्रति सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती जरूरी व सराहनीय मानी जा रही है। न्यायालय ने सोमवार को प्रदूषण की बढ़ती समस्या पर जिस तरह की टिप्पणियां की हैं, उन पर जरूर गौर होना चाहिए। 

दिल्ली सरकार को फटकार के पीछे जहां सरकार की उदासीनता या लापरवाही जिम्मेदार है, तो वहीं इसके पीछे न्यायालय की अपनी चिंता भी छिपी है। हालांकि यह भी पहला मौका नहीं है, जब न्यायालय ने किसी सरकार को प्रदूषण के प्रति गंभीरता बरतने के लिए अपने ढंग से प्रेरित किया है। प्रदूषण का इतिहास अगर हम देखें, तो जो भी सुधार पहले होते दिखे हैं, उनके पीछे कहीं न कहीं सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका रही है।

न्यायालय ने सरकारों को दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए निर्माण, गैर जरूरी परिवहन, बिजली संयंत्रों को रोकने और घर से वर्क फ्रॉम होम लागू करने जैसे मुद्दों पर आपात बैठक बुलाने का निर्देश दिया है। कायदे से यह बैठक सरकारों को पहले ही बुला लेनी चाहिए थी। 

अब उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार का असर दिखेगा व स्थायी रूप से प्रदूषण से बचने के इंतजाम सरकारों की प्राथमिकता सूची में शामिल होंगे। वैसे भी हर वर्ष इस मौसम में न्यायालय की प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद प्रदूषण की समस्या को बहुत हल्के में लिया जाता रहा है। नतीजा सामने है, प्रदूषण बढ़ता चला जा रहा है। 

अब न्यायालय में प्रदूषण पर 17 नवंबर या उसके बाद सुनवाई होगी, उससे पहले ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकारों को ठोस पहल के साथ सामने आना चाहिए। वर्क फ्रॉम होम का फार्मूला जहां तक संभव हो, लागू किया जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञ बेहतर बता पाएंगे कि छोटे लॉकडाउन से कितना फायदा होगा। 

हम अभी पिछले लॉकडाउन के दुष्प्रभावों से ही उबर नहीं पाए हैं। वैसे न्यायालय की फटकार का असर दिल्ली से दूर तक भी दिखने लगा है। हरियाणा सरकार ने 17 नवंबर तक के लिए कुछ जिलों में स्कूल बंद करने का फैसला किया है। मगर बात सिर्फ दिल्ली-हरियाणा की ही नहीं है। बल्कि उप्र से लेकर गुजरात और मप्र से लेकर दक्षिणी राज्यों में प्रदूषण की अलग स्तर की समस्यायें है। मानकों के लिहाज से इसे कम मानकर सरकारों और समाज का चुप बैठने का मतलब यह होगा कि यह राज्य भी दिल्ली जैसे हश्र की तरफ बढ़ेंगे। यूं तो अनेक उपाय हैं, जो प्रदूषण घटाने में कारगर हो सकते हैं। इनमें बेहद ज्यादा पुराने डीजल व पेट्रोल वाहनों की कड़ाई से जांच, निर्माण कार्य पर नजर, कचरा व पराली जलाने पर रोक और सड़कों की सफाई के लिए जल छिड़काव को अनिवार्य बनाया जा सकता है।" 

सरकारों के लिए यह जरूरी है कि वे प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक करें और उन्हें जिम्मेदार बनाएं। हालांकि सिर्फ सरकार की सख्ती या कोर्ट की कडाई से ही मामला नहीं संभलेगा। बल्कि समाज और हर व्यक्ति को अपने तय योगदान के लिये आगे आना होगा। मगर पहली जिम्मेदारी सरकार की होगी, यदि वह इस मामले में समझौता करती नहीं दिखेगी तो सभी के तेवर भी ऐसे ही रहेंगे।