अर्जेंटीना ने पिछले दिनों ख़ुद को राजनीतिक उथल-पुथल के केंद्र में पाया, इसकी वजह अर्थव्यवस्था के मंत्री मार्टिन गुज़मैन के अचानक सरकार से अपने इस्तीफ़े का ऐलान था। गुज़मैन की उपराष्ट्रपति क्रिस्टीना फर्नांडीज डी किर्चनर के साथ लगातार भिड़ंत होती रहती थी। जिस वक्त सरकार में ये उथल-पुथल उस वक़्त हो रही है, तब अर्जेंटीना हाल के वर्षों में सबसे ख़राब आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। 

पिछले महीने अर्जेंटीना में मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 60.7 प्रतिशत पर पहुंच गई और इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। देश में औसत मुद्रास्फीति 50 प्रतिशत के ऊपर बने रहने की आशंका है। वैसे तो ये स्थिति अर्जेंटीना के लिए अव्यवस्था नहीं है क्योंकि अर्जेंटीना का महंगाई के साथ ‘बार-बार का रिश्ता’ रहा है लेकिन महामारी के कारण आर्थिक परेशानी के साथ-साथ रूस-यूक्रेन संघर्ष की वजह से हालात और भी ख़राब हो गए हैं। अर्जेंटीना के लोग जब सबसे किफ़ायती दर पर रोज़मर्रा का ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए जाते हैं तो एक दुकान से दूसरी दुकान तक सामानों की क़ीमत में अंतर आ जाता है। 

महंगाई का संकट और उस पर काबू करने में सरकार की नाकामी की वजह से अतीत में अर्जेंटीना की कई सरकारें गिर चुकी हैं मौजूदा राष्ट्रपति भी अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उसी रास्ते पर चलते हुए दिखाई दे रहे हैं। 

इस बेहद ख़राब आर्थिक संकट को देखते हुए गुज़मैन ने 44 अरब अमेरिकी डॉलर के कर्ज़ की पुनर्संरचना के लिए अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ एक समझौता किया था। लेकिन उपराष्ट्रपति ने इस समझौते की कड़ी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि इस समझौते में आईएमएफ़ को बहुत ज़्यादा रियायतें दी गई हैं और इसकी वजह से इस बात की पूरी आशंका है कि आर्थिक विकास में रुकावट आएगी। 

अब गुज़मैन की जगह पर बटाकिस के आने और उनके द्वारा आईएमएफ के अधिकारियों से मिलकर इस समझौते को लेकर फिर से बातचीत का इरादा जताने के बाद आईएमएफ से मिलने वाली संभावित राहत भी अर्जेंटीना के लिए अनिश्चित हो गई है। आर्थिक संकट ने अर्जेंटीना में निवेशकों को डरा दिया है। इसकी ख़ास वजह ये है कि हर बीतते दिन के साथ अर्जेंटीना में विदेशी मुद्रा का भंडार कम होता जा रहा है।