भोपाल. प्रदेश के आदिवासियों को 15 नवंबर 2021 का दिन हमेशा याद रखना चाहिए. इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदिवासियों के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं और सौगाते दी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मध्य प्रदेश के असल राजा आदिवासी रहे हैं. यह कहते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शायद भूल गए कि मध्य प्रदेश के गठन के बाद से ही आदिवासी राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक बनकर रह गए हैं. जब-जब आदिवासी नेताओं ने नेतृत्व के लिए अपनी आवाज बुलंद की, तब-तब उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से हाशिए पर धकेल दिया गया. चाहे वह सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते हो या फिर दिवंगत नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी. पिछले एक दशक से सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए तड़प रहे हैं किंतु दिल्ली से लेकर भोपाल तक किसी भी नेता ने उनकी बात नहीं सुनी. भाजपा ने केवल उनको अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई.
मध्य प्रदेश के गठन के बाद से प्रदेश के आदिवासी कांग्रेस से जुड़े रहे. प्रदेश में कांग्रेस 42 सालों तक सत्ता में रही. इन 42 सालों में 20 साल ब्राह्मण, 18 साल ठाकुर और तीन साल बनिया (प्रकाश चंद्र सेठी) मुख्यमंत्री रहे. यानी 42 सालों तक कांग्रेस राज में सत्ता के शीर्ष सवर्ण रहे. केवल आदिवासी राजा केवल नरेश चंद्र सिंह (13 मार्च 1969 से 25 मार्च 1969 तक ) 26 दिनों के लिए ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह पाए. इसके बाद से आज तक कोई भी आदिवासी नेता प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. चुनाव में जरूर आदिवासी वोट बैंक भुनाने की कोशिश होती रही. आदिवासी वोट बैंक मूलरूप से कांग्रेस के साथ रहा है. इंदिरा गांधी की निधन के बाद कांग्रेस में आदिवासी नेता राजनीतिक रूप से असुरक्षित महसूस करने लगे. इसकी वजह भी साफ थी कि मुखर आदिवासी नेताओं को कांग्रेस में हाशिए पर धकेलने की एक साजिश शुरू हो गई. यह सिलसिला 80 के दशक से शुरू हुआ जो अब तक निरंतर चल रहा है. मेरे दिवंगत मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और उसके बाद उनके राजनीतिक दिग्विजय सिंह आदिवासी नेताओं को मुख्यमंत्री की दौड़ से पीछे धकेलते रहे.
यही वजह रही कि आदिवासी नौकरशाह से राजनीति में आए स्वर्गीय अजीत जोगी अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन पाए. प्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी बने. ऐसा नहीं था कि मुख्यमंत्री पद के योग्य दावेदारों में आदिवासी नेता नहीं थे. दिलीप सिंह भूरिया, झूमक लाल भेड़िया, बिसाहूलाल महंत बसंतराय उईके जमुना देवी (ये सभी दिवंगत हो गए है) कांग्रेस में राजनीतिक असुरक्षा की वजह से आदिवासियों का कांग्रेस से मोहभंग होने लगा. मैं केवल आदिवासी वोट बैंक बीजेपी की तरफ शिफ्ट होने लगा बल्कि कांग्रेस के आदिवासी नेता भी भाजपा में शामिल होने लगे. दिलीप सिंह भूरिया, अरविंद नेताम, प्रेम नारायण ठाकुर, निर्मला भूरिया और सुश्री अनसूइया उईके ने बीजेपी का दामन थाम लिया. अपवाद स्वरूप अनुसुइया उइके पहले राज्यसभा सदस्य बनिए और उसके बाद राज्यपाल. यह उल्लेख करना उचित होगा कि कमलनाथ सरकार गिराने साजिश में शामिल आदिवासी नेता बिसाहू लाल सिंह को जरूर विभीषण की भूमिका अदा करने पर मंत्री पद मिला. इनके अलावा कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए आदिवासी नेताओं का कोई बड़ा राजनीतिक मुकाम हासिल नहीं हुआ.
आदिवासियों के पास रही है प्रदेश की सत्ता की चाबी
मध्य प्रदेश के विभाजन से लेकर अब तक चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश की सत्ता की चाबी आदिवासियों के पास ही रही है. यह बात अलग है कि आदिवासी राजनीतिक दलों के लिए हमेशा ही वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं रहे. कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद आदिवासी वोट बैंक बीजेपी में शिफ्ट होते ही कांग्रेस सत्ता से दूर हो गई. बीजेपी ने भी आदिवासी नेताओं की कदर नहीं की.
महाकौशल के मुखर आदिवासी नेता ओम प्रकाश धुर्वे और आदिवासी सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते का राजनीतिक पुनरुत्थान नहीं हो पाया. आदिवासी हितों की बात करने पर ओम प्रकाश धुर्वे को शिवराज सिंह मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा कर दिया गया. यही नहीं, फग्गन सिंह कुलस्ते द्वारा प्रदेश अध्यक्ष बनने की इच्छा जताने के बाद उन्हें हाशिए पर धकेलने की साजिश आज तक चल रही है. उनके स्थान पर नए आदिवासी नेताओं को प्रोजेक्ट किया जाने लगा है. वर्ष 2018 तक आदिवासी वोट बैंक भाजपा के साथ रहा. यही कारण है. भाजपा लगातार सत्ता में बनी रही. यानि 2018 प्रदेश की आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से 32 सीटों पर भाजपा और 15 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है.
इसके अलावा प्रदेश में 30 सीटें ऐसी है जो आदिवासियों के लिए आरक्षित तो नहीं है, लेकिन उन पर आदिवासियों का वोट निर्णायक होता है. 2018 में संपन्न विधानसभा चुनाव में आदिवासियों ने एक बार फिर कांग्रेसी भरोसा जताया. कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी. कमलनाथ मुख्यमंत्री बने पर आदिवासी विधायकों को विशेष तरजीह नहीं दी गई. मिशन- 2023 आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका अदा करेंगे. यही वजह है कि बीजेपी हो या फिर कांग्रेस आदिवासियों को रिझाने में जुटे हुए है. आदिवासी नेता और मतदाता मौके की नजाकत को भांप रहे हैं.