दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली दंगों के मामले में उमर खालिद की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने खालिद के मामल में फैसला पहले ही सुरक्षित रख लिया था। जिसे आज दोनों जजों की पीठ ने आज सुनाया। जजों की बेंच ने कहा, कि खालिद की जमानत याचिका में कोई दम नहीं है, उसे ज़मानत दिए जाने की कोई ठोस वजह नहीं दिखाई देती।
दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि UAPA अधिनियम के तहत निषेध प्रावधान लागू होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि खालिद के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं। निचली अदालत के 24 मार्च के आदेश में दखल देने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि खालिद का नाम दंगों की साजिश की शुरुआत से ही सामने आया। वह जेएनयू मुस्लिम छात्रों के सदस्य रहे हैं। उन्होंने जंतर-मंतर, जंगपुरा, सीलमपुर आदि सभाओं में भाग लिया।
उमर खालिद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) का सदस्य था और उसे 13 सितंबर, 2020 को गिरफ्तार किया गया था। उमर पर UAPA अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं। उमर खालिद के अलावा शारजील इमाम साथ ही और भी कई लोगों पर दिसंबर 2019 और फरवरी 2020 में दिल्ली के जामिया इलाके और पूर्वोत्तर दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों और दंगों के "मास्टरमाइंड" होने और आतंकवाद विरोधी कानून और भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज किया गया था।
जेल में बंद उमर खालिद ने सेशन कोर्ट से ज़मानत याचिका खारिज होने के बाद हाईकोर्ट में अपील की थी जो अब नामंजूर कर दी गई है।
आपको बता दें, कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध के दौरान इन क्षेत्रों में हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हो गए थे।
इसी के चलते दिल्ली पुलिस ने खालिद पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया था और तर्क दिया था कि वह दंगों में एक बड़ी साजिश का हिस्सा था जिसने राष्ट्रीय राजधानी को झकझोर कर रख दिया था।