हलांकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की शंकाओं को खारिज करते हुए आश्वस्त किया कि सरकार इस बिल का संभावित दुरुपयोग रोकने के लिए हर संभव कदम उठाएगी, लेकिन बिल को जिस तरह से ड्राफ्ट किया गया है और जिस तरह के प्रावधान इसमें डाले गए हैं, उन्हें देखते हुए इस पर सवाल उठने लाजिमी ही थे और हैं।
यह बिल 1920 में बनाए गए जिस प्रिजनर्स आइडेंटिफिकेशन एक्ट की जगह लागू किया जाना है, वह सचमुच पुराना पड चुका है। उसके तहत गिरफ्तार व्यक्तियों के सिर्फ फिंगर-फुटप्रिंट ही लिए जा सकते हैं। इस बीच हुए तकनीकी विकास के अनुरूप पुलिस के तौर तरीकों में भी बदलाव आवश्यक हो गए हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी जांच एजेंसियां बायोमेट्रिक का इस्तेमाल करती हैं। इनसे अपराध के खिलाफ लड़ाई में मदद भी मिलती है। लेकिन मौजूदा विधेयक का स्वरूप कुछ ऐसा रखा गया है कि इसे इस स्पष्ठ मकसद तक सीमित रखना मुश्किल लगता है।
उदाहरण के लिए यही देखें कि सैंपल इकट्ठा करने का पुलिस का दायरा कितना बढ़ा दिया गया है। सात साल से ज्यादा सजा वाले आरोपों में गिरफ्तार सभी लोग इसकी जद में आ जाते हैं, चाहे उनके खिलाफ आरोप साबित हो या न हो, चाहे वे संदेह के आधार पर या एहतियातन ही क्यों न गिरफ्तार किए गए हों। कायदे से, जो लोग सात साल से कम सजा वाले मामलों में पकडे गए हों, वे सैंपल देने से इनकार कर सकते हैं। लेकिन अपने देश में पुलिस की जो छवि है, उसमें थाने में लाया गया कोई सामान्य व्यक्ति पुलिस के आदेश मानने से इनकार कर पाएगा? बिल में इस मुश्किल का आसान हल यह हो सकता था कि मजिस्ट्रेट की इजाजत से बायोमेट्रिक सैंपल लेने की व्यवस्था कर दी जाती।
मगर ऐसी सावधानी की जरूरत बिल ड्राफ्ट करते हुए शायद महसूस नहीं की गई। यही नहीं, इकट्ठा किए गए डेटा के दुरुपयोग या उन्हें अनधिकृत तौर पर लीक किए जाने की आशंका को दूर करने की भी कोई व्यवस्था बिल में नजर नहीं आ रही है। इसके अलावा 'मेजरमेंट' की सटीक परिभाषा के अभाव में यह डर भी बना हुआ है कि सीआरपीसी की धाराओं के सहारे मेडिकल प्रैक्टिशनर्स की सलाह पर, नार्को एनालिसिस और फेशियल रेकग्निशन जैसी उन प्रक्रियाओं के लिए भी गुंजाइश बना ली जाएगी, जो बेहतर कानूनी तौर तरीकों की श्रेणी में नहीं आतीं। जाहिर है कि इस बिल के साथ बहुत सारे किंतु परंतु नत्थी हो चले है। विपक्ष की ओर से उठाई जा रही आपत्तियों को महज विरोध की उसकी आदत मानकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा।
लिहाजा अभी जब बिल को राज्यसभा में लाया जाएगा तो वहां दलीय अहं से जुड़े तमाम पहलुओं को छोड़कर सभी को खूब मनन और मंथन करके बिल को लागू करने की राह खोलनी चाहिये। इससे किसी के मन में शंका की कोई भी गुंजाइश खत्म होने में मदद मिलेगी और आम लोग भी यही मानकर आश्वस्त होंगे कि इस बिल का सही उपयोग ही होगा।
आशीष दुबे