पाक सेना ने कई बार हमारे देश में घुसने की कोशिश की और बुरी तरह विफल रही ।  74 साल पहले शालातेंग की लड़ाई पर ऐसी ही एक जीत हुयी| 

बड़गाम युद्ध के बाद हमलावर छोटे-छोटे समूहों में फैल गए, ताकि ये भारतीय रक्षक सेनाओं पर आक्रमण कर सकें अथवा दरों के द्वारा घुसपैठ कर सकें। वे योजनानुसार किसी स्थान पर एकत्र हो गए। इस प्रकार श्रीनगर व उसके हवाई अड्डे पर संकट के बादल मंडराने लगे। सेन ने सिख सेना की पराजय की स्थिति को टालने के लिए, इसे श्रीनगर से 8 कि.मी. पर, बारामूला सड़क पर स्थित शालतेंग में एक नया रक्षा मोरचा सँभालने के लिए कहा। हमलावरों ने समझा कि सिख सेना पीछे हट रही है और उन्होंने एकत्र होकर 5-6 नवंबर की रात को उन पर हमला कर दिया। यह हमला उन्हें उलटा पड़ गया और उनके बहुत से हमलावर घायल हो गए। सिख की दो कंपनियों ने 4 कुमाऊँ की एक कंपनी के साथ मिलकर 6 नवंबर की रात्रि तक अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया। इसके अतिरिक्त 32 फील्ड बैटरी तथा 7 कैवेलरी को बख्तरबंद कारों को एक सैन्य टुकड़ी भी उनकी सहायता करने के लिए वहाँ उपस्थित थी। हमलावरों ने 7 नवंबर को प्रातः ही धावा बोल दिया तथा उनके द्वारा शालतेंग पर भी आक्रमण किए जाने की संभावना थी। 7 कैवेलरी की एक सैन्य टुकड़ी सघन निरीक्षण करने के लिए गंदरबल के रास्ते वुलर झील के उत्तर में स्थित बाँदीपुर की ओर पहले से ही रवाना हो चुकी थी। इन नई परिस्थितियों में सैन्य कमांडरों को गंदरबल से आगे जाने के बजाय हमलावरों के पीछे रहने के आदेश दिए गए। 1 (पैरा) कुमाऊँ, जो 1 सिख के पीछे तैनात थी, को दुश्मनों के दाएँ पहलू पर हमला करने के लिए पोजीशन में रहने का आदेश दिया गया। जब वे सभी पोजीशन में थे, तभी दोपहर के समय हमला बोल दिया गया। हमलावरों पर एक साथ तीनों दिशाओं से हमला कर दिया गया वायुसेना के विमानों ने उनके ऊपर बमबारी करनी आरंभर दी। लगभग आधे घंटे के भीतर हो यह लड़ाई समाप्त हो गई। हमलावर अपने 472 मृत सहयोगियों को वहाँ रणक्षेत्र में छोड़कर भाग खड़े हुए। वे लोग 138 सिविल बसें, गाड़ियाँ तथा लगभग समस्त गोला बारूद एवं अन्य सभी सामान भी वहीं छोड़कर भाग निकले। उनका पाटन तक पीछा किया गया और उसी शाम लगभग 6:30 बजे पाटन पर कब्जा कर लिया गया। एक निर्णायक युद्ध को जीत लिया गया तथा हमलावरों को खदेड़ दिया गया। इस प्रकार श्रीनगर को बचाकर घाटी को संकट मुक्त कर दिया गया।

दुश्मन शालतेंग में अपने 472 सहयोगियों तथा बारामूला की ओर पीछे हटते समय अन्य 146 साथियों को गँवा देने के बाद भाग खड़ा हुआ। साथ ही भारतीय सेनाओं को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उसका मनोबल बहुत गिर चुका था। उन पर यह दबाव बनाए रखा गया तथा उन्हें पुन: संगठित होने तथा उपयुक्त समन्वित रक्षात्मक स्थिति लेने का कोई अवसर नहीं दिया गया।

सेन ने 7 नवंबर, 1947 को आई सैन्य टुकड़ियों को अपनी सेना में शामिल करते हुए शीघ्रतापूर्वक उनका पुनर्गठन कर लिया। 6 राजपूताना राइफल्स को हवाई अड्डे की सुरक्षा का कार्य सौंपा गया। 4 कुमाऊँ भी अब पूर्ण हो चुकी थी और उसे श्रीनगर की सुरक्षा के लिए वहाँ जाने का आदेश दिया गया। 2 डोगरा को बारामूला की रक्षा का आदेश दिया गया। ब्रिगेड, जिसमें सिख पंजाब और कुमाऊँ सम्मिलित की और जिसे 7 कैवेलरी की एक सैन्य टुकड़ी फील्ड बैटयों की एक टुकड़ों तथा पटियाला माउंटेन बैटरी का सहयोग प्राप्त था, ने 10 नवंबर को सुबह 7 बजे बारामूला से आगे बढ़ना आरंभ किया। वे श्रीनगर-उड़ी-डोमेल सड़क पर आगे बढ़ रहे थे, जो झेलम नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित थी। इस क्षेत्र के लगभग संपूर्ण भाग के जंगली वृक्षों से घिरा होने के कारण यह पूर्ण रूप से उपेक्षित था। इस मार्ग पर रक्षक बलों का तैनात किया जाना अत्यंत आवश्यक था; क्योंकि यह क्षेत्र किसी पर घात लगाकर आक्रमण कर देने के लिए बहुत अनुकूल था। उनकी आगे बढ़ने की गति बहुत धीमी रही, क्योंकि उन पर बीच-बीच में दुश्मनों द्वारा गोलीबारी की जा रही थी। ये वे कबाइली थे, जो रास्ता भटक गए थे तथा अपने वापस लौटते हुए सहयोगियों के साथ सम्मिलित होने के लिए वापस लौट रहे थे। सेना लगभग 16 कि.मी. की दूरी पार करने के बाद रात में रुक गई।

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सेन को आगे बढ़ने के पहले दिन हो, उनको घोर आपत्ति के बावजूद, 1 पंजाब को वापस भेजने के आदेश मिले, जबकि वह कुछ महत्त्वपूर्ण स्थानों पर कब्जा करने वाली थी। इसके कारण दिन के उजाले के तीन घंटे खराब हो गए। यह सफलता को प्रबलित करने के मूलभूत सिद्धांत के उल्लंघन का एक विशिष्ट मामला था।

11 नवंबर को तड़के हो आगे बढ़ना शुरू कर दिया गया; परंतु अतिग्रस्त पुलों तथा दुश्मन के हस्तक्षेप के कारण उनकी गति धीमी रही। वे केवल 10 कि.मी. की दूरी ही तय कर पाए तथा शाम के चार बजे रामपुर पहुंच गए। उनके वहाँ पहुँचने से कुछ ही समय पहले कबाइलियों ने माहुरा के पावर हाउस को क्षतिग्रस्त कर दिया था, जो वहाँ

कि.मी. की दूरी पर स्थित था। सेन बजारबंद कारों व 1 कुमाओं को लेकर शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े; परंतु दुश्मन एक विशाल सेना को आते देखकर तुरंत भाग खड़े हुए तथा वहाँ किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं हुआ। सिर्फ एक बख्तरबंद कार ने पावर हाउस के मुख्य मार्ग पर तीन वरदीधारी अधिकारियों को जाते हुए देखा, जो प्रतीक्षारत स्टाफ कार की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। वे जैसे ही कार के अंदर बैठे, भारतीय सैनिकों ने बंदूक से उन पर सीधा निशाना साधा। कार में विस्फोट हो गया और उसमें आग लग गई तथा उसमें बैठे सभी लोग मारे गए। उस कार के अवशेष आगे बढ़ती सेनाओं के पास तक भी पहुंचे। यही एकमात्र उपलब्धि रही।

12 नवंबर की सुबह गश्तियों ने खबर दी कि कबाइली वहाँ से पीछे हट चुके हैं तथा माहुरा का क्षेत्र खाली हो चुका है। दुश्मनों ने वापस लौटते हुए माइलस्टोन 54 पर निर्मित पुल को क्षतिग्रस्त कर दिया। उनके पास चूँकि पुल निर्माण के कोई उपकरण नहीं थे, अतः इसकी 2 मीटर की गहराई को शिलाखंडों तथा लकड़ी के लट्ठों से भर दिया गया तथा लगभग 4 मीटर की लंबाई को 13 नवंबर की दोपहर तक पार कर लिया गया।

स्थानीय सैनिकों ने उड़ी में तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में लगभग 4,000 हमलावरों के एकत्र होने की सूचना दी। सेन ने इन सूचनाओं को अनदेखा करते हुए तथा हमलावरों को वहाँ खाइयाँ खोदकर मात लगाने का समय न देने के लिए 1 सिख की एक कंपनी गश्ती टुकड़ी को तुरंत वहाँ रवाना कर दिया और स्वयं शेष ब्रिगेड के साथ उसके पीछे-पीछे उस स्थान की ओर आगे बढ़ गए। सुबह के समय छोटे दलों के द्वारा थोड़ा-बहुत हस्तक्षेप किया गया; परंतु कुछ ही समय के बाद वह भी समाप्त हो गया। कबाइलियों ने स्वाभाविक रूप से वापस लौटकर अपने सहयोगियों को अस्थायी पुल के ऊपर से ब्रिगेड के तेजी से आगे बढ़ने के संबंध में बता दिया था। हमलावर शालतंग को फिर से दोहराना नहीं चाहते थे, अत: उन्होंने उड़ी को खाली कर दिया तथा जल्दबाजी में पीछे हट गए। सिख गश्ती टुकड़ी के कंपनी कमांडर ने सूचना दी कि उड़ी दुश्मनों के कब्जे से पूर्ण रूप से मुक्त हो चुका है। शेष ब्रिगेड ने शीघ्रतापूर्वक संगठित होकर उसी शाम को उड़ी पर कब्जा कर लिया। 13 नवंबर, 1947 को 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड उड़ी पर कब्जा करके कश्मीर घाटी को स्वतंत्र कराने के अपने मिशन में सफल हो गई। "श्रीनगर को बचाने का महत्वपूर्ण अभियान सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। गया।" इसी के साथ जम्मू व कश्मीर के अभियान का प्रथम चरण पूरा हो गया।

साभार: 1971 भारत-पाक युद्ध

161 इन्फैंट्री ब्रिगेड की शौर्य गाथा

लेफ्टिनेंट जनरल के. के. नंदा