मध्य प्रदेश वन विभाग छत्तीसगढ़ से आए हाथियों को पकड़ने की तैयारी में है|
उत्पात मचाने वाले यह हाथी वन विभाग के लिए मुसीबत का सबब बन गए हैं इन्हें पकड़ने के लिए वन विभाग एक योजना तैयार कर रहा है|
वन विभाग की योजना है कि इन हाथियों को पकड़ने के लिए टाइगर रिजर्व्स में सफारी का उपयोग किया जाए|
Awareness program carried out Tanki GP, Anuppur Dist, MP. The most effected GP in HEC.
छत्तीसगढ़ से आए पश्चिम बंगाल के हाथी मध्य प्रदेश के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं. मध्य प्रदेश में साढ़े तीन साल से जहां 45 हाथी डेरा डाले हुए हैं, वहीं 20 दिन पहले 25 हाथियों का नया दल यहां आया है. अनूपपुर के रास्ते मध्य प्रदेश में प्रवेश करने वाली हाथियों की इस टीम ने न केवल फसलों को नुकसान पहुंचाया, बल्कि ग्रामीणों की झोपड़ियों को भी तबाह कर दिया. इन दुष्ट हाथियों से निपटने के लिए अब राज्य स्तर पर तैयारी की जा रही है। तबाही मचाने वाले हाथियों को पकड़ने के लिए वन विभाग सभी टाइगर रिजर्व में सफारी का इस्तेमाल करने पर विचार कर रहा है। हालांकि, मुख्य वन्यजीव वार्डन की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय समिति द्वारा निर्णय लिया जाएगा। सरकार ने हाल ही में एक कमेटी बनाई है। इनमें हाथी विशेषज्ञ डॉ. एस. सुकुमार भी शामिल हैं।
अनूपपुर होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे 25 हाथियों का जत्था मूल रूप से झारखंड का बताया जा रहा है. हाथी पश्चिम बंगाल से झारखंड आते हैं। छत्तीसगढ़ में करीब चार साल पहले तक यह समस्या थी, लेकिन अब मध्य प्रदेश में भी यह स्थायी समस्या बन गई है। साढ़े तीन साल पहले आया 45 हाथियों का दल राज्य छोड़ने को तैयार नहीं है. इसके बाद 10 हाथियों का एक और समूह आया। इनमें से 40 हाथी अब उमरिया जिले के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र में और सात से नौ सीधी जिलों के संजय दुबरी टाइगर रिजर्व में रहते हैं।
Another sad incident of #Humanelephant conflict, 3 villagers were trampled by a herd of 12 elephants ( 02.04.2020, 6 AM Morning) Ranjendragram, #Anuppur, MP. The compensation will be given soon, but such act would aggravate the already grim situation.@RandeepHooda@drqayumiitk pic.twitter.com/Af3MIS9beN
— Pradeep Mishra IFS (@PradeepMishraMP) April 3, 2020
उल्लेखनीय है कि बंगाल में 1974 से हाथियों की समस्या है और वहां से ये हाथी ओडिशा और झारखंड चले गए। इस मार्ग से वे छत्तीसगढ़ होते हुए राज्य में आ रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि हालांकि हाथी झाड़ियों में रहते हैं, लेकिन उन्हें खुले घास के मैदान पसंद हैं। शायद उन्हें यहां वनस्पति की प्रचुरता के कारण राज्य पसंद आया।
27 सितंबर को मलागा और कोतमा पर्वतमाला के पास के गांवों में 40 से अधिक जंगली हाथियों को देखा गया था। तब से अब तक लम्बा समय बीत चुका है और हाथियों की आवाजाही जस की तस बनी हुई है.
पश्चिम बंगाल की टीम से हाथियों को बचाने का प्रशिक्षण लिया
हाथियों के समूह से छुटकारा पाने के लिए जिला प्रशासन और वन विभाग के स्वैच्छिक संगठनों और पश्चिम बंगाल के हाथियों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया था।
इस दौरान संस्था प्रमुख एस, साधनिक सेन गुप्ता, पिंटू महाजा ने बताया कि हाथियों का ग्रुप पूर्व में भी कभी इस इलाके में आये होगे वन्य प्राणियों में सबसे समझदार होने के साथ ही सबसे शांत प्रवृत्ति के होते हैं इन हाथियों का मुख्य काम अपना पेट भरना तथा विचरण करना है। जिले में विगत 2014-15 से हाथियों का समूह पहले कम संख्या में उसके बाद बढ़ते बढ़ते वर्तमान में 40 हाथियों के दल के सबसे बड़े दल स्वरूप में इस वर्ष आए हैं, यदि हाथियों के समूह को रोकने के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वक्त में हाथियों के आने की संख्या दिनों दिन बढ़ेगी| विशेषज्ञों द्वारा ग्रामीणों को सुझाव दिया गया कि हाथी प्रभावित तथा संभावित खेतों के आसपास हाथियों के नापसंद वाली फसलें मिर्ची तथा कड़वी चीजों को लगाएं और कटीले पेड़ लगाएं, ताकि हाथी उसी स्थान पर आने से रुक सके।
Training given to field staff of Kotma Range of Anuppur division, MP on elephant drive management.#conservation #wildlife #elephants pic.twitter.com/KCe4OPw6X0
— SAGE- Stripes And Green Earth Foundation (@SageEarth) October 22, 2021