कांग्रेस ने राजस्थान के उदयपुर में हुए जो कुछ किया, उसे इस मायने में जरूर अलग कहा जा सकता है कि इस दौरान पार्टी नेतृत्व कुछ कड़वी सचाइयों को स्वीकार करता नजर आया। इसने उन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया..!
समापन सत्र को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने साफ तौर पर माना कि पार्टी का आम लोगों से जुड़ाव टूट गया है और उसे फिर से स्थापित करने के लिए पार्टी जनों को लोगों के बीच जाना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी को संवाद के अपने तरीके में बदलाव करने की जरूरत है। इसी चिंता में एक परिवार के एक से ज्यादा लोगों को टिकट न देने को लेकर हालांकि पांच साल काम करने का अपवाद भी लगा दिया गया है लेकिन फिर भी यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
एक व्यक्ति के एक पद पर लगातार पांच साल से ज्यादा न रहने और 50 फीसदी से ज्यादा टिकट 50 साल से कम उम्र के लोगों को देने जैसे नियम भी पार्टी ने पहली बार बनाए हैं। इनका मकसद यह संदेश देने की कोशिश है कि पार्टी खुद को नए दौर की जरूरतों के मुताबिक ढाल सकती है। यह भी अच्छी बात यह भी है कि पार्टी नेतृत्व इस तथ्य को समझता है कि जितनी बुरी स्थिति उसकी हो चुकी है उसमें आगे बढ़ने का कोई शॉर्टकट नहीं है।
लंबी, कठिन जद्दोजहद से गुजरने के अलावा कोई चारा उसके पास नहीं है। आर्थिक नीतियों की दिशा पर कांग्रेस चिंतन ने जोर दिया है कि देश में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू किए जाने के 30 वर्षों के बाद अब पॉलिसी रीसेट पर विचार हो। समाज राजनीतिक दल नब्बे के दशक में शुरू हुए सुधारों और उसके फायदों का श्रेय तो लेना चाहते हैं लेकिन सुधारों का दूसरा राठंड शुरू करने की जरूरत को अनदेखा करते हैं। सुधारों की शुरुआत करने वाली पार्टी के रूप में कांग्रेस इस मामले में मिसाल पेश कर सकती थी। यह हो पाएगा या नहीं यह समय बता देगा।
पार्टी का बड़ा तबका गांधी परिवार के अतिरिक्त भी नया नेतृत्व चाहता है। कांग्रेस को यह विचार करना होगा कि उसके जो भी युवा नेता भाजपा में चले गये वे सभी अब भाजपा के प्रमुख नेता ही नहीं बन चुके हैं बल्कि इनमें से आठ नेता तो भाजपा सरकारों में मुख्यमंत्री भी हैं। कांग्रेस के लिये यह भी झटका है कि गुजरात चिंतन के बाद उसके सबसे अनुभवी नेताओं में शुमार सुनील जाखड़ ने कांग्रेस को अलविदा कहा तो गुजरात के प्रभावी युवा नेता हार्दिक पटेल भी कांग्रेस से दूर चले गये। उन्होंने भी राहुल गांधी की शैली पर जमकर भड़ास निकाली।
चिंतन की सार्थकता इसी में है कि बहुत जल्द सुधार साफ दिखे एक खास बात यह है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर कश्मीर से कन्याकुमारी तक की भारत जोड़ो यात्रा शुरू करने की घोषणा की जिसमें पार्टी के युवा तथा वरिष्ठ सभी नेता शिरकत करेंगे। यात्राएं संवाद और समझ का सबसे सशक्त माध्यम है, इसके लिये कांग्रेस जैसी डूबती पार्टी को दो अक्टूबर तक का यानि छह महीने का इंतजार भी क्यों करना चाहिये?
आशीष दुबे,