भारत का आपराधिक प्रणाली पहचान (क्रिमिनल प्रोसीजर पहचान) अधिनियम आस्तित्व में आ गया है। इसके तहत पुलिस अधिकारियों को सात साल या उससे अधिक की जेल की सजा वाले किसी अभियुक्त या गिरफ्तार किए गए या हिरासत में लिए गए किसी व्यक्ति के बायोमेट्रिक नमूने जैसे कि अंगुलियों के निशान और आंखों का स्कैन लेने की शक्ति हासिल होगी।
अभियुक्तों, कैदियों या हिरासतियों का बायोमेट्रिक डाटा जमा करने के लिए पुलिस को व्यापक शक्तियां देने वाले विवादास्पद भारतीय कानून की कड़ी आलोचना की जा रही है। इस अधिनियम के तहत जमा डाटा 75 साल तक जमा करके रखा जा सकता है और दूसरी कानूनी एजंसियों के साथ भी साझा किया जा सकता है। डाटा जमा करने में बाधा डालने को अपराध की तरह माना गया है।
इस कानून को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही ये भी कहा जा रहा है, कि कही ये अधिनियम निगरानी राज्य न बना दे। हम आपको बता दें, कि भारत में अभी एक व्यापक डाटा सुरक्षा प्रविधि प्रणाली का अभाव है।
ये नया कानून बंदी पहचान अधिनियम 1920 की जगह लाया गया है। इस कानून के तहत पुलिस को संदिग्धों की तस्वीर, फिंगरप्रिंट और फुटप्रिंट लेने का अधिकार है। इस नए CPI एक्ट के तहत दूसरी संवेदनसली सूचनाएं भी संग्रहण के दायरे में आ गई हैं जैसे कि फिंगरप्रिंट, रेटिना स्कैन, व्यवहारजन्य कृत्य जैसे कि दस्तखत और हस्तलेख और दूसरे जीववैज्ञानिक नमूने जैसे कि डीएनए प्रोफाइलिंग, जिसकी वजह से ही इस कानून को व्यापक विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
भारत के विधि आयोग में परामर्शदाता वृंदा भंडारी का कहना है, कि इसकी सबसे बड़ी खामी यही है, कि इसके आने के बाद 75 साल तक तमाम डेटा महफूज रखा जा सकता है, लेकिन उसकी गोपनीयता की हिफाजत का कोई इन-बिल्ट प्रावधान नहीं है। यह निजता और डाटा स्टोरेज सीमा का गंभीर उल्लंघन है।