भोपाल का इतिहास, भोपाल का संघर्ष, भोपाल की सियासत, भोपाल का विद्रोह..

News पुराण में आज हम बताएंगे भोपाल के नवाबों के बारे में, आखिर Bhopal नवाबों के अधीन कैसे आया, Bhopal में किस-किस तरह के संघर्ष हुए? कैसे नवाबी शासनकाल में विद्रोह पनपा और कैसे भोपाल रियासत भारत का अंग बनी?

भोपाल के नवाब: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उससे लगा इलाका देश के स्वतंत्र होने तक अफगान सरदार दोस्त मोहम्मद खान के द्वारा स्थापित राजवंश के अधीन रहा। दोस्त मोहम्मद खान अपने पिता के साथ हिजरी सन् 1109 (ईस्वी सन् 1696-97) में भारत आया। पहले वह लोहारी जलालाबाद (उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर जिले में) गया था, जहां उनके कबीले के लोगों की एक बस्ती बसी हुई थी। वहां आने के बाद उसने झगड़े में एक व्यक्ति की हत्या कर दी। इसके बाद वह गिरफ्तार होने के डर से दिल्ली भाग गया। जहां वह शाही सेवा में शामिल हो गया और उसे सैनिकों के एक ऐसे दल के साथ भेज दिया गया, जो मालवा में मराठों पर आक्रमण करने जा रहा था। 

कुछ समय के बाद उसने शाही फौज की नौकरी छोड़ दी और सीतामऊ के राजा केशवदास (ईस्वी सन् 1695-1748) के अधीन नौकरी करने लगा। दोस्त मोहम्मद ने आगे चलकर लगभग ईस्वी सन् 1713 में वह 50 घुड़सवार तथा पैदल सैनिकों की एक छोटी सी टुकड़ी लेकर मंगलगढ़ के ठाकुर आनंद सिंह सोलंकी की नौकरी करने लगा। किसी कारणवश ठाकुर आनंद सिंह को अपनी संपदा और अपनी माता चंदेल जी, दोस्त मोहम्मद खान के जिम्मे छोड़कर किसी कार्य से उत्तरी भारत जाना पड़ा। 

वहां आनंद सिंह मृत्यु हो गई। इसके कुछ दिनों बाद उसकी माता की भी मृत्यु हो गई। उसके पश्चात् दोस्त मोहम्मद उसके कब्जे में रखी मूल्यवान वस्तुओं को हड़प कर बैरसिया चला गया। वहां उसने एक शाही अधिकारी ताज मोहम्मद खान से 30 हजार रुपए प्रतिवर्ष के भुगतान पर बैरसिया जिले (ईस्वी सन् 1709) का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद दोस्त मोहम्मद खान ने अपना ध्यान अपने क्षेत्र का विस्तार करने पर केंद्रित किया। उसने परसौन पर अधिकार कर लिया, खिंचीवाड़ा तथा उमतवाड़ा के राजपूतों को पराजित किया और शमशाबाद पर अधिकार कर लिया। 

इसके बाद उसने जगदीशपुर (ईसवीं सन् 1715) पर आक्रमण किया। जगदीशपुर पर उस समय राजपूतों का अधिकार था जगदीशपुर पर धोखे से कब्जा करने के बाद उसका नाम इस्लाम नगर कर दिया गया। वहां उसने एक किले का निर्माण करवाया। आमिल को परास्त करने के बाद उसने आष्टा पर कब्जा कर लिया और वहां एक किले का निर्माण करवाया उसने अपनी स्वयं की स्थिति, शक्ति जागीर को सुदृढ़ करने के लिए सभी प्रकार के सही-गलत तरीके अपनाए। वह धीरे-धीरे आधुनिक भोपाल रियासत का निर्माण कर रहा था।

दोस्त मोहम्मद खान ने इस्लाम नगर के किले का उपयोग अन्य क्षेत्रों पर अधिकार करने के अड्डे के रूप में किया। इसके बाद अपने सांची (जिसे उस समय सांसी के रूप में जाना जाता था) तथा भोजपुर के राजपूत सरदारों की शक्ति नष्ट कर दी और लूट का माल दिल्ली के फर्रुखसियर के दरबार में भेज दिया। 

इसके बाद बादशाह इतना अधिक खुश हो गया कि तारीख 13 रजब हिजरी, सन् 1128 (22 जून, सन् 1716) के एक फरमान (सैयद अब्दुल्ला खान के मार्फत) में उसने दोस्त मोहम्मद को "खान" के खिताब से सम्मानित किया और उसे जगदीशपुर (इस्लाम नगर) का परगना दे दिया। इन क्षेत्रों पर अधिकार करने के शीघ्र बाद भैलसा, ग्यारसपुर, दोराहा, सीहोर, इछावर, देवीपुरा, गुलगांव तथा अन्य स्थानों का स्वामी बन गया। इसके पश्चात् दोस्त मोहम्मद खान ने गिन्नौरगढ़ (ईस्वी सन् 1723) के किले पर अधिकार किया, उस समय इस पर एक गॉड सरदार निजामशाह का अधिकार था, जिसकी हत्या संभवत: चैनपुर बाड़ी के सरदार जसवंत सिंह द्वारा उकसाए जाने पर आलम शाह द्वारा कर दी गई थी। 

निजाम शाह की विधवा रानी कमलावती ने चैनपुर बाड़ी के सरदार के विरुद्ध उसकी और उसने चैनपुर बाड़ी के सरदार पर आक्रमण कर दिया और उसके क्षेत्र को अपने क्षेत्र में मिला लिया। इसके बाद रानी कमलावती ने तत्कालीन भूपाल (आज का भोपाल) नामक एक छोटा ग्राम दोस्त मोहम्मद ख़ान को दे दिया, जिसका वार्षिक राजस्व उस समय केवल दस हजार रुपए था। रानी की मृत्यु हो जाने पर उसने गिन्नौरगढ़ की गद्दी पर विश्वासघात पूर्वक अधिकार कर लिया और राजा तथा उसके आदमियों को मौत के घाट उतार दिया। दोस्त मोहम्मद खान अब तक नवाब की पदवी धारण कर स्वतंत्र शासक बन गया था। 

मार्च, 1723 में निजाम, दोस्त मोहम्मद खान को सत्ताच्युत करने या उसका अभिमान भंग करने के इरादे से भोपाल की और बढ़ा। उसने इस्लाम नगर के किले के पास एक स्थान पर, जिसे अभी निजाम की टेकरी कहा जाता है, पड़ाव डाला। 

दोस्त मोहम्मद खान को विवश होकर इस्लाम नगर के किले में शरण लेनी पड़ी। वहाँ एक भीषण यद हुआ और बाद में निजाम की सेना ने इस्लाम नगर के किले पर अधिकार कर लिया। इसके बाद दोस्त मोहम्मद ने आत्मसमर्पण कर दिया और क्षमायाचना करते हुए तथा भविष्य में अच्छा आचरण करने का आश्वासन देते हुए अपने पुत्र यार मोहम्मद खान को निजाम के पास बंधक रख दिया। 

मालवा से दिल्ली रवाना होने के पूर्व निजाम ने रामचंद्र के पुत्र चंद्रबंस को इस्लाम नगर का फौजदार नियुक्त किया। यार मोहम्मद खान भी निजाम के साथ दिल्ली गया और वहां से दक्खन (दक्षिण) को गया।

अब दोस्त मोहम्मद खान ने उन क्षेत्रों पर जिन्हें उसने उस समय तक अपने नियंत्रण में ले लिया था अपना कब्जा बनाए रखने और अपने अधिकार को पुख्ता करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए, उसने शुक्रवार 30 अगस्त, 1723 को भोपाल में फतेहगढ़ के किले की नींव भी रखीं। यह किला, राजा भोज के पुराने किले से एक दीवाल द्वारा जुड़ा हुआ था। बाद में इस दीवाल का कुछ दूरी तक और विस्तार किया गया।

71 वर्ष की आयु में मार्च 1728 में दोस्त मोहम्मद खान की मृत्यु हो गई और वह अपने पीछे एक सुस्थापित रियासत छोड़ गया। दोस्त मोहम्मद खान के छह पुत्र तथा पांच पुत्रियां थीं। दोस्त मोहम्मद खान की मृत्यु के समय यार मोहम्मद खान जो कि उसका सबसे बड़ा पुत्र था। 

हैदराबाद में दोस्त मोहम्मद खान की ओर से निजाम के पास बंधक के रूप में रह रहा था। निजाम ने यार मोहम्मद खान को भोपाल की मसनद पर बैठाने का वचन दिया था, यार मोहम्मद खान को माही मरातिब का उच्च अधिकार चिह्न दिया और नगाड़ा, पताका, एक हाथी और अन्य राजचिन्ह देकर एक हजार घुड़सवार सैनिकों की सेना के साथ भोपाल भेज दिया। इस बीच दोस्त मोहम्मद खान के भाई अकील मोहम्मद खान तथा भोपाल के सामंतों ने 8 वर्षीय सुल्तान मोहम्मद खान को मसनद पर बिठा दिया था। तथापि, यार मोहम्मद खान का कोई विरोध नहीं किया गया। 

उसने सुल्तान मोहम्मद को बिना किसी विरोध के गद्दी से उतार दिया। यार मोहम्मद ने 30 अगस्त, 1728 को शासन की बागडोर संभाल ली, यद्यपि यार मोहम्मद ने कभी भी नवाब की पदवी धारण नहीं की। उसने इस्लाम नगर को अपनी राजधानी बनाया। सन् 1742 में यार मोहम्मद खान की मृत्यु हो गई। उसे इस्लाम नगर में दफनाया गया। वह अपने पीछे पांच पुत्र, जिनके नाम फैज मोहम्मद खान, हयात मोहम्मद खान, सैयद मोहम्मद खान, हसन मोहम्मद खान तथा यासीन मोहम्मद खान थे और चार पुत्रियां छोड़ गया। 

यार मोहम्मद खान का सबसे बड़ा पुत्र फैज मोहम्मद खान जब वह केवल 11 वर्ष का था, इस्लामनगर में अपने पिता का उत्तराधिकारी बन गया। निःसंतान फैज मोहम्मद खान की 12 दिसंबर, 1777 को मृत्यु होने के पश्चात् उसके बाद उसका भाई हयात मोहम्मद खान उसका उत्तराधिकारी बना। उसका विरोध भी किया गया था। हयात मोहम्मद खान ने धार्मिक, वीतरागी व्यक्ति था, शीघ्र ही अपने दत्तक पुत्रों में से एक पुत्र फौलाद खान को दीवान के पद पर पदोन्नत किया। 

फौलाद खान के प्रशासन काल में ही कर्नल गोडार्ड ने इस जिले से सागर-भोपाल मार्ग से होते हुए बंगाल से बंबई के लिए कूच किया था, जो इतिहास में प्रसिद्ध है। यह कूच पुन: चालू हुए अंग्रेज-मराठा युद्ध में बंबई के अंग्रेज प्राधिकारियों को सहायता पहुंचाने के लिए किया गया था। गोडार्ड 20 नवंबर, 1778 को भोपाल पहुंचा और आठ दिन तक वहां रहा तथा उसने खाद्यान्न की भरपूर व्यवस्था कर ली। कर्नल गोडार्ड को भोपाल शासन से सभी संभव सहयोग प्राप्त हुआ। अंग्रेजों ने इसे स्वतः प्रेरित उदारता का ऐसा कार्य माना जिसे अंग्रेजों द्वारा कभी भुलाया नहीं गया।

6 नवंबर, 1808 को नवाब हयात मोहम्मद खान की मृत्यु के पश्चात गौस मोहम्मद 23 नवंबर, 1808 को उसका उत्तराधिकारी बना विभिन्न समसामयिक परिस्थितियों के कारण इसी बीच, गौस मोहम्मद खान, जो गुमनामी के अंधकार में खो गया था, नवाब के खिताब के साथ रायसेन में रह रहा था। 

17 मार्च, 1816 को वजीर मोहम्मद की मृत्यु हो गई और उसका द्वितीय पुत्र नजर मोहम्मद खान 20 मार्च, 1816 को उत्तराधिकारी बना। गौस मोहम्मद ने नजर मोहम्मद खान के मसनद पर बैठने पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। इतना ही नहीं बल्कि अपनी पुत्री गौहर बेगम का विवाह भी उससे कर दिया। बाद में गौहर बेगम, कुदसिया बेगम के नाम से प्रसिद्ध हुई। 

11 नवंबर, 1819 को नजर मोहम्मद खान इस्लाम नगर में दुर्घटनावश मारा गया। उसके बाद पहले उसका भतीजा मुनीर मोहम्मद खान और बाद में मुनीर मोहम्मद का छोटा भाई जहांगीर मोहम्मद खान उसका उत्तराधिकारी बना। जैसा कि तय किया गया था, नजर मोहम्मद खान की पुत्री सिकंदर बेगम का विवाह 18 अप्रैल, 1835 को जहांगीर मोहम्मद खान से कर दिया गया। 

9 दिसंबर, 1844 को जहांगीर मोहम्मद खान को 27 वर्ष की अल्प आयु में मृत्यु हो जाने के बाद उसकी 7 वर्षीय पुत्री शाहजहां बेगम को उसकी मां सिकंदर बेगम की प्रतिशासन व्यवस्था (रीजेन्सी) के अधीन रियासत का प्रमुख घोषित किया गया।

जुलाई, 1857 से नवम्बर, 1857 तक विद्रोही इस भू-भाग में हावी रहे। भोपाल की बेगम ने विद्रोह का दमन करने के भरसक प्रयास किए और ब्रिटिश शासन को सभी संभव सहायता प्रदान की। फाजिल मोहम्मद तथा आदिल मोहम्मद की जागीर अम्बापानी जस कर ली गई और वहां एक नायव बख्शी तैनात किया गया। किंतु इससे विद्रोह की भावना को दबाया नहीं जा सका। 

ब्रिटिश सत्ता पुनः स्थापित हो जाने पर ब्रिटिश शासन ने सिकंदर बेगम की निष्ठापूर्ण सेवा की बहुत प्रशंसा की। भोपाल रियासत के क्षेत्र में, जिसमें रायसेन भी शामिल था, विद्रोह के दौरान एक भी यूरोपीय व्यक्ति नहीं मारा गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वीकार किया कि उन्हें संपूर्ण भारत में भोपाल के शासक से अधिक सच्चा मित्र कोई नहीं मिला। 

7 जनवरी, 1861 को भारत के वायसराय कैनिंग द्वारा जबलपुर में एक दरबार आयोजित किया गया जिसमें सिकंदर बेगम को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। महान क्रांति के दौरान बेगम ने ब्रिटिश शासन की जो निष्ठापूर्ण सेवा की थी उसके पुरस्कार स्वरूप उसे दरबार में एक सनद द्वारा बैरसिया परगना, जो कि धार रियासत के अधीन था, दे दिया गया। 30 अक्टूबर, 1868 को 51 वर्ष की आयु में सिकंदर बेगम का देहान्त हो गया। इसके पश्चात् शाहजहां बेगम ने 16 नवम्बर, 1868 को हुकूमत की बागडोर संभाली। 

बेगम ने अनेक सुधार कार्य किए, जिसमें राजस्व प्रयोजनों के लिए रियासत का एक सर्वेक्षण भी शामिल है, जिसने उसकी माता के समय किए गए पुराने जरीब सर्वे का स्थान ले लिया। 16 जून, 1901 को शाहजहां बेगम का देहांत हो जाने पर उसकी पुत्री सुल्तान जहां बेगम उनकी उत्तराधिकारी बनी बेगम सुल्तान जहां को यात्रा करने का बहुत शौक था। वह बहुधा 

अपनी रियासत के दौरे किया करती थी और प्रजा की बातें व्यक्तिगत रूप से सुना करती थी। बेगम के तीन पुत्र थे जिनके नाम नवाब मोहम्मद नसरुल्ला खान, कर्नल औबेदुल्ला खान तथा मोहम्मद हमीदउल्ला खान थे। भोपाल के करीब कस्बे औबेदुल्लागंज का नाम नवाब औबेदुल्ला खान के नाम पर रखा गया था। 

औबेदुल्ला खान भोपाल सेना के प्रबंध के लिए उत्तरदायी थे। उस समय सेना में नियमित सैनिक, अनियमित सैनिक तथा शाही रिसाले के सैनिक थे। राज्य में तब सभी श्रेणी के सैनिकों की संख्या 1878 थी तथा एक सैनिक बैंड भी था।

24 मार्च, 1924 को औबेदुल्ला खान मृत्यु हो गई और 2 सितंबर, 1924 को सबसे बड़े पुत्र नवाब मोहम्मद नसरुल्लाह खान का भी देहांत हो गया। इसलिए बेगम सुल्तान जहां ने अपने एकमात्र जीवित पुत्र हमीदुल्ला खान को प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दिलाने के प्रयास किए और 19 मई, 1926 को प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के पक्ष में गद्दी छोड़ दी। तदनुसार 9 जून, 1926 को हमीदुल्ला खान को मसनद पर बिठाया गया। इस प्रकार एक शताब्दी तक प्रशासन महिलाओं के हाथ में रहने के बाद भोपाल राज्य का शासन पुरुष के हाथों में आया।

15 अगस्त, 1947 को भारत की स्वतंत्रता घोषित हो जाने के बाद भी भोपाल राज्य में उत्तरदायी शासन के लिए संघर्ष जारी था। इसके पश्चात राज्य प्रजा मंडल ने विलयन आंदोलन चालू किया। बाद में भोपाल रियासत का एकीकरण 30 अप्रैल, 1949 को भाग "ग" राज्य के रूप में किया गया। इस तरह भोपाल में लंबे समय से चले आ रहे नवाब खानदान का शासन समाप्त हो गया।