आत्मा की अमरता:

(अनन्तश्री विभूषित श्रीभृंगेरी मठाधीश्वर जगद्गुरु श्री शंकराचार्य श्री अभिनव विद्या तीर्थ स्वामीजी महाराज)| 

हम संसार में क्या देखते हैं कि कोई सुखी है, कोई दुखी है, कोई बुद्धिमान है तो कोई बुद्धिविहीन, कोई धनी है तो कोई कंगाल। कोई भी यह नहीं चाहता कि मैं दुखी, बुद्धिविहीन या कंगाल बनूँ। नहीं चाहते हुए भी क्यों ऐसे बन जाते हैं? 

कुछ लोग इसका यो समाधान देते हैं कि हमारे लौकिक प्रयत्न और उपाय जैसे होते हैं, वैसे ही हम बनते हैं। जो लोग उपायों को न अपनाये और प्रयत्न भी न करें, वे कुछ भी नहीं साध सकते, किंतु संसार में हम यह भी देखते हैं कि उपायों को अपनाकर सतत प्रयत्न करते रहने पर भी बहुत से लोग सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। 

इस पर हम यह विचार कर सकते हैं कि संसार में दीखने वाली यह विचित्रता क्या निर्हेतुक है? नहीं, कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं हो सकता। यदि वैसा हो तो फिर कोई भी किसी भी सफलता के लिये प्रयत्न ही क्यों करें। अतः हमें यह अवश्य मानना पड़ता है कि कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं हो सकता। तो इस विचित्रता का कारण क्या है।

समं कर्षन्ति पृथिवीं समं शास्त्राण्यधीयते।

उन्मजन्ति निमज्जन्ति दैवस्यैकस्य लीलया॥

"जमीन को समान रूप से जोतते हैं, शास्त्रों को समानरूपी से सीखते हैं, किंतु एकमात्र देव की लीला से डूबते और ऊपर उठते हैं।' वह देव क्या है? सनातन वैदिक शास्त्र मात्र इसका समाधान देते हैं। 

वे कहते हैं- 'हे मानव! तुमने जो कुछ किया है और करते हो, उनसे जो संस्कार बनते हैं, वे ही दैव या पुण्य पाप कहलाते हैं। तुम्हारे वे काम ही अब नहीं होते हुए भी, देव के द्वारा अपना-अपना फल उत्पन्न करते हैं। इससे हम यह निश्चय कर सकते हैं कि सुख-दुःख, विवेक अविवेक और सम्पत्ति विपत्ति सब कुछ हमारे किये का फल है।'

इस पर यह प्रश्न होता है कि 'कोई नन्हा सा बच्चा जन्म से ही स्वस्थ और कोई माता का स्तन्य तक पीने में अशक क्यों होता है? उसने ऐसा कौन-सा काम किया, जिससे वह तीव्रतर सुख या दुःख भोगे ?'

इसका उत्तर यह है कि इस समय उसने भी न किया हो और करने में असमर्थ भी हो; किंतु जब करने में समर्थ था, तब जो कुछ किया था, अब केवल उसी का फल भोगता है। फिर समर्थ होने के बाद जो कुछ करेगा, उसका फल भी आगे अवश्य भोगेगा। 

हमारे सुख-दुख के कारण इस जन्म के कर्म भी होते हैं, बीते हुए जन्मों के भी। जन्म का कारण कर्म, कर्म से जन्म, जन्म से कर्म। 'तो यह चक्र कब से आरम्भ हुआ?' यह चक्र अनादि है। आत्मा भी अनादिकाल से सुख-दुःख भोगता आ रहा है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । 

इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥

'बार-बार जन्म, बार-बार मरण, बार-बार माता की कोख में निवास, हे मुरारे! संसार बड़ा दुस्तर है। कृपा करके इससे हमें उबारिये।'

इस चक्र का आदि मानें तो चक्र के चलने वाले और वैषम्य-नैर्घृण्य (पक्षपात तथा कृपा हीनता) दोष मढ़ने पड़ेंगे। और जिसमें पक्षपातादि दोष हों, वह भगवान ही नहीं। गीता में भगवान ने अपने स्वरूप का प्रतिपादन किया – 'न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः मैं न किसी से घृणा करता हूँ, न प्यार।' भगवान तो कर्मफलदाता हैं। कर्म के अनुरूप फल देंगे। कर्म चक्र ही अनादि हुआ तो फिर जीव के अनादित्व में तो कहना ही क्या है।

ये कर्म भी स्वरूपा ज्ञान से हुआ करते हैं। 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।' अज्ञान से ज्ञान के आवृत होने के कारण लोग मोहग्रस्त हो जाते हैं। मोह से कर्म, कर्म से जन्म और जन्म से सुख-दुःख-प्राप्ति। इस अनादि चक्र को वेदांत शास्त्रस्य स्वरूप ज्ञान से हटाकर आत्मा परमानंद प्रकाश स्वरूप होकर विराजेगा।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥