अमेरिका में जो हुआ, आज ब्राजील में भी ठीक वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई है। निर्वाचित प्रेसिडेंट लूला को प्रेसिडेंट बोलसोनारो के समर्थक किसी भी कीमत पर स्वीकार नही कर पा रहे हैं। बोलसोनारो के हिंसक समर्थक सड़क पर बवाल करते नज़र आ रहे हैं, यानि साफ तौर पर ये कहा जा सकता है, कि ब्राज़ील अब एक खूनी सिविल वॉर के मुहाने तक पहुंच गया है।

सोशल  मीडिया पर वायरल पोस्ट में ये देखा जा सकता है। सेना कमांड हेडक्वार्टर को लाखों लोगों ने घेर लिया है। स्थिति बेहद खौफनाक लग रही है और सुरक्षा बालों के सामने ही हिंसक भीड़ प्रदर्शन और नारेबाजी करती नज़र आ रही है। 
 
लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में एक के बाद एक 6 देशों में वामपंथी सरकारें बनी हैं, जिन्हें अमेरिका अपना बैकयार्ड कहता है। ये देश हैं ब्राजील, अर्जेंटीना, चिली, पेरू, कोलंबिया और मैक्सिको। यह अमेरिकी और विश्व राजनीति के लिए एक बड़ा संदेश है। हाल के चुनावों में ब्राजील की जनता ने बोल्सोनारो की बयानबाजी को खारिज कर दिया और नेतृत्व वामपंथी लूला डा सिल्वा को सौंप दिया। 

इसके साथ ही ब्राजील में 4 साल के दक्षिणपंथी शासन का अंत हो गया है। इस चुनाव में वामपंथी लूला डी सिल्वा ने 50.9 फीसदी वोट से जीत हासिल की है। सैन्य पृष्ठभूमि से आने वाले बोल्सोनारो जुझारू राष्ट्रवाद के अपने नारों से लोगों का दिल नहीं जीत सके। कोरोना के बाद महंगाई और रोजगार की समस्या से जूझ रहे लोगों ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव ने वामपंथियों की लैटिन अमेरिका में वापसी के लिए एक बार फिर दबाव बढ़ा दिया है। 

लैटिन अमेरिकी देशों की राजनीति पर विचार करने से पहले ब्राजील में हुए परिवर्तनों और इन परिवर्तनों के नायकों को जानना आवश्यक है। क्योंकि 1.6 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ ब्राजील इस क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इस बार ब्राजील में वामपंथ की जीत के हीरो वर्कर्स पार्टी के 77 वर्षीय लूला डा सिल्वा (लुइज इग्नासियो लूला डा सिल्वा) बने हैं। 1945 में जन्मे लूला के पहले 2003 से 2006 और 2007 से 2010 तक राष्ट्रपति के रूप में दो कार्यकाल रहे हैं। सलूला को भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया गया था वे 580 दिनों तक जेल में भी रहे थे।

लूला का बचपन संघर्ष से विपरीत परिस्थितियों पर विजय की कहानी है। वह 10 साल तक अनपढ़ रहे, जब उन्होंने पढ़ना शुरू किया तो गरीबी एक बाधा बन गई, इसलिए उन्हें 5 साल की उम्र में पढ़ना-लिखना छोड़ना पड़ा। लूला ने छोटी उम्र से ही काम करना शुरू कर दिया था और एक धातु कारखाने में काम करना शुरू कर दिया था। इस दौरान मजदूरों से उनकी नजदीकियां बढ़ गईं। इस दौरान उन्होंने ब्राजील के सैन्य शासन के खिलाफ कई आंदोलनों का नेतृत्व किया और 1980 में उन्होंने वर्कर्स पार्टी की स्थापना की और इसके साथ ही उन्होंने ब्राजील में वामपंथी राजनीति की नींव रखी।