अब कलेक्टर ने भी वन विभाग को इस बारे में लिखा है। हालांकि फैसला केंद्र के स्तर पर होना है तथा आलम यह है कि जिस सोन चिरैया के लिये यह सेंचुरी बसाई गई, उसे लगभग तीस वर्ष से देखा तक नहीं जा सका है।
जानकारी के मुताबिक अब शिवपुरी कलेक्टर ने इसे लेकर जो पत्र लिखा है, उसमें कहा गया है कि सेंक्चुरी के अंतर्गत आने वाली जमीन वन भूमि नहीं है। यह किसानों के स्वामित्व की भूमि है। चूंकि सेंचुरी के लिए सुरक्षित होने की वजह से भूमि के क्रय विक्रय पर प्रतिबंध लगा है इससे शासन को भी राजस्व हानि हो रही है और भूमि का क्रय-विक्रय न कर पाने के कारण किसानों को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
इसके कारण किसान आंदोलित हो रहे हैं। कलेक्टर ने पत्र के साथ भारतीय किसान यूनियन द्वारा राज्यपाल को ज्ञापन की प्रति भी संलग्न की है। भारतीय किसान यूनियन ने राज्यपाल के नाम ज्ञापन में लिखा है कि 25 मार्च 2022 को सोन चिरैया सेंचुरी को हटाने के लिए समस्त 32 गांव के सरपंचों द्वारा ठहराव के प्रस्ताव पारित किया है। सरपंचों ने अपने कहा है कि शिवपुरी जिले की नरवर और करेरा तहसील में आने वाले सोन चिरैया सेंचुरी के अंतर्गत समस्त 32 गांव को संरक्षण से मुक्त किया जाए, क्योंकि ना तो यहां सोन चिरैया है और ना ही यह भूमि वन विभाग की है। यहां की संपूर्ण भूमि किसानों के स्वामित्व की है, आरक्षित क्षेत्र होने की वजह से भूमि के क्रय विक्रय पर पूर्णता प्रतिबंध लगा हुआ है. इसके अलावा सड़क निर्माण कार्य विद्युत लाइन बिछाने और अन्य विकास कार्य एक करने में भी अड़चन आ रही हैं।
केंद्र में अटका है प्रस्ताव
दरअसल 202 वर्ग किलोमीटर में फैले सोन चिरैया सेंक्चुरी के अंतर्गत आने वाले 32 गांवों की भूमि को डिनोटिफाई करने का मामला केंद्र सरकार में अटका है। नेशनल वाइल्डलाइफ सलाहकार बोर्ड की बैठक में अभी तक इस पर सहमति नहीं दी गई है। नेशनल वाइल्ड लाइफ सलाहकार बोर्ड ने करेरा सेंचुरी को समाप्त करने के पहले दमोह में रानी दुर्गावती सेंचुरी को विस्तार करने की शर्त रखी है।
1994 से नदारद है सोन चिरैया
बताया जाता है कि इसमें पदस्थ रह चुके एसके गुप्ता ने 1994 में ही विभाग को पत्र लिखकर यह अवगत करा दिया था कि सोन चिरैया दिखाई नहीं दे रही है।
गांव के लोगों में असंतोष है।
दरअसल 1982 में बनाई गई थी। इसके लिये जिस जगह का चयन किया गया, वहां पर 1 इंच जमीन बन भूमि की नहीं थी। माना जाता है कि नाराज किसानों के आक्रोश के चलते इक्का-दुक्का सोन चिरैया दिखी भी तो उसको मार दिया गया।